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ललिता जयंती 2025

ललिता जयंती 2025: देवी ललिता की पूजा और उपासना का दिन। जानें शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और इस दिन के धार्मिक महत्व के बारे में।

ललिता जयंती के बारे में

ललिता जयंती, देवी ललिता की पूजा और सम्मान का पर्व है। देवी ललिता, हिन्दू धर्म में शक्तिपीठों की प्रमुख देवी मानी जाती हैं और वे विशेष रूप से तंत्र विद्या, शक्ति और सौंदर्य की देवी के रूप में पूजी जाती हैं। यह पर्व हर साल माघ मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाया जाता है।

ललिता जयंती 2025

ललिता जयंती हर साल माघ महीने के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा के दिन मनाई जाती है। ये दिन माता ललिता को समर्पित है। शास्त्रों के अनुसार मां ललिता को दस महाविद्याओं में से तीसरी महाविद्या माना जाता है। इस दिन जातक पूरे विधि विधान से माता ललिता की आरा धना और उपासना करते हैं।

ललिता जयंती कब है ?

ललिता जयंती इस साल 12 फरवरी 2025, बुधवार को मनाई जाएगी। मान्यता है कि यदि इस दिन पूरी आस्था के साथ माता ललिता की पूजा की जाए तो सुख, शांति और सौभाग्य की प्राप्ति होती है।

  • ललिता जयन्ती बुधवार,12 फरवरी, 2025 को
  • पूर्णिमा तिथि प्रारम्भ - 11 फरवरी, 2025 को 06:55 पी एम बजे से
  • पूर्णिमा तिथि समाप्त - 12 फरवरी, 2025 को 07:22 पी एम बजे तक

ललिता जयंती शुभ समय

  • ब्रह्म मुहूर्त - 04:53 ए एम से 05:44 ए एम तक
  • प्रातः सन्ध्या - 05:18 ए एम से 06:35 ए एम तक
  • अभिजित मुहूर्त - कोई नहीं
  • विजय मुहूर्त - 02:05 पी एम से 02:50 पी एम तक
  • गोधूलि मुहूर्त - 05:47 पी एम से 06:13 पी एम तक
  • सायाह्न सन्ध्या - 05:50 पी एम से 07:06 पी एम तक
  • अमृत काल - 05:55 पी एम से 07:35 पी एम तक
  • निशिता मुहूर्त - 11:47 पी एम से 12:37 ए एम, तक (13 फरवरी)

ललिता जयंती क्यों मनाई जाती है?

मान्यता है कि जब माता सती ने दक्ष द्वारा शिव जी को यज्ञ में आमंत्रण न मिलने पर आत्मदाह कर लिया, तो भगवान शिव उनका मृत शरीर लेकर दुखी होकर विचरण कर रहे थे, तभी भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती जी शव के टुकड़े-टुकड़े कर दिए। माता सती के अंग जहां-जहां गिरे, वहां अलग-अलग शक्तियों का प्रादुर्भाव हुआ। उन्ही में से एक शक्ति माता ललिता भी हैं। इसलिए भक्त माता ललिता की आस्था में लीन होकर उनकी जयंती पर विधि विधान से पूजा करते हैं।

ललिता जयंती का महत्व क्या है?

माना जाता है कि अगर कोई जातक श्रद्धा के साथ ललिता जयंती के दिन माता ललिता की उपासना करता है, या पूजा करता है तो उसे जन्म व मृत्यु के चक्र से मुक्ति मिल जाती है। अर्थात् उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है।

ललिता जयंती कैसे मनाई जाती है?

ललिता जयंती के दिन देश के अलग अलग हिस्सों में कई बड़े आयोजन होते हैं। इस दिन माता के मंदिर में भक्त भारी संख्या में पूजा अर्चना के लिए उपस्थित होते हैं। माता ललिता के आशीर्वाद से भक्तों को सुख समृद्धि के साथ साथ समस्त प्रकार की सिद्धियां प्राप्त होती हैं

माता ललिता के अलग-अलग नाम

माता ललिता मां पार्वती का ही स्वरूप हैं, इसलिए इनका एक नाम तांत्रिक पार्वती भी है। इसके अलावा इन्हें राजेश्वरी, षोडशी, त्रिपुरा सुंदरी आदि नामों से भी जाना जाता है।

ललिता जयंती की पूजा विधि

  • ललिता जयंती के दिन व्रत रखने या पूजा करने के लिए सूर्योदय से पहले उठें।
  • नित्यकर्म करने के बाद स्नान करें, सफेद वस्त्र पहनें और व्रत का संकल्प लें।
  • अब एक चौकी पर गंगाजल छिड़ककर उसपर साफ सफेद कपड़ा बिछाएं
  • स्वयं उत्तर दिशा की ओर मुंह करके बैठ जाएं।
  • चौकी पर मां ललिता की मूर्ति या कोई तस्वीर स्थापित करें
  • मूर्ति या तस्वीर न हो तो श्री यंत्र स्थापित करके उसकी भी पूजा की जा सकती है।
  • गणेश भगवान प्रथम पूज्य हैं तो उनको भी स्थापित करें और विधिवत पूजा अर्चना करें।
  • माता ललिता की पूजा में कुमकुम, अक्षत, फल-फूल, दूध से बना कोई प्रसाद अथवा खीर अवश्य शामिल करें।
  • माता को सभी वस्तुएं अर्पित करने के बाद इस मंत्र का जाप करें- ऐं ह्रीं श्रीं त्रिपुर सुंदरीयै नमः।।
  • अब माता ललिता की कथा पढ़ें।
  • इसके बाद माता की आरती उतारें और सफेद रंग की कोई मिठाई या खीर का भोग लगाएं।
  • पूजा संपन्न होने पर माता से अनजाने में हुई किसी भूल के लिए क्षमा याचना करें।
  • अब 9 साल से छोटी कन्याओं को ये प्रसाद दें और स्वयं भी ग्रहण करें।
  • यदि 9 वर्ष से छोटी कन्याएं न हों तो ये प्रसाद किसी गाय को भी खिला सकते हैं।

ललिता जयंती पौराणिक कथा

माता ललिता से जुड़ी एक पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार की बात है, जब नैमिषारण्य में एक यज्ञ हो रहा था। इस यज्ञ अनुष्ठान में शामिल होने के लिए दक्ष प्रजापति भी उपस्थित हुए। उनके आने पर सभी देवता स्वागत के लिए खड़े हुए, लेकिन भगवान शिव अपनी जगह से नहीं उठे। राजा दक्ष को ये देखकर बहुत गुस्सा आया और जब उन्होंने अपने यहां यज्ञ करने की ठानी तो शंकर भगवान को निमंत्रण नहीं दिया। माता सती को जब पता चला कि उनके पिता एक यज्ञ कर रहे हैं, लेकिन इस आयोजन में उन्होंने भगवान शंकर को आमंत्रण नही दिया है तो अपने पति के इस अपमान से दुखी होकर माता सती ने यज्ञ कुंड में कूद कर अपने प्राणों की आहुति दे दी।

भगवान शिव को जब सती के आत्मदाह का पता चला तो वो व्याकुल हो उठे और सती के शव को अपनी पीठ पर लेकर पूरे ब्रह्मांड में घूमने लगे। शंकर जी की इस स्थिति से तीनों लोकों की व्यवस्था डगमगा गई। इसके बाद विष्णु जी अपने सुदर्शन चक्र से सती के शव के कई टुकड़े कर दिए। सती के अंग जहां जहां गिरे, वहां अलग अलग शक्तियां स्थापित हो गईं और शक्ति पीठ बन गए। नैमिषारण्य में माता का हृदय गिरा था, इसलिए ये जगह एक लिंग धारिणी शक्ति पीठ स्थल माना जाता है। यहां लिंग स्वरूप में भगवान शंकर की भी पूजा होती है, साथ ही यहां माता ललिता का एक मंदिर भी है।

देवी ललिता के प्रकट होने से जुड़ी एक और कथा है, जिसके अनुसार, माता का प्रादुर्भाव उस समय होता है, जब भगवान विष्णु द्वारा छोड़े गए सुदर्शन चक्र से पाताललोक का अस्तित्व खतरे में आ जाता है, और पूरी पृथ्वी जल में समाने लगती है। इस बात से चिंतित होकर सभी ऋषि-मुनि ललिता देवी की उपासना करते हैं। ऋषियों की प्रार्थना से प्रसन्न होकर देवी प्रकट होती हैं और इस विनाशकारी चक्र को रोक लेती हैं। जिसके बाद सृष्टि को एक बार फिर नया जीवन मिलता है।

तो यह थी ललिता जयंती से जुड़ी सम्पूर्ण जानकारी। हमें आशा है, कि इस व्रत को विधि-विधान से संपन्न करने में इस लेख से आपको सहायता मिलेगी। अगर आप आगे भी ऐसी ही धर्म से जुड़ी जानकारियों और विशेष त्योहारों से अवगत होना चाहते हैं तो बने रहिए श्री मंदिर के साथ।

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Published by Sri Mandir·January 31, 2025

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