शीतला सातम कब है?
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शीतला सातम कब है?

क्या आप जानना चाहते हैं कि शीतला सातम कब मनाई जाती है और इसका क्या महत्व है? इस लेख में जानिए शीतला माता के व्रत का धार्मिक महत्व, पूजा विधि, शुभ समय, पौराणिक कथा और इस दिन किए जाने वाले विशेष उपायों की पूरी जानकारी।

शीतला सातम के बारे में

शीतला सातम हिंदू धर्म का एक महत्वपूर्ण पर्व है, जो माता शीतला को समर्पित होता है। इस दिन श्रद्धालु माता शीतला की पूजा कर परिवार के सुख, स्वास्थ्य और रोगों से रक्षा की कामना करते हैं। मान्यता है कि माता शीतला चेचक और अन्य संक्रामक रोगों से रक्षा करती हैं। इस दिन बासी भोजन का भोग लगाया जाता है और घर में चूल्हा नहीं जलाया जाता। यह पर्व विशेष रूप से गुजरात और राजस्थान में श्रद्धापूर्वक मनाया जाता है।

शीतला सातम (गुजरात)

शीतला सातम गुजरात का एक प्रमुख धार्मिक और पारंपरिक पर्व है, जिसे विशेष रूप से श्रावण माह में मनाया जाता है। यह त्योहार कृष्ण पक्ष की सप्तमी तिथि को आता है। वर्ष 2026 में गुजरात में शीतला सातम 5 अगस्त, बुधवार को मनाई जाएगी। इस दिन माता शीतला की पूजा की जाती है और परिवार की सुख-शांति तथा बच्चों के अच्छे स्वास्थ्य की कामना की जाती है।

गुजरात में इस पर्व का विशेष महत्व है क्योंकि यहां लोग इसे पूरी श्रद्धा और नियमों के साथ मनाते हैं। शीतला सातम के एक दिन पहले ‘रंधन छठ’ मनाई जाती है। इस दिन घरों में अगले दिन के लिए भोजन बनाकर रख लिया जाता है, क्योंकि शीतला सातम के दिन चूल्हा नहीं जलाया जाता। मान्यता है कि इस दिन ठंडा भोजन ग्रहण करने से माता शीतला प्रसन्न होती हैं और घर को रोगों से बचाती हैं। ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में महिलाएं सुबह जल्दी उठकर स्नान करती हैं और माता शीतला के मंदिर में जाकर पूजा-अर्चना करती हैं। कई जगहों पर मेले और धार्मिक आयोजन भी किए जाते हैं।

माता को दही, ठंडा भोजन, हलवा, पूड़ी और मीठे व्यंजन अर्पित किए जाते हैं। यह पर्व केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि यह स्वच्छता, स्वास्थ्य और अनुशासन का संदेश भी देता है। पुराने समय में माना जाता था कि माता शीतला चेचक जैसी बीमारियों से रक्षा करती हैं। इसलिए लोग साफ-सफाई और सात्विक जीवन पर विशेष ध्यान देते हैं। आज भी गुजरात में यह त्योहार परंपरा और संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। परिवार के सभी सदस्य मिलकर इस दिन पूजा करते हैं और माता शीतला का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।

  • शीतला सातम पूजा मुहूर्त - 05:39 ए एम से 06:15 पी एम
  • अवधि - 12 घण्टे 36 मिनट्स
  • रांधण छठ बुधवार, सितम्बर 2, 2026 को
  • सप्तमी तिथि प्रारम्भ - सितम्बर 03, 2026 को 04:25 ए एम बजे
  • सप्तमी तिथि समाप्त - सितम्बर 04, 2026 को 02:25 ए एम बजे

जानें इस दिन का शुभ मुहूर्त

  • ब्रह्म मुहूर्त - 04:08 ए एम से 04:54 ए एम
  • प्रातः सन्ध्या - 04:31 ए एम से 05:39 ए एम
  • अभिजित मुहूर्त - 11:32 ए एम से 12:22 पी एम
  • विजय मुहूर्त - 02:03 पी एम से 02:54 पी एम
  • गोधूलि मुहूर्त - 06:15 पी एम से 06:38 पी एम
  • सायाह्न सन्ध्या - 06:15 पी एम से 07:24 पी एम
  • अमृत काल - 10:12 पी एम से 11:43 पी एम
  • निशिता मुहूर्त - 11:35 पी एम से 12:20 ए एम, 04 सितम्बर
  • रवि योग - 05:39 ए एम से 12:29 ए एम, 04 सितम्बर

शीतला सातम (गुजरात) क्या है?

शीतला सातम गुजरात का एक प्रसिद्ध धार्मिक और सांस्कृतिक त्योहार है, जिसे माता शीतला को समर्पित किया जाता है। यह पर्व मुख्य रूप से श्रावण महीने की कृष्ण पक्ष की सप्तमी तिथि को मनाया जाता है। गुजरात में इसे बड़े उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाने की परंपरा है। माता शीतला को रोगों से रक्षा करने वाली देवी माना जाता है। प्राचीन मान्यताओं के अनुसार माता शीतला चेचक और अन्य संक्रामक बीमारियों से लोगों की रक्षा करती हैं। इसी कारण लोग इस दिन विशेष पूजा-अर्चना करते हैं और परिवार की सुख-समृद्धि तथा अच्छे स्वास्थ्य की कामना करते हैं।

इस त्योहार की सबसे खास परंपरा यह है कि शीतला सातम के दिन घर में चूल्हा नहीं जलाया जाता। इसके लिए एक दिन पहले ‘रंधन छठ’ पर ही सारा भोजन तैयार कर लिया जाता है। अगले दिन वही ठंडा भोजन प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है। यह परंपरा माता शीतला को शीतलता प्रिय होने की मान्यता से जुड़ी हुई है।

गुजरात के कई गांवों और शहरों में महिलाएं सुबह जल्दी उठकर स्नान करती हैं और माता शीतला के मंदिर में जाकर पूजा करती हैं। पूजा में ठंडे पकवान, दही, लापसी, पूड़ी और मीठे व्यंजन चढ़ाए जाते हैं। कई स्थानों पर भजन-कीर्तन और धार्मिक कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं। यह त्योहार केवल आस्था का प्रतीक नहीं है, बल्कि स्वच्छता और स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता का संदेश भी देता है। लोग इस दिन घर की सफाई रखते हैं और सात्विक जीवन अपनाने की प्रेरणा लेते हैं। शीतला सातम गुजरात की संस्कृति और परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह पर्व परिवार और समाज को एक साथ जोड़ने का काम करता है और लोगों में श्रद्धा, अनुशासन और सेवा की भावना को मजबूत बनाता है।

शीतला सातम (गुजरात) का महत्व

शीतला सातम गुजरात का एक अत्यंत महत्वपूर्ण धार्मिक और सांस्कृतिक पर्व माना जाता है। यह त्योहार माता शीतला को समर्पित है, जिन्हें स्वास्थ्य और रोगों से रक्षा करने वाली देवी माना जाता है। गुजरात में यह पर्व विशेष रूप से महिलाओं और बच्चों के लिए शुभ माना जाता है। इस त्योहार का सबसे बड़ा महत्व स्वास्थ्य और स्वच्छता से जुड़ा हुआ है। प्राचीन समय में चेचक जैसी बीमारियों का खतरा अधिक रहता था। उस समय लोग माता शीतला की पूजा करके रोगों से सुरक्षा की प्रार्थना करते थे। मान्यता है कि माता शीतला की कृपा से परिवार में सुख-शांति और अच्छा स्वास्थ्य बना रहता है।

शीतला सातम अनुशासन और संयम का भी संदेश देता है। इस दिन घर में चूल्हा नहीं जलाया जाता और ठंडा भोजन ग्रहण किया जाता है। इसके पीछे यह भावना है कि जीवन में सादगी और नियमों का पालन आवश्यक है। यह परंपरा लोगों को धैर्य और श्रद्धा का महत्व भी समझाती है। गुजरात में इस पर्व का सामाजिक महत्व भी बहुत बड़ा है। परिवार के सभी सदस्य एक साथ मिलकर पूजा करते हैं और धार्मिक कार्यक्रमों में भाग लेते हैं। इससे परिवार और समाज के बीच प्रेम और एकता बढ़ती है। कई जगहों पर मेले और सामूहिक आयोजन होते हैं, जिससे लोगों को अपनी संस्कृति से जुड़ने का अवसर मिलता है।

यह पर्व पर्यावरण और स्वच्छता के प्रति जागरूकता भी बढ़ाता है। पूजा से पहले लोग घर और आसपास की सफाई करते हैं। यह आदत लोगों को स्वस्थ जीवन जीने की प्रेरणा देती है। धार्मिक दृष्टि से भी यह पर्व बहुत शुभ माना जाता है। महिलाएं अपने बच्चों और परिवार की लंबी उम्र और सुख-समृद्धि के लिए व्रत रखती हैं। इस प्रकार शीतला सातम केवल एक धार्मिक त्योहार नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, स्वच्छता, पारिवारिक एकता और भारतीय संस्कृति को मजबूत करने वाला महत्वपूर्ण पर्व है।

शीतला सातम (गुजरात) का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व

शीतला सातम गुजरात का एक प्रमुख धार्मिक पर्व है, जिसका संबंध माता शीतला की पूजा और श्रद्धा से जुड़ा हुआ है। इस दिन भक्त माता शीतला की आराधना करके परिवार के स्वास्थ्य, सुख और शांति की कामना करते हैं। धार्मिक मान्यता है कि माता शीतला रोगों और नकारात्मक शक्तियों से रक्षा करती हैं। प्राचीन समय में लोग चेचक जैसी गंभीर बीमारियों से बचने के लिए माता शीतला की पूजा करते थे। उन्हें रोगों को दूर करने वाली देवी माना जाता है। इसलिए इस दिन विशेष रूप से महिलाएं व्रत रखती हैं और माता से अपने बच्चों और परिवार की सुरक्षा की प्रार्थना करती हैं।

आध्यात्मिक रूप से यह पर्व मन और शरीर की शुद्धि का प्रतीक माना जाता है। शीतला सातम के दिन ठंडा भोजन ग्रहण करने की परंपरा है। इसका संदेश यह है कि व्यक्ति को जीवन में शांति, संतुलन और संयम बनाए रखना चाहिए। यह पर्व हमें क्रोध, अहंकार और नकारात्मक सोच से दूर रहने की प्रेरणा देता है। इस दिन लोग सुबह जल्दी उठकर स्नान करते हैं और मंदिर जाकर पूजा-अर्चना करते हैं। माता को दही, ठंडे पकवान और मीठे व्यंजन अर्पित किए जाते हैं। भजन-कीर्तन और धार्मिक कथा सुनने से लोगों में सकारात्मक ऊर्जा और श्रद्धा बढ़ती है।

शीतला सातम आत्मविश्वास और आस्था को मजबूत करने वाला पर्व भी माना जाता है। जब पूरा परिवार एक साथ पूजा करता है, तो आपसी प्रेम और विश्वास बढ़ता है। धार्मिक वातावरण मन को शांति और संतोष प्रदान करता है। यह पर्व हमें स्वच्छता और सात्विक जीवन का महत्व भी सिखाता है। पूजा से पहले घर की सफाई करना और पवित्रता बनाए रखना आध्यात्मिक अनुशासन का हिस्सा माना जाता है। इस प्रकार शीतला सातम केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि श्रद्धा, आत्मशुद्धि, संयम और सकारात्मक जीवन का संदेश देने वाला महत्वपूर्ण धार्मिक और आध्यात्मिक पर्व है।

शीतला सातम (गुजरात) से जुड़ी परंपराएं और जागरूकता

शीतला सातम गुजरात का एक पारंपरिक और धार्मिक पर्व है, जो कई विशेष रीति-रिवाजों और मान्यताओं से जुड़ा हुआ है। इस त्योहार को लोग पूरी श्रद्धा और अनुशासन के साथ मनाते हैं। इसका उद्देश्य केवल पूजा करना नहीं, बल्कि स्वच्छता, स्वास्थ्य और सामाजिक जागरूकता को बढ़ावा देना भी है। इस पर्व की सबसे महत्वपूर्ण परंपरा ‘रंधन छठ’ से जुड़ी है। शीतला सातम से एक दिन पहले घरों में भोजन बनाकर रख लिया जाता है, क्योंकि अगले दिन चूल्हा नहीं जलाया जाता। लोग ठंडा भोजन ग्रहण करते हैं और इसे माता शीतला का प्रसाद मानते हैं। यह परंपरा आज भी गुजरात के कई परिवारों में निभाई जाती है।

महिलाएं सुबह जल्दी उठकर स्नान करती हैं और माता शीतला की पूजा करती हैं। मंदिरों में जाकर दीप जलाए जाते हैं और दही, पूड़ी, मीठे पकवान तथा अन्य ठंडे व्यंजन चढ़ाए जाते हैं। कई जगहों पर भजन-कीर्तन और धार्मिक कथाओं का आयोजन भी होता है। इस त्योहार के माध्यम से लोगों में स्वच्छता के प्रति जागरूकता बढ़ाई जाती है। प्राचीन समय में माना जाता था कि गंदगी से बीमारियां फैलती हैं, इसलिए लोग घर और आसपास की सफाई पर विशेष ध्यान देते थे। आज भी यह पर्व साफ-सफाई और स्वास्थ्य का महत्व समझाने का काम करता है।

शीतला सातम समाज में एकता और पारिवारिक प्रेम को भी बढ़ावा देता है। परिवार के सभी सदस्य एक साथ पूजा करते हैं और प्रसाद ग्रहण करते हैं। इससे रिश्तों में अपनापन और सामंजस्य बढ़ता है। आज के समय में यह पर्व स्वास्थ्य जागरूकता का भी संदेश देता है। लोग साफ भोजन, स्वच्छ वातावरण और अनुशासित जीवनशैली अपनाने की प्रेरणा लेते हैं। इस प्रकार शीतला सातम से जुड़ी परंपराएं भारतीय संस्कृति की सुंदर झलक प्रस्तुत करती हैं और लोगों को स्वास्थ्य, स्वच्छता तथा धार्मिक आस्था के प्रति जागरूक बनाती हैं।

शीतला सातम (गुजरात) की तैयारी कैसे की जाती है?

शीतला सातम गुजरात का एक प्रमुख धार्मिक पर्व है और इसकी तैयारी लोग कई दिन पहले से शुरू कर देते हैं। इस त्योहार को श्रद्धा और नियमों के साथ मनाया जाता है, इसलिए घरों में विशेष उत्साह देखने को मिलता है। सबसे पहले लोग अपने घर की साफ-सफाई करते हैं। माना जाता है कि स्वच्छ वातावरण में माता शीतला का आशीर्वाद प्राप्त होता है। महिलाएं रसोई और पूजा स्थल को विशेष रूप से साफ करती हैं। कई परिवार घर को सजाते भी हैं। शीतला सातम की तैयारी में “रंधन छठ” का बहुत महत्व होता है। यह पर्व शीतला सातम से एक दिन पहले मनाया जाता है। इस दिन अगले दिन के लिए पूरा भोजन बनाकर रख लिया जाता है, क्योंकि शीतला सातम के दिन चूल्हा नहीं जलाया जाता। लोग पूड़ी, सब्जी, लापसी, दही, मिठाई और अन्य पारंपरिक व्यंजन तैयार करते हैं।

महिलाएं पूजा की सामग्री भी पहले से एकत्र करती हैं। इसमें दीपक, अगरबत्ती, फूल, नारियल, दही और माता को चढ़ाने वाले ठंडे पकवान शामिल होते हैं। कई लोग मंदिर जाकर विशेष पूजा की तैयारी भी करते हैं। बच्चों और परिवार के अच्छे स्वास्थ्य की कामना के लिए महिलाएं व्रत रखने का संकल्प लेती हैं। पूजा के लिए नए या साफ कपड़े तैयार किए जाते हैं। गांवों और शहरों में कई जगह धार्मिक आयोजन और भजन-कीर्तन की भी तैयारी होती है। कुछ स्थानों पर मेले और सामूहिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं, इसलिए लोग उनमें भाग लेने की योजना भी बनाते हैं। मंदिरों में विशेष सजावट की जाती है और भक्त बड़ी संख्या में दर्शन के लिए पहुंचते हैं। यह तैयारी केवल धार्मिक आस्था का हिस्सा नहीं होती, बल्कि परिवार को एक साथ जोड़ने का अवसर भी बनती है। सभी सदस्य मिलकर काम करते हैं और त्योहार की खुशी साझा करते हैं। इस प्रकार शीतला सातम की तैयारी श्रद्धा, स्वच्छता, अनुशासन और पारिवारिक सहयोग का सुंदर उदाहरण मानी जाती है।

शीतला सातम (गुजरात) कैसे मनाया जाता है?

शीतला सातम गुजरात का एक प्रमुख धार्मिक त्योहार है, जिसे पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। यह पर्व माता शीतला को समर्पित होता है और विशेष रूप से महिलाओं द्वारा बड़ी आस्था से मनाया जाता है। इस त्योहार की शुरुआत ‘रंधन छठ’ से होती है। शीतला सातम से एक दिन पहले घरों में अगले दिन के लिए भोजन तैयार कर लिया जाता है। अगले दिन चूल्हा नहीं जलाया जाता और सभी लोग ठंडा भोजन ग्रहण करते हैं। इसे माता शीतला की परंपरा और श्रद्धा का प्रतीक माना जाता है।

शीतला सातम के दिन महिलाएं सुबह जल्दी उठकर स्नान करती हैं और साफ कपड़े पहनती हैं। इसके बाद माता शीतला की पूजा की जाती है। लोग मंदिरों में जाकर दीपक जलाते हैं और माता को दही, पूड़ी, मिठाई तथा अन्य ठंडे व्यंजन अर्पित करते हैं। गुजरात के कई इलाकों में इस दिन मेले और धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। भजन-कीर्तन और कथा सुनने के लिए बड़ी संख्या में लोग मंदिरों में पहुंचते हैं। कई परिवार घर में भी पूजा और आरती करते हैं। इस दिन महिलाएं अपने बच्चों और परिवार की सुख-समृद्धि तथा अच्छे स्वास्थ्य की प्रार्थना करती हैं। माना जाता है कि माता शीतला की कृपा से परिवार रोगों और परेशानियों से सुरक्षित रहता है।

शीतला सातम का त्योहार सामाजिक रूप से भी लोगों को जोड़ता है। रिश्तेदार और पड़ोसी एक-दूसरे के घर जाकर प्रसाद बांटते हैं और शुभकामनाएं देते हैं। इससे समाज में प्रेम और भाईचारा बढ़ता है। यह पर्व स्वच्छता और अनुशासन का संदेश भी देता है। लोग घर और आसपास की सफाई रखते हैं और सात्विक जीवन अपनाने की प्रेरणा लेते हैं। इस प्रकार शीतला सातम धार्मिक आस्था, पारिवारिक प्रेम, सामाजिक एकता और भारतीय संस्कृति का सुंदर प्रतीक माना जाता है।

शीतला सातम (गुजरात) के दिन किए जाने वाले कार्य

शीतला सातम गुजरात का एक महत्वपूर्ण धार्मिक पर्व है और इस दिन कई विशेष कार्य किए जाते हैं। लोग इस दिन माता शीतला की पूजा करके परिवार की सुख-शांति और अच्छे स्वास्थ्य की कामना करते हैं। सुबह जल्दी उठकर स्नान करना इस दिन की मुख्य परंपराओं में शामिल है। महिलाएं और परिवार के अन्य सदस्य साफ कपड़े पहनकर पूजा की तैयारी करते हैं। इसके बाद घर या मंदिर में माता शीतला की आराधना की जाती है। इस दिन चूल्हा नहीं जलाया जाता। शीतला सातम से एक दिन पहले “रंधन छठ” पर भोजन तैयार कर लिया जाता है। लोग उसी ठंडे भोजन को प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं। इसमें पूड़ी, सब्जी, दही, लापसी और मिठाइयां शामिल होती हैं।

माता शीतला को फूल, नारियल, दही और ठंडे पकवान अर्पित किए जाते हैं। कई महिलाएं व्रत रखती हैं और अपने बच्चों तथा परिवार के स्वास्थ्य की प्रार्थना करती हैं। मंदिरों में विशेष पूजा और आरती का आयोजन किया जाता है। भजन-कीर्तन और धार्मिक कथाएं सुनना भी इस दिन का महत्वपूर्ण हिस्सा होता है। कई स्थानों पर मेले और सामूहिक धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं, जहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल होते हैं। इस दिन लोग घर और आसपास की साफ-सफाई पर विशेष ध्यान देते हैं। स्वच्छता को माता शीतला की कृपा प्राप्त करने का महत्वपूर्ण माध्यम माना जाता है। कई परिवार गरीबों और जरूरतमंदों को भोजन और दान भी देते हैं। इसे पुण्य का कार्य माना जाता है। समाज में प्रेम और भाईचारे को बढ़ाने के लिए लोग एक-दूसरे को शुभकामनाएं भी देते हैं। शीतला सातम के दिन किए जाने वाले ये कार्य धार्मिक आस्था के साथ-साथ अनुशासन, स्वच्छता और सामाजिक एकता का संदेश देते हैं। यही कारण है कि यह पर्व गुजरात की संस्कृति में विशेष स्थान रखता है।

शीतला सातम (गुजरात) का संदेश

शीतला सातम गुजरात का एक धार्मिक और सांस्कृतिक पर्व है, जो समाज को कई महत्वपूर्ण संदेश देता है। यह त्योहार केवल पूजा-अर्चना तक सीमित नहीं है, बल्कि जीवन को बेहतर बनाने की प्रेरणा भी देता है। इस पर्व का सबसे बड़ा संदेश स्वच्छता और स्वास्थ्य से जुड़ा हुआ है। प्राचीन समय में लोग मानते थे कि साफ-सफाई रखने से बीमारियों से बचाव होता है। इसलिए शीतला सातम के अवसर पर घर और आसपास की सफाई पर विशेष ध्यान दिया जाता है। आज के समय में भी यह संदेश उतना ही महत्वपूर्ण है।

यह पर्व अनुशासन और संयम का महत्व भी समझाता है। शीतला सातम के दिन चूल्हा नहीं जलाया जाता और पहले से बना भोजन ग्रहण किया जाता है। यह परंपरा हमें सादगी और नियमों का पालन करने की प्रेरणा देती है। शीतला सातम परिवार और समाज में एकता बढ़ाने का भी संदेश देता है। लोग मिलकर पूजा करते हैं, प्रसाद बांटते हैं और एक-दूसरे को शुभकामनाएं देते हैं। इससे रिश्तों में प्रेम और अपनापन मजबूत होता है। यह त्योहार महिलाओं की श्रद्धा और परिवार के प्रति उनकी जिम्मेदारी को भी दर्शाता है। महिलाएं अपने बच्चों और परिवार की सुख-समृद्धि तथा अच्छे स्वास्थ्य के लिए व्रत और पूजा करती हैं।

आध्यात्मिक रूप से यह पर्व मन को शांत रखने और सकारात्मक सोच अपनाने की प्रेरणा देता है। माता शीतला की पूजा से लोगों में विश्वास और आत्मबल बढ़ता है। आज के समय में शीतला सातम पर्यावरण और स्वच्छ जीवनशैली का संदेश भी देता है। साफ भोजन, स्वच्छ वातावरण और सात्विक जीवन अपनाने से स्वस्थ समाज का निर्माण होता है। इस प्रकार शीतला सातम हमें स्वच्छता, स्वास्थ्य, अनुशासन, पारिवारिक प्रेम और सामाजिक एकता का महत्व समझाने वाला प्रेरणादायक पर्व है।

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Published by Sri Mandir·July 1, 2026

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