पोंगल का अर्थ क्या है?
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पोंगल का अर्थ क्या है? | Pongal Meaning in Hindi

जानिए पोंगल शब्द का अर्थ, इसका धार्मिक महत्व और पोंगल त्योहार से जुड़ा भाव।

पोंगल के अर्थ के बारे में

पोंगल शब्द का अर्थ “उफान आना” या “उबलकर ऊपर आना” होता है, जो समृद्धि और खुशहाली का प्रतीक माना जाता है। यह नाम नई फसल और भरपूर अन्न की खुशी को दर्शाता है। इस लेख में जानिए पोंगल शब्द का अर्थ और इसका सांस्कृतिक महत्व।

पोंगल का अर्थ हिंदी में

पोंगल का अर्थ और इसका सांस्कृतिक महत्व

भारत विविधताओं का देश है, जहाँ हर राज्य की अपनी अनूठी संस्कृति और परंपराएँ हैं। दक्षिण भारत, विशेषकर तमिलनाडु में मनाया जाने वाला ‘पोंगल’ एक ऐसा ही जीवंत त्योहार है। यह न केवल हर्षोल्लास का पर्व है, बल्कि यह प्रकृति, किसानों और पशुओं के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का एक माध्यम भी है। बहुत से लोग पोंगल को केवल एक त्योहार के रूप में जानते हैं, लेकिन इसके नाम और इसे मनाने के पीछे के अर्थ बहुत गहरे हैं।

पोंगल शब्द का शाब्दिक अर्थ

‘पोंगल’ शब्द तमिल भाषा से आया है। इसका शाब्दिक अर्थ होता है - “उबलना” या “ऊपर उठना”। परंपरागत रूप से, पोंगल उस पकवान का नाम भी है जिसे इस दिन मिट्टी के बर्तन में नए चावल, दूध और गुड़ डालकर बनाया जाता है। जब बर्तन में दूध उबलकर ऊपर की ओर गिरता है, तो उसे बहुत शुभ माना जाता है। दूध का उबलकर बाहर गिरना इस बात का प्रतीक है कि घर में सुख, समृद्धि और धन-धान्य की अधिकता होगी। जैसे ही बर्तन से उफान आता है, लोग खुशी से चिल्लाते हैं - "पोंगल-ओ-पोंगल!", जिसका अर्थ होता है कि "आपके घर में भी इसी तरह खुशियों का उफान आए"।

पोंगल कब और क्यों मनाया जाता है?

पोंगल मुख्य रूप से जनवरी के मध्य में मनाया जाता है, जो तमिल कैलेंडर के अनुसार ‘थाई’ महीने की शुरुआत होती है। यह उत्तर भारत के मकर संक्रांति और लोहड़ी के समान ही है। यह वह समय होता है जब सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है और सर्दी की ऋतु समाप्त होने लगती है।

यह एक फसल उत्सव है। जब किसान अपनी मेहनत से उगाई गई धान की फसल को घर लेकर आते हैं, तो वे अपनी सफलता का जश्न मनाने और सूर्य देव को धन्यवाद देने के लिए यह त्योहार मनाते हैं। तमिल में एक कहावत है - “थाई पिरंधाल वज़ी पिरक्कुम”, जिसका अर्थ है कि थाई महीने की शुरुआत के साथ ही जीवन की परेशानियों के नए रास्ते और समाधान खुलेंगे।

पोंगल के विभिन्न चरण : चार दिनों का उत्सव

पोंगल कोई एक दिन का त्योहार नहीं है, बल्कि यह चार दिनों तक चलने वाला एक विस्तृत उत्सव है। हर दिन का अपना एक विशेष महत्व और नाम है:

1. भोगी पोंगल

यह पोंगल का पहला दिन है। यह दिन भगवान इंद्र को समर्पित है, जिन्हें बारिश का देवता माना जाता है। इस दिन लोग अपने घरों की सफाई करते हैं और पुरानी, बेकार हो चुकी चीजों को जला देते हैं। यह क्रिया इस बात का प्रतीक है कि हम अपने जीवन से पुरानी बुराइयों और नकारात्मकता को निकालकर नई शुरुआत कर रहे हैं।

2. थाई पोंगल

यह मुख्य पोंगल का दिन होता है। इस दिन सूर्य देव की पूजा की जाती है। घर के आंगन में या खुले स्थान पर मिट्टी के नए बर्तन में पोंगल पकाया जाता है। इस दिन महिलाएं घर के बाहर खूबसूरत ‘कोलम‘ (रंगोली) बनाती हैं। सूर्य देव को नया चावल और पकवान अर्पित किया जाता है ताकि वे अपनी कृपा बनाए रखें।

3. मट्टू पोंगल

तीसरा दिन पशुओं, विशेषकर बैलों और गायों को समर्पित है। खेती में किसानों की मदद करने के लिए इन पशुओं का आभार व्यक्त किया जाता है। इस दिन मवेशियों को नहलाया जाता है, उनके सींगों को रंगा जाता है और उन्हें माला पहनाई जाती है।

4. कानम पोंगल

पोंगल के चौथे और अंतिम दिन को ‘कानम पोंगल’ कहा जाता है। ‘कानम’ का अर्थ है ‘देखना’ या ‘मिलना’। इस दिन लोग अपने रिश्तेदारों और दोस्तों के घर जाते हैं और एक-दूसरे को शुभकामनाएं देते हैं। बड़े बुजुर्ग छोटों को आशीर्वाद देते हैं।

पोंगल का आध्यात्मिक और सामाजिक संदेश

प्रकृति के प्रति सम्मान: यह त्योहार हमें सिखाता है कि हम जो कुछ भी खाते हैं या जिस सुख-सुविधा का आनंद लेते हैं, वह प्रकृति की देन है। सूर्य, जल, मिट्टी और पशुओं के बिना मानव जीवन संभव नहीं है। पोंगल इन सभी के प्रति सिर झुकाने का दिन है।

  • समानता का भाव: पोंगल के समय अमीर-गरीब का भेद मिट जाता है। हर कोई नए चावल से वही पारंपरिक पकवान बनाता है और खुशियां साझा करता है।

  • सादगी का महत्व: इस त्योहार में किसी दिखावे की जगह सादगी पर जोर दिया जाता है। मिट्टी का बर्तन, ताजा गन्ना, हल्दी के पौधे और केले के पत्ते - ये सभी चीजें हमें जमीन से जोड़े रखती हैं।

पोंगल दक्षिण भारत की संस्कृति का हृदय है। यह त्योहार हमें याद दिलाता है कि हमारी जड़ें मिट्टी और खेती से जुड़ी हैं। पोंगल का असली अर्थ है - “समृद्धि का उफान”।

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Published by Sri Mandir·January 15, 2026

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