प्रदोष व्रत कब है?
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प्रदोष व्रत कब है?

क्या आप जानना चाहते हैं कि प्रदोष व्रत कब रखा जाएगा और इसका धार्मिक महत्व क्या है? इस लेख में जानिए प्रदोष व्रत की सही तिथि, पूजा विधि, कथा, शुभ समय और भगवान शिव को प्रसन्न करने के विशेष उपायों की पूरी जानकारी।

प्रदोष व्रत के बारे में

प्रदोष व्रत भगवान शिव को समर्पित एक पवित्र व्रत है, जो हर महीने की त्रयोदशी तिथि को रखा जाता है। मान्यता है कि इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करने से जीवन के दुख, रोग और बाधाएं दूर होती हैं। भक्त शाम के समय शिव पूजा, अभिषेक और मंत्र जाप करते हैं। प्रदोष व्रत से सुख-समृद्धि, मानसिक शांति और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है।

प्रदोष व्रत कब कब है?

अगर आप 2026 में भगवान शिव और माता पार्वती का आशीर्वाद प्राप्त करना चाहते हैं, तो प्रदोष व्रत एक अत्यंत शुभ और प्रभावशाली अवसर है। यह व्रत हर महीने दो बार आता है - एक शुक्ल पक्ष और दूसरा कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि पर। संध्या काल, जिसे प्रदोष काल कहा जाता है, इस व्रत का सबसे पवित्र समय माना जाता है, जब शिव पूजा का विशेष महत्व होता है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन विधि-विधान से भगवान शिव की आराधना करने से व्यक्ति के जीवन में सुख, शांति और समृद्धि आती है। साथ ही, माता पार्वती की पूजा करने से दांपत्य जीवन में प्रेम और संतुलन बना रहता है। यह व्रत न केवल आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त करता है, बल्कि जीवन के कष्टों को दूर करने में भी सहायक माना जाता है।

ऐसे में अब सवाल यह है कि वर्ष 2026 में प्रदोष व्रत किन-किन तिथियों पर पड़ेंगे आइए इसकी पूरी सूची जानते हैं।

प्रदोष व्रत नामतिथिपूजा का समय

प्रदोष व्रत (शुक्ल)

गुरुवार, 01 जनवरी

05:35 PM - 08:19 PM

प्रदोष व्रत (कृष्ण)

शुक्रवार, 16 जनवरी

05:47 PM - 08:29 PM

प्रदोष व्रत (शुक्ल)

शुक्रवार, 30 जनवरी

05:59 PM - 08:37 PM

शनि प्रदोष व्रत (कृष्ण)

शनिवार, 14 फरवरी

06:10 PM - 08:44 PM

शनि प्रदोष व्रत (शुक्ल)

शनिवार, 28 फरवरी

06:21 PM - 07:09 PM

सोम प्रदोष व्रत (कृष्ण)

सोमवार, 16 मार्च

06:30 PM - 08:54 PM

सोम प्रदोष व्रत (शुक्ल)

सोमवार, 30 मार्च

06:38 PM - 08:57 PM

प्रदोष व्रत (कृष्ण)

बुधवार, 15 अप्रैल

06:47 PM - 09:00 PM

भौम प्रदोष व्रत (शुक्ल)

मंगलवार, 28 अप्रैल

06:54 PM - 09:04 PM

प्रदोष व्रत (कृष्ण)

गुरुवार, 14 मई

07:04 PM - 09:09 PM

प्रदोष व्रत (शुक्ल)

गुरुवार, 28 मई

07:12 PM - 09:15 PM

प्रदोष व्रत (कृष्ण)

शुक्रवार, 12 जून

07:36 PM - 09:20 PM

शनि प्रदोष व्रत (शुक्ल)

शनिवार, 27 जून

07:23 PM - 09:23 PM

प्रदोष व्रत (कृष्ण)

रविवार, 12 जुलाई

07:22 PM - 09:24 PM

प्रदोष व्रत (शुक्ल)

रविवार, 26 जुलाई

07:16 PM - 09:21 PM

सोम प्रदोष व्रत (कृष्ण)

सोमवार, 10 अगस्त

07:05 PM - 09:14 PM

भौम प्रदोष व्रत (शुक्ल)

मंगलवार, 25 अगस्त

06:51 PM - 09:04 PM

भौम प्रदोष व्रत (कृष्ण)

मंगलवार, 08 सितंबर

06:35 PM - 08:52 PM

प्रदोष व्रत (शुक्ल)

गुरुवार, 24 सितंबर

06:16 PM - 08:39 PM

प्रदोष व्रत (कृष्ण)

गुरुवार, 08 अक्टूबर

05:59 PM - 08:27 PM

प्रदोष व्रत (शुक्ल)

शुक्रवार, 23 अक्टूबर

05:44 PM - 08: 16 PM

प्रदोष व्रत (कृष्ण)

शुक्रवार, 06 नवंबर

06:33 PM - 08:09 PM

प्रदोष व्रत (शुक्ल)

रविवार, 22 नवंबर

05:25 PM - 08:06 PM

प्रदोष व्रत (कृष्ण)

रविवार, 06 दिसंबर

05:24 PM - 08:07 PM

सोम प्रदोष व्रत (शुक्ल)

सोमवार, 21 दिसंबर

05:36 PM - 08:13 PM

प्रदोष व्रत क्या है?

प्रदोष व्रत हिन्दू धर्म में भगवान शिव को समर्पित एक अत्यंत महत्वपूर्ण व्रत है, जो हर महीने दो बार—कृष्ण और शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि को रखा जाता है। इसका मुख्य समय सूर्यास्त के बाद का संध्या काल, यानी प्रदोष काल होता है, जिसे पूजा के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है।

मान्यता है कि इस समय भगवान शिव कैलाश पर्वत पर दिव्य नृत्य करते हैं, इसलिए उनकी आराधना विशेष फलदायी होती है। श्रद्धालु व्रत रखकर शिवलिंग की पूजा करते हैं और जीवन के कष्टों से मुक्ति तथा मनोकामनाओं की पूर्ति की प्रार्थना करते हैं।

हिन्दू परंपरा में व्रत-उपवास को आत्मशुद्धि और आध्यात्मिक उन्नति का माध्यम माना गया है। प्रदोष व्रत भी पापों का नाश कर सुख, शांति और समृद्धि प्रदान करता है। सप्ताह के दिन के अनुसार इसके अलग-अलग स्वरूप—जैसे सोम प्रदोष और शनि प्रदोष—विशेष फल देते हैं। दक्षिण भारत में इसे “प्रदोषम” के नाम से भी श्रद्धापूर्वक मनाया जाता है।

प्रदोष व्रत का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व

प्रदोष व्रत हिन्दू परंपरा में भगवान शिव की उपासना का अत्यंत पावन और प्रभावशाली माध्यम माना जाता है। ‘प्रदोष’ शब्द का अर्थ है दिन और रात के संधिकाल का वह विशेष समय, जब वातावरण आध्यात्मिक ऊर्जा से भरपूर होता है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस व्रत को श्रद्धा और नियमपूर्वक करने से पापों का क्षय होता है और मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है। पुराणों में वर्णित है कि एक प्रदोष व्रत का पुण्य दो गायों के दान के बराबर माना गया है। यही कारण है कि इसे अन्य व्रतों की तुलना में अधिक फलदायी और शुभ माना जाता है।

पौराणिक कथाओं में प्रदोष काल का विशेष महत्व बताया गया है। माना जाता है कि इसी समय भगवान शिव ने समुद्र मंथन के दौरान निकले विष का पान कर सृष्टि की रक्षा की थी। इस त्याग और करुणा की स्मृति में यह समय शिव भक्ति के लिए अत्यंत श्रेष्ठ माना जाता है। साथ ही, यह भी मान्यता है कि प्रदोष काल में भगवान शिव और माता पार्वती भक्तों पर विशेष कृपा करते हैं और उनकी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं।

सांस्कृतिक दृष्टि से भी प्रदोष व्रत लोगों को अनुशासन, संयम और भक्ति का संदेश देता है। इस दिन व्रती प्रातः और संध्या समय भगवान शिव की विधि-विधान से पूजा करते हैं, बेलपत्र, गंगाजल, धूप-दीप अर्पित करते हैं और कई श्रद्धालु निर्जल व्रत भी रखते हैं। दक्षिण भारत में इसे “प्रदोषम” के नाम से बड़े उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है, जहां मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना और दीपदान का आयोजन होता है।

प्रदोष व्रत से जुड़ी परंपराएं और मान्यताएं

वार के अनुसार महत्व - प्रदोष व्रत का फल उस दिन के अनुसार बदलता है, जिस दिन यह पड़ता है। हर वार किसी विशेष इच्छा या उद्देश्य से जुड़ा होता है, इसलिए भक्त अपनी मनोकामना के अनुसार व्रत रखते हैं।

रविवार प्रदोष - इस दिन व्रत रखने से आयु में वृद्धि और अच्छे स्वास्थ्य की प्राप्ति मानी जाती है। यह शारीरिक ऊर्जा और रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करने का प्रतीक भी है।

सोम प्रदोष (सोमवार) - इसे सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। यह व्रत विशेष रूप से मनोकामनाओं की पूर्ति, मानसिक शांति और वैवाहिक सुख के लिए किया जाता है।

भौम प्रदोष (मंगलवार) - मंगलवार के दिन किया गया व्रत रोगों से मुक्ति और स्वास्थ्य लाभ देने वाला माना जाता है। यह नकारात्मक ऊर्जा और बाधाओं को दूर करने में सहायक माना जाता है।

बुध प्रदोष (बुधवार) - इस दिन व्रत रखने से बुद्धि, विवेक और कार्यों में सफलता प्राप्त होती है। इसे इच्छापूर्ति और करियर में उन्नति से भी जोड़ा जाता है।

गुरु प्रदोष (गुरुवार) - यह व्रत शत्रुओं पर विजय, सम्मान और सामाजिक प्रतिष्ठा बढ़ाने वाला माना जाता है। गुरु कृपा प्राप्त करने के लिए भी यह शुभ होता है।

शुक्र प्रदोष (शुक्रवार) - शुक्रवार का प्रदोष व्रत सौभाग्य, धन-समृद्धि और दांपत्य जीवन में सुख-शांति लाने वाला माना जाता है। यह रिश्तों में मधुरता बढ़ाने का प्रतीक है।

शनि प्रदोष (शनिवार) - इस दिन का व्रत संतान प्राप्ति, परिवार की खुशहाली और कठिनाइयों से मुक्ति के लिए किया जाता है। शनि दोष शांति के लिए भी इसे महत्वपूर्ण माना जाता है।

व्रत रखने की परंपरा - भक्त सुबह स्नान करके व्रत का संकल्प लेते हैं और दिनभर संयम रखते हैं। कई लोग निर्जल व्रत रखते हैं, जबकि कुछ फलाहार का पालन करते हैं।

प्रदोष काल में पूजा का महत्व - सूर्यास्त के बाद और रात्रि से पहले का समय अत्यंत शुभ माना जाता है। इस दौरान भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करने से कई गुना अधिक फल प्राप्त होता है।

पूजा विधि से जुड़ी मान्यताएं - शिवलिंग पर जल, दूध, बेलपत्र, धतूरा आदि अर्पित किए जाते हैं। दीपक जलाकर आरती और मंत्र जाप किया जाता है, जिससे सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

मंदिर और सामूहिक परंपराएं - कई स्थानों पर इस दिन मंदिरों में रुद्राभिषेक, भजन-कीर्तन और विशेष पूजा का आयोजन होता है।

आध्यात्मिक और मानसिक लाभ - यह व्रत केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि मानसिक शांति, आत्मसंयम और सकारात्मक सोच विकसित करने का माध्यम भी माना जाता है।

प्रदोष व्रत कैसे मनाया जाता है?

प्रदोष व्रत भगवान शिव की उपासना का एक विशेष अनुष्ठान है, जिसे पूरे दिन के संयम और संध्या काल की पूजा के साथ पूर्ण किया जाता है। इस व्रत की शुरुआत प्रातःकाल से ही हो जाती है। भक्त सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करते हैं, स्वच्छ वस्त्र धारण करते हैं और व्रत का संकल्प लेते हैं। दिनभर उपवास रखा जाता है—कुछ लोग निर्जल रहते हैं, जबकि कुछ फलाहार या केवल जल ग्रहण करते हैं।

दिन के समय में शिव मंत्रों जैसे “ॐ नमः शिवाय” या महामृत्युंजय मंत्र का जाप, भजन और व्रत कथा सुनना या पढ़ना शुभ माना जाता है। शाम के समय, यानी प्रदोष काल में, यह व्रत अपने चरम पर होता है। इस समय भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा विशेष फलदायी मानी जाती है। पूजा के अंत में आरती की जाती है और व्रत का पारण किया जाता है, हालांकि कुछ श्रद्धालु अगले दिन पारण करते हैं।

प्रदोष व्रत की तैयारी कैसे की जाती है?

  • प्रदोष व्रत की तैयारी विशेष रूप से संध्या पूजा के लिए की जाती है, क्योंकि यही समय सबसे पवित्र माना गया है।
  • शाम को सूर्यास्त से पहले पूजा स्थल को अच्छी तरह साफ किया जाता है और गंगाजल या स्वच्छ जल से शुद्ध किया जाता है।
  • कुछ परंपराओं में गाय के गोबर से मंडप तैयार किया जाता है और रंगोली से उसे सजाया जाता है, जो पवित्रता और शुभता का प्रतीक है।
  • शिवलिंग या भगवान शिव की प्रतिमा के साथ माता पार्वती और नंदी की स्थापना की जाती है। पूजा के लिए बेलपत्र, चंदन, फूल, धूप, दीप, फल और नैवेद्य आदि सामग्री तैयार रखी जाती है।
  • प्रदोष काल में उत्तर-पूर्व दिशा की ओर मुख करके कुशा के आसन पर बैठकर पूजा की जाती है। शिवलिंग का अभिषेक जल, दूध, दही, शहद और घी से किया जाता है (सामर्थ्य अनुसार)। इसके बाद बेलपत्र, फूल अर्पित कर दीप जलाया जाता है।
  • पूजा के दौरान “ॐ नमः शिवाय” और महामृत्युंजय मंत्र का जाप किया जाता है। साथ ही, उस दिन की प्रदोष व्रत कथा सुनना या पढ़ना भी आवश्यक माना जाता है।
  • भगवान शिव के वाहन नंदी की पूजा भी की जाती है, क्योंकि उन्हें शिवजी का परम भक्त और द्वारपाल माना जाता है।
  • पूजा के अंत में आरती की जाती है और भगवान से क्षमा याचना कर व्रत का समापन किया जाता है। इसके बाद व्रत का पारण किया जाता है।
  • व्रत के दौरान सात्विकता और संयम बनाए रखें। मन, वचन और कर्म से पवित्रता का पालन करें। क्रोध, नकारात्मकता और असत्य से दूर रहें। अपनी क्षमता के अनुसार ही नियमों का पालन करें, अति करना आवश्यक नहीं है।

प्रदोष व्रत में किए जाने वाले पवित्र कार्य

  • प्रदोष व्रत आत्मशुद्धि और आध्यात्मिक उन्नति का माध्यम माना जाता है। यह व्यक्ति के पापों और पूर्व जन्म के कर्मों के प्रभाव को कम करने में सहायक होता है।

  • इस व्रत को करने से घर में सुख-समृद्धि, शांति और स्वास्थ्य बना रहता है। दांपत्य जीवन में प्रेम और सामंजस्य बढ़ता है। संतान प्राप्ति की इच्छा रखने वाले दंपत्तियों के लिए भी यह व्रत अत्यंत फलदायी माना जाता है।

  • उपवास और संध्या काल की पूजा मन को शांति और स्थिरता प्रदान करती है। मंत्र जाप और ध्यान से तनाव कम होता है और एकाग्रता बढ़ती है।

  • नियमित व्रत और अनुशासन व्यक्ति के जीवन में संयम और संतुलन लाता है। सात्विक आहार और ध्यान-पूजा से शरीर और मन दोनों शुद्ध होते हैं, जिससे संपूर्ण जीवन में सकारात्मक परिवर्तन देखने को मिलता है।

प्रदोष व्रत का ज्योतिषीय महत्व

ज्योतिष के अनुसार यह समय विशेष ऊर्जा से भरपूर होता है, जिसे प्रदोष काल कहा जाता है। ज्योतिष में प्रदोष काल सूर्यास्त के आसपास का समय होता है, जब दिन और रात का संधिकाल बनता है। इस समय सूर्य और चंद्रमा की ऊर्जा संतुलन में होती है। माना जाता है कि इस काल में भगवान शिव का तांडव होता है, जिससे नकारात्मक ऊर्जा नष्ट होती है। ज्योतिष में चंद्रमा को मन का कारक माना जाता है। त्रयोदशी तिथि चंद्रमा की विशेष स्थिति को दर्शाती है। इस दिन व्रत रखने और पूजा करने से मानसिक शांति मिलती है।

चंद्र दोष (मन की अशांति, तनाव) कम होता है। राहु और केतु को छाया ग्रह माना जाता है। प्रदोष व्रत करने से इनके अशुभ प्रभाव कम होते हैं। जीवन में आने वाली बाधाएं और भ्रम दूर होते हैं।

हिंदू धर्म में प्रदोष व्रत का महत्व

मान्यता है कि प्रदोष काल में भगवान शिव अपने भक्तों की प्रार्थनाओं को शीघ्र स्वीकार करते हैं, इसलिए इस समय की गई पूजा का विशेष महत्व माना जाता है। सच्ची श्रद्धा से की गई शिव-भक्ति जीवन के दुखों और कष्टों को दूर करने में सहायक होती है।

प्रदोष व्रत का पालन करने से पूर्व जन्म और वर्तमान जीवन के पापों का नाश होता है तथा आत्मा शुद्ध होकर मोक्ष के मार्ग की ओर अग्रसर होती है। यह व्रत मनोकामनाओं की पूर्ति का भी एक प्रभावी माध्यम माना गया है—चाहे वह विवाह, संतान, धन या सुख-समृद्धि से जुड़ी इच्छाएँ हों। साथ ही, प्रदोष व्रत पारिवारिक जीवन में प्रेम, सामंजस्य और शांति को बढ़ाता है। वैवाहिक संबंधों में मधुरता आती है और आपसी कलह कम होती है।

प्रदोष व्रत का आध्यात्मिक महत्व

प्रदोष व्रत आत्मा की शुद्धि का एक प्रभावी साधन है। उपवास, ध्यान और पूजा के माध्यम से व्यक्ति क्रोध, लोभ और अहंकार जैसी नकारात्मक प्रवृत्तियों पर नियंत्रण पाता है, जिससे आत्मिक जागृति का मार्ग खुलता है। प्रदोष काल संध्या का शांत समय होता है, जब भगवान शिव की उपासना करने से मन को शांति मिलती है और चित्त स्थिर होता है। यह व्रत व्यक्ति को भक्ति के मार्ग पर आगे बढ़ाता है और ईश्वर के साथ उसका आत्मिक संबंध मजबूत करता है। साथ ही, प्रदोष व्रत कर्मों की शुद्धि में सहायक होता है, अच्छे कर्मों की प्रेरणा देता है और साधक को मोक्ष की दिशा में अग्रसर करता है।

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Published by Sri Mandir·May 29, 2026

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