अंडाल जयंती क्या है?
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अंडाल जयंती क्या है?

क्या आप जानना चाहते हैं कि अंडाल जयंती क्यों मनाई जाती है और इसका क्या महत्व है? इस लेख में जानिए देवी अंडाल के जन्मोत्सव का धार्मिक महत्व, पूजा विधि, कथा और इस दिन किए जाने वाले विशेष उपायों की पूरी जानकारी।

अंडाल जयंती के बारे में

अंडाल जयंती दक्षिण भारत का एक अत्यंत पवित्र और भावनात्मक पर्व है, जो भक्ति, प्रेम और समर्पण की अद्भुत मिसाल प्रस्तुत करता है। यह दिन देवी अंडाल के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है, जिन्हें भगवान विष्णु की अनन्य भक्त और आलवार संतों में एकमात्र महिला संत के रूप में सम्मान प्राप्त है। विशेष रूप से तमिलनाडु में यह पर्व बड़े हर्ष और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है, लेकिन आज के समय में पूरे भारत में वैष्णव भक्त इसे भक्ति भाव से मनाते हैं।

1.अंडाल जयंती कब है?2.इस दिन के प्रमुख शुभ मुहूर्त3.अंडाल जयंती क्या है?4.क्यों मनाते हैं अंडाल जयंती?5.अंडाल जयंती का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व6.अंडाल जयंती से जुड़ी परंपराएं और मान्यताएं7.अंडाल जयंती कैसे मनाई जाती है?8.अंडाल जयंती की तैयारी कैसे की जाती है?9.अंडाल जयंती पर किसकी पूजा करनी चाहिए?10.अंडाल जयंती के दिन पूजा कैसे करें? क्या है पूजा विधि11.अंडाल जयंती में किए जाने वाले पवित्र कार्य12.अंडाल जयंती के दिन किए जाने वाले शुभ कार्य13.अंडाल जयंती का ज्योतिषीय महत्व14.हिंदू धर्म में अंडाल जयंती का महत्व 15.अंडाल जयंती का आध्यात्मिक महत्व16.अंडाल जयंती मनाने के लाभ17.अंडाल जयंती व आदिपूरम में अंतर

अंडाल जयंती कब है?

वर्ष 2026 में अंडाल जयंती 14 अगस्त 2026, शुक्रवार के दिन मनाई जाएगी। यह तिथि तमिल पंचांग के अनुसार आदि मास में पूरम नक्षत्र पर आती है, जिसे “आदिपूरम” भी कहा जाता है।

अंडाल जयंती:

  • अंडाल जयन्ती - 14 अगस्त 2026, शुक्रवार
  • तमिल कैलेण्डर पर आधारित

इस दिन के प्रमुख शुभ मुहूर्त

  • इस दिन ब्रह्म मुहूर्त प्रातः 04 बजकर 03 मिनट से 04 बजकर 47 मिनट तक रहेगा।
  • इस दिन प्रातः सन्ध्या प्रातः 04 बजकर 25 मिनट से 05 बजकर 31 मिनट तक होगी।
  • इस दिन अभिजित मुहूर्त दोपहर 11 बजकर 36 मिनट से 12 बजकर 29 मिनट तक रहेगा।
  • इस दिन विजय मुहूर्त दोपहर 02 बजकर 13 मिनट से 03 बजकर 05 मिनट तक होगा।
  • इस दिन गोधूलि मुहूर्त शाम 06 बजकर 34 मिनट से 06 बजकर 56 मिनट तक रहेगा।
  • इस दिन सायाह्न सन्ध्या शाम 06 बजकर 34 मिनट से 07 बजकर 40 मिनट तक होगी।
  • इस दिन अमृत काल रात्रि 09 बजकर 33 मिनट से 11 बजकर 05 मिनट तक रहेगा।
  • इस दिन निशिता मुहूर्त रात्रि 11 बजकर 41 मिनट से 15 अगस्त को 12 बजकर 25 मिनट तक रहेगा।

अंडाल जयंती क्या है?

अंडाल जयंती देवी अंडाल के जन्म दिवस के रूप में मनाया जाने वाला पावन पर्व है। अंडाल को “गोदा देवी” के नाम से भी जाना जाता है। वे भगवान विष्णु की परम भक्त थीं और उनकी भक्ति इतनी गहरी थी कि उन्होंने स्वयं को भगवान के चरणों में समर्पित कर दिया। यह पर्व न केवल एक जन्मोत्सव है, बल्कि यह सच्ची भक्ति, प्रेम और समर्पण का प्रतीक भी है।

क्यों मनाते हैं अंडाल जयंती?

अंडाल जयंती मनाने का मुख्य उद्देश्य देवी अंडाल की भक्ति और उनके दिव्य प्रेम को स्मरण करना है। मान्यता है कि अंडाल ने अपने जीवन में केवल भगवान विष्णु को ही अपना पति माना और उनके प्रति पूर्ण समर्पण के साथ भक्ति की। अंततः भगवान ने उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर उन्हें अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार किया। इस दिन भक्त उनके जीवन से प्रेरणा लेते हैं और भगवान के प्रति अपनी श्रद्धा को और मजबूत करते हैं।

अंडाल जयंती का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व

अंडाल जयंती का धार्मिक महत्व अत्यंत गहरा है। यह पर्व विशेष रूप से वैष्णव परंपरा में महत्वपूर्ण स्थान रखता है।

  • यह दिन भक्ति की शक्ति का प्रतीक है।
  • महिलाओं के लिए यह दिन सौभाग्य और अखंड सुहाग का प्रतीक माना जाता है।
  • मंदिरों में विशेष पूजा, भजन-कीर्तन और उत्सव आयोजित किए जाते हैं।
  • सांस्कृतिक रूप से भी यह पर्व दक्षिण भारत की समृद्ध परंपराओं और धार्मिक विरासत को दर्शाता है।

अंडाल जयंती से जुड़ी परंपराएं और मान्यताएं

इस दिन कई विशेष परंपराएं निभाई जाती हैं:

  • अंडाल देवी को दुल्हन के रूप में सजाया जाता है।
  • भगवान विष्णु के साथ उनके प्रतीकात्मक विवाह का आयोजन किया जाता है।
  • "तिरुप्पावै" और "नाचियार तिरुमोझी" का पाठ किया जाता है।
  • मंदिरों में शोभायात्राएं निकाली जाती हैं।
  • मान्यता है कि इस दिन की गई पूजा से विवाह, संतान और सुख-समृद्धि की कामनाएं पूरी होती हैं।

अंडाल जयंती कैसे मनाई जाती है?

  • अंडाल जयंती बड़े ही उत्साह और भक्ति भाव से मनाई जाती है।
  • भक्त प्रातःकाल स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करते हैं और घर या मंदिर में अंडाल देवी और भगवान विष्णु की पूजा करते हैं।
  • मंदिरों में विशेष उत्सव, भजन-कीर्तन और प्रसाद वितरण का आयोजन होता है।
  • दक्षिण भारत के कई मंदिरों में इस दिन विशेष झांकी और विवाह उत्सव का आयोजन किया जाता है।

अंडाल जयंती की तैयारी कैसे की जाती है?

इस पर्व की तैयारी एक दिन पहले से शुरू हो जाती है।

  • घर की साफ-सफाई की जाती है।
  • पूजा के लिए आवश्यक सामग्री एकत्रित की जाती है।
  • भगवान के लिए विशेष भोग तैयार किया जाता है।
  • मंदिर या पूजा स्थल को सजाया जाता है।
  • सभी तैयारियों का उद्देश्य एक शुद्ध और पवित्र वातावरण बनाना होता है।

अंडाल जयंती पर किसकी पूजा करनी चाहिए?

इस दिन मुख्य रूप से देवी अंडाल और भगवान विष्णु की पूजा की जाती है। इसके साथ ही भगवान श्रीरंगनाथ की पूजा करना भी अत्यंत शुभ माना जाता है। तुलसी, पीले फूल और भक्ति भाव से की गई पूजा विशेष फलदायी मानी जाती है।

अंडाल जयंती के दिन पूजा कैसे करें? क्या है पूजा विधि

अंडाल जयंती के दिन विधिपूर्वक पूजा करने से देवी अंडाल और भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है। इस दिन की पूजा सरल होते हुए भी अत्यंत फलदायी मानी जाती है।

अंडाल जयंती की पूजा विधि इस प्रकार है:

  • सबसे पहले प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें और स्वच्छ, साफ वस्त्र धारण करें।
  • इसके बाद घर के मंदिर या पूजा स्थल को अच्छी तरह साफ कर लें और एक चौकी पर साफ वस्त्र बिछाकर देवी अंडाल तथा भगवान विष्णु की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें।
  • अब गंगाजल छिड़ककर पूजा स्थल को शुद्ध करें और घी का दीपक प्रज्वलित करें।
  • देवी अंडाल और भगवान विष्णु को चंदन, अक्षत और पुष्प अर्पित करें।
  • इस दिन विशेष रूप से तुलसी के पत्ते, कमल के फूल और पीले पुष्प चढ़ाना शुभ माना जाता है।
  • इसके पश्चात “तिरुप्पावै” के श्लोकों का पाठ करें या भगवान विष्णु के मंत्रों का जाप करें।
  • आप चाहें तो “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का 108 बार जप भी कर सकते हैं।
  • अब देवी को दूध, मक्खन, मिठाई और फल का भोग लगाएं।
  • भोग लगाने के बाद आरती करें और भगवान से सुख-समृद्धि एवं भक्ति की प्रार्थना करें।
  • यदि संभव हो तो इस दिन व्रत भी रखें और दिन भर सात्विक आहार का पालन करें।
  • अंत में प्रसाद को सभी में वितरित करें।
  • इस प्रकार श्रद्धा और विधि से की गई पूजा आपके जीवन में सकारात्मकता और सुख लेकर आती है।

अंडाल जयंती में किए जाने वाले पवित्र कार्य

इस दिन कई पुण्य कार्य करना अत्यंत शुभ माना जाता है:

  • दान-पुण्य करना
  • भजन-कीर्तन करना
  • मंदिर दर्शन करना
  • गरीबों को भोजन कराना

ये सभी कार्य जीवन में सुख और शांति लाते हैं।

अंडाल जयंती के दिन किए जाने वाले शुभ कार्य

  • व्रत रखना
  • तुलसी पूजन करना
  • विष्णु मंत्रों का जाप करना
  • कन्याओं को भोजन कराना

इन कार्यों से विशेष पुण्य फल प्राप्त होता है।

अंडाल जयंती का ज्योतिषीय महत्व

अंडाल जयंती का ज्योतिषीय दृष्टि से विशेष महत्व माना जाता है, क्योंकि यह तिथि तमिल पंचांग के अनुसार आदि मास और पूरम नक्षत्र के संयोग में आती है। यह समय ग्रहों की ऊर्जा को संतुलित करने और सकारात्मक प्रभाव बढ़ाने वाला माना जाता है।

इस दिन भगवान विष्णु और देवी अंडाल की पूजा करने से कुंडली में उपस्थित कई प्रकार के दोषों का शमन होता है। विशेष रूप से यदि किसी जातक की कुंडली में शुक्र, चंद्र या गुरु ग्रह कमजोर स्थिति में हों, तो इस दिन की गई उपासना उनके शुभ प्रभाव को बढ़ाने में सहायक मानी जाती है।

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, इस दिन व्रत, दान और मंत्र जाप करने से जीवन में प्रेम, वैवाहिक सुख और मानसिक शांति की प्राप्ति होती है। साथ ही यह दिन उन लोगों के लिए भी शुभ माना जाता है जो विवाह में आ रही बाधाओं को दूर करना चाहते हैं।

हिंदू धर्म में अंडाल जयंती का महत्व

हिंदू धर्म में अंडाल जयंती भक्ति, समर्पण और ईश्वर के प्रति अटूट विश्वास का प्रतीक है। देवी अंडाल को भगवान विष्णु की परम भक्त के रूप में पूजा जाता है, जिन्होंने अपने जीवन को पूर्णतः भगवान की भक्ति में समर्पित कर दिया। यह पर्व विशेष रूप से वैष्णव संप्रदाय में अत्यंत श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। अंडाल देवी को 12 आलवार संतों में एक विशेष स्थान प्राप्त है, और उनकी भक्ति को आदर्श माना जाता है।

इस दिन पूजा-अर्चना करने से भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है और जीवन में सुख-समृद्धि का आगमन होता है। विशेषकर महिलाएं इस दिन व्रत रखकर अपने दांपत्य जीवन की सुख-शांति और अखंड सौभाग्य की कामना करती हैं।

अंडाल जयंती का आध्यात्मिक महत्व

अंडाल जयंती का आध्यात्मिक महत्व अत्यंत गहरा और प्रेरणादायक है। यह पर्व हमें सिखाता है कि सच्ची भक्ति में कोई दिखावा नहीं होता, बल्कि वह पूर्ण समर्पण और प्रेम से जुड़ी होती है।

देवी अंडाल का जीवन इस बात का उदाहरण है कि जब मन पूरी तरह से ईश्वर में लीन हो जाता है, तब आत्मा और परमात्मा का मिलन संभव हो जाता है। उनकी भक्ति हमें यह प्रेरणा देती है कि हम भी अपने जीवन में ईश्वर के प्रति निष्कलंक प्रेम और आस्था विकसित करें।

इस दिन ध्यान, भजन और मंत्र जाप करने से मन की अशांति दूर होती है और आत्मिक शांति की अनुभूति होती है। अंडाल जयंती व्यक्ति को आत्मचिंतन, आत्मशुद्धि और आध्यात्मिक उन्नति की ओर प्रेरित करती है।

अंडाल जयंती मनाने के लाभ

  • भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है, जिससे जीवन में सुख और समृद्धि आती है।
  • विवाहित महिलाओं को अखंड सौभाग्य और सुखी दांपत्य जीवन का आशीर्वाद मिलता है।
  • अविवाहित कन्याओं को योग्य जीवनसाथी प्राप्त होने की मान्यता है।
  • मन में भक्ति, प्रेम और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
  • मानसिक तनाव बहुत कम होता है एवं मन को शांति मिलती है।
  • परिवार में प्रेम, सामंजस्य और खुशहाली बनी रहती है।
  • आध्यात्मिक उन्नति होती है और ईश्वर के प्रति आस्था बढ़ती है।

अंडाल जयंती व आदिपूरम में अंतर

  • अंडाल जयंती और आदिपूरम में कोई वास्तविक अंतर नहीं है।
  • जब इसे अंडाल देवी के जन्मदिन के रूप में मनाया जाता है, तो इसे अंडाल जयंती कहा जाता है।
  • जब इसे तमिल पंचांग के अनुसार आदि मास के पूरम नक्षत्र के रूप में देखा जाता है, तो इसे आदिपूरम कहा जाता है।
  • दोनों एक ही पर्व के अलग-अलग नाम हैं।

अंडाल जयंती केवल एक पर्व नहीं, बल्कि भक्ति, प्रेम और समर्पण का जीवंत उदाहरण है। यह हमें सिखाती है कि यदि हमारी श्रद्धा सच्ची हो, तो भगवान स्वयं हमारे जीवन में प्रकट होते हैं। देवी अंडाल की भक्ति और उनका जीवन आज भी हमें प्रेरित करता है कि हम अपने जीवन में ईश्वर के प्रति समर्पण और प्रेम को सर्वोपरि रखें। हम कामना करते हैं कि अंडाल जयंती 2026 आपके जीवन में सुख, शांति और समृद्धि लेकर आए।

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Published by Sri Mandir·June 2, 2026

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