
क्या आप जानते हैं गोवत्स द्वादशी 2025 की सही तिथि और शुभ मुहूर्त? जानें पूजा विधि और कथा के बारे में यहाँ!
कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की द्वादशी तिथि को गौमाता को समर्पित है इसलिए इसे गोवत्स द्वादशी के नाम से जाता है। कई क्षेत्रों में यह वसु बारस या नंदिनी व्रत के नाम से भी मनाई जाती है। आज इस लेख में हम आपको गोवत्स द्वादशी से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी से अवगत कराएँगे।
मुहूर्त | समय |
ब्रह्म मुहूर्त | 04:18 ए एम से 05:07 ए एम |
प्रातः सन्ध्या | 04:43 ए एम से 05:57 ए एम |
अभिजित मुहूर्त | 11:20 ए एम से 12:06 पी एम |
विजय मुहूर्त | 01:38 पी एम से 02:24 पी एम |
गोधूलि मुहूर्त | 05:29 पी एम से 05:54 पी एम |
सायाह्न सन्ध्या | 05:29 पी एम से 06:44 पी एम |
अमृत काल | 11:26 ए एम से 01:07 पी एम |
निशिता मुहूर्त | 11:18 पी एम से 12:08 ए एम, अक्टूबर 18 |
गोवत्स द्वादशी हिंदू पंचांग के अनुसार कार्तिक कृष्ण पक्ष की द्वादशी तिथि को मनाई जाती है। इस दिन गोमाता (गाय) और उनके बछड़े की पूजा की जाती है। गोवत्स का अर्थ होता है — ‘गाय का बछड़ा’। इसलिए इस तिथि को नन्दिनी व्रत या बाछ बारस के नाम से भी जाना जाता है।
गोवत्स द्वादशी का यह पर्व गाय की महिमा को समर्पित है, जो भारतीय संस्कृति में मातृ स्वरूप और समस्त देवताओं का निवास स्थान मानी गई है।
गोवत्स द्वादशी व्रत को मुख्य रूप से माताएं अपने बच्चों की दीर्घायु, स्वास्थ्य और सुरक्षा के लिए करती हैं। ऐसी मान्यता है कि इस दिन जो महिलाएं श्रद्धापूर्वक गोमाता और बछड़े की पूजा करती हैं, उन्हें संतान की रक्षा, सुख और समृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त होता है। साथ ही, जो स्त्रियाँ संतान की प्राप्ति की अभिलाषा रखती हैं, वे भी यह व्रत करती हैं।
शास्त्रों के अनुसार, इस दिन गाय की सेवा, पूजन और व्रत करने से गाय के प्रति किए गए अज्ञानजन्य अपराधों और पापों से मुक्ति मिलती है।
माताएं इस व्रत को अपनी संतान की लम्बी आयु और उनके संरक्षण के लिए रखती हैं। जो महिलाएं संतान-प्राप्ति का सुख को भोगना चाहती हैं, वे इस दिन गोमाता और बछड़े की पूजा करती हैं, और इस दिन विधिपूर्वक व्रत का पालन करती हैं। इस व्रत और पूजन करने से अज्ञानतावश गाय पर किए अत्याचारों के पाप से भी मुक्ति मिलती है।
हिन्दू संस्कृति में गौ अर्थात गाय कि महत्ता को इस बात से समझा जा सकता है, कि गाय में हर देवी-देवताओं का वास माना जाता है, इसीलिए गाय पूजनीय होती है। इस तरह गोवत्स द्वादशी गोमाता से मिलने वाले अनेक लाभों के लिए उनको आभार व्यक्त करने का शुभ अवसर है।
गोवत्स द्वादशी के दिन पूजा करने के लिए कुछ विशेष सामग्रियों की आवश्यकता होती है। पूजा में शुद्धता और श्रद्धा सबसे महत्वपूर्ण होती है। पूजन के लिए निम्न सामग्री तैयार करें —
इस दिन व्रत करने वाली महिलाएं प्रातःकाल स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें और व्रत का संकल्प लें। इसके बाद निम्न विधि से पूजा करें —
गाय और बछड़े को स्नान कराएं: उन्हें शुद्ध जल से स्नान करवाएं और नए वस्त्र या कपड़े से सजाएं।
सजावट और तिलक: गाय और बछड़े के गले में फूलों की माला पहनाएं तथा उनके माथे पर कुमकुम, हल्दी और बाजरे या मूंग से तिलक करें।
भोजन अर्पण करें: उन्हें श्रद्धा से हरा चारा, अंकुरित मूंग-मौठ, भीगे चने, गुड़ और मीठी रोटी खिलाएं।
आरती और क्षमा प्रार्थना: दीपक जलाकर गाय की आरती करें और स्नेहपूर्वक उनके चरण स्पर्श करते हुए क्षमा याचना करें।
प्रतिकात्मक पूजा का विधान: यदि घर में गाय या बछड़ा न हो, तो आस-पास की किसी गाय की पूजा करें। और यदि यह भी संभव न हो, तो गीली मिट्टी से गाय और बछड़े की प्रतीकात्मक प्रतिमा बनाकर उसकी पूजा करना शुभ माना जाता है।
गोवत्स द्वादशी व्रत में पालन किए जाने वाले कुछ नियम और आचरण इस प्रकार हैं —
गोवत्स द्वादशी व्रत का महत्व केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि आध्यात्मिक और नैतिक दृष्टि से भी अत्यंत गहरा है। यह व्रत व्यक्ति को करुणा, कृतज्ञता और धर्म के मार्ग पर अग्रसर करता है। आइए जानते हैं इस पावन व्रत से मिलने वाले प्रमुख लाभ —
1. संतान की दीर्घायु और सुख-समृद्धि
2. संतान प्राप्ति का आशीर्वाद
3. पापों से मुक्ति और आत्मशुद्धि
4. गौ-सेवा और धर्म-संवर्धन का पुण्य
5. जीवन में समृद्धि और आरोग्य की प्राप्ति
6. आध्यात्मिक लाभ और मोक्ष प्राप्ति
गोवत्स द्वादशी केवल एक व्रत नहीं, बल्कि गौमाता के प्रति कृतज्ञता और धर्म-संवर्धन का पर्व है। इस दिन का संकल्प व्यक्ति को करुणा, आस्था और पुण्य के मार्ग पर ले जाता है, जिससे उसके जीवन में हर दिशा में मंगल फल की प्राप्ति होती है।
गोवत्स द्वादशी के दिन किए गए छोटे-छोटे उपाय जीवन में बड़े परिवर्तन लाने की शक्ति रखते हैं। इस दिन गोमाता और भगवान श्रीकृष्ण की विशेष कृपा प्राप्त होती है। आइए जानते हैं इस पावन दिन के कुछ प्रमुख शुभ उपाय...
गोवत्स द्वादशी का दिन गोमाता और उनके बछड़े की पूजा के लिए अत्यंत पवित्र माना गया है। इस दिन की गई पूजा, सेवा और दान से जीवन में सुख, सौभाग्य और समृद्धि का आगमन होता है। आइए जानते हैं इस दिन किए जाने वाले शुभ कार्य —
जिस प्रकार इस दिन कुछ कार्य शुभ माने जाते हैं, उसी प्रकार कुछ कार्य निषेध भी बताए गए हैं। इन वर्जनाओं का पालन करने से व्रत का पूरा फल प्राप्त होता है
किसी समय में एक राजा हुआ करता था, जिसकी दो रानियां थी - सीता और गीता। उस राजा के पास एक भैंस और एक गाय थी। रानी सीता को भैंस अतिप्रिय थी, जबकि रानी गीता गाय को बहुत दुलार करती थी। कुछ समय बाद गाय को एक बछड़ा हुआ। एक दिन ईर्ष्यावश भैंस ने रानी सीता को गाय और उसके बछड़े के विरुद्ध कुछ बातें कही, जिनपर रानी ने विश्वास कर लिया और क्रोध में आकर बछड़े को मार दिया और उसे गेहूं के खेत में दबा दिया।
संध्या समय जब राजा भोजन करने बैठा तो उसे अपने महल में चारों ओर केवल मांस और खून दिखाई देने लगा। राजा को परोसा हुआ भोजन भी मलीन हो गया और पूरे राज्य में खून की वर्षा होने लगी। राजा कुछ समझ पाते, उससे पहले ही एक आकाशवाणी हुई, जिससे राजा को रानी सीता की करतूत का पता चला।
राजा ने दुखी मन से उस आकाशवाणी से इस समस्या का हल पूछा। आकाशवाणी से आवाज आई कि कल कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की द्वादशी है। इस दिन विधिपूर्वक व्रत करने से और गाय और बछड़े की पूजा करने से वह मृत बछड़ा जीवित हो जाएगा और आपको इस पाप से भी मुक्ति मिले जाएगी।
राजा ने ऐसा ही किया, जिससे वह बछड़ा जीवित हो गया। इसके बाद राजा ने पूरे राज्य में हर वर्ष गोवत्स द्वादशी का व्रत और पूजन करने की घोषणा की। मान्यताओं के अनुसार तब से यह पूजा और व्रत किया जा रहा है।
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