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विश्वेश्वर व्रत

विश्वेश्वर व्रत: जानें कथा, विधि व महत्व, भगवान शिव की कृपा से पाएं सुख-शांति और समृद्धि का आशीर्वाद।

विश्वेश्वर व्रत के बारे में

भगवान शिव को विश्वनाथ या विश्वेश्वर भी कहा जाता है और हिन्दू धर्म में उनको समर्पित व्रत की बहुत मान्यता है। यही वजह है, कि इस व्रत को भी विश्वेश्वर व्रत कहा जाता है। यह व्रत प्रदोष व्रत के दिन किया जाता है, जो कार्तिक मास में शुक्ल पक्ष में अंतिम पांच दिन भीष्म पंचक में तीसरे दिन होता है।

क्या है विश्वेश्वर व्रत?

  • विश्वेश्वर व्रत भगवान शिव के विश्वेश्वर (या विश्वनाथ) स्वरूप को समर्पित एक अत्यंत पावन व्रत है। यह व्रत कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि को किया जाता है, जिसे भीष्म पंचक के तीसरे दिन के रूप में भी जाना जाता है।
  • इस दिन भक्तजन भगवान शिव की विशेष पूजा-अर्चना करते हैं, शिवलिंग का जल, दूध, और फलों से अभिषेक करते हैं तथा दिनभर उपवास रखकर प्रभु की आराधना करते हैं।
  • धार्मिक मान्यता है कि यह व्रत करने से जीवन में आने वाली सभी कठिनाइयाँ दूर होती हैं, रोग-शोक समाप्त होते हैं और व्यक्ति को सुख, शांति तथा समृद्धि की प्राप्ति होती है।

क्यों रखा जाता है विश्वेश्वर व्रत?

विश्वेश्वर व्रत भगवान भोलेनाथ को प्रसन्न करने के लिए रखा जाता है। भगवान शिव को “विश्वेश्वर” नाम इसलिए दिया गया है क्योंकि वे संपूर्ण विश्व के ईश्वर हैं — सृष्टि, पालन और संहार, तीनों में समान रूप से स्थित हैं।

यह व्रत कर्नाटक के येलुरु स्थित श्री विश्वेश्वर मंदिर से भी जुड़ा हुआ है। मान्यता के अनुसार, भगवान शिव ने स्वयं इस स्थान पर शिवलिंग के रूप में प्रकट होकर राजा कुंडा को दर्शन दिए थे। तब से इस दिन भगवान विश्वेश्वर की विशेष पूजा का विधान चला आ रहा है। भक्त इस व्रत के माध्यम से भगवान से अपने जीवन की सभी बाधाओं को दूर करने, स्वास्थ्य, शांति और समृद्धि की प्राप्ति के लिए प्रार्थना करते हैं। इस व्रत के दौरान भगवान शिव का रुद्राभिषेक करवाना और नारियल चढ़ाना विशेष रूप से शुभ माना जाता है।

विश्वेश्वर व्रत का महत्व

विश्वेश्वर व्रत का धार्मिक और आध्यात्मिक दोनों दृष्टि से अत्यंत महत्व है। इस व्रत को करने से:

  • भगवान शिव की कृपा से सभी मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं।
  • व्यक्ति को निरोगी काया तथा दीर्घायु का आशीर्वाद मिलता है।
  • जीवन में सुख, शांति और समृद्धि की प्राप्ति होती है।
  • समस्त पापों का क्षय होता है और आत्मा शुद्ध होती है।

येलुरु विश्वेश्वर मंदिर में इस दिन भगवान का फूलों से श्रृंगार किया जाता है और भक्त अपने वजन के बराबर नारियल चढ़ाते हैं। यह परंपरा राजा कुंडा की उस कथा से जुड़ी है जिसमें उन्होंने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए नारियल जल चढ़ाया था। धार्मिक ग्रंथों और मान्यताओं के अनुसार, यह व्रत करने वाला व्यक्ति भगवान शिव की कृपा से जीवन में आने वाले हर संकट को सहजता से पार कर लेता है

विश्वेश्वर व्रत पूजा की पूजन सामग्री

विश्वेश्वर व्रत की पूजा भगवान शिव के विश्वेश्वर रूप की आराधना के लिए की जाती है। पूजा में प्रयुक्त सामग्री इस प्रकार है — मुख्य पूजन सामग्री सूची:

  • शुद्ध जल – अभिषेक एवं आचमन के लिए
  • गंगाजल – शिवलिंग स्नान हेतु
  • दूध, दही, घी, शहद और शक्कर (पंचामृत) – रुद्राभिषेक के लिए
  • बिल्वपत्र (बेलपत्र) – शिव पूजा का मुख्य अंग
  • धतूरा, आक के फूल और बेल फल – भगवान शिव को अति प्रिय
  • सफेद पुष्प और माला – श्रृंगार हेतु
  • चावल (अक्षत) – पूजन में अर्पण के लिए
  • सिंदूर और हल्दी – पूजन चिह्न के रूप में
  • धूप, दीपक और कपूर – आरती के लिए
  • फल, मिठाई और नारियल – भोग लगाने के लिए
  • नारियल का जल या नारियल का तेल – येलुरु विश्वेश्वर मंदिर की परंपरा अनुसार
  • शुद्ध वस्त्र और आसन – पूजन के दौरान प्रयोग हेतु
  • रुद्राक्ष की माला – जप करने के लिए

विश्वेश्वर व्रत की पूजा कैसे करें?

यह व्रत पूर्ण श्रद्धा और विधि-विधान से किया जाता है। नीचे क्रमवार पूजा विधि दी गई है —

प्रातःकालीन तैयारी

  • व्रती (व्रत करने वाला) प्रातः काल ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करे और शुद्ध वस्त्र धारण करे।
  • घर या मंदिर में भगवान शिव का चित्र या शिवलिंग स्थापित करें।
  • मन में निश्चय करें कि आप पूरे दिन भगवान शिव के विश्वेश्वर रूप की आराधना और उपवास करेंगे।

संकल्प एवं अभिषेक

  • पूजा आरंभ करने से पहले भगवान शिव का ध्यान करें और संकल्प लें –
  • मैं आज कार्तिक शुक्ल चतुर्दशी के दिन विश्वेश्वर व्रत का पालन कर रहा/रही हूँ, भगवान शिव की कृपा प्राप्ति के लिए।
  • इसके बाद गंगाजल, दूध, दही, घी, शहद और शक्कर से शिवलिंग का पंचामृत अभिषेक करें।
  • अभिषेक के बाद शुद्ध जल से स्नान कराकर बिल्वपत्र, पुष्प और फल अर्पित करें।

पूजा एवं आराधना

  • भगवान शिव को धूप, दीप, फल, नारियल और मिठाई अर्पित करें।
  • “ॐ नमः शिवाय” मंत्र का 108 बार जप करें या रुद्राष्टक, शिव चालीसा, अथवा महामृत्युंजय मंत्र का पाठ करें।
  • येलुरु परंपरा के अनुसार, नारियल जल या तेल से अभिषेक करना शुभ माना जाता है।
  • यदि संभव हो तो रुद्राभिषेक करवाएं। यह इस व्रत का प्रमुख अंग है।

आरती और व्रत का समापन

  • संध्या समय भगवान शिव की आरती करें -
  • “जय शिव ओंकारा” या “हर हर महादेव” का कीर्तन करें।
  • दिनभर उपवास रखें और रात्रि में भगवान शिव के नाम का स्मरण करते हुए विश्राम करें।
  • अगले दिन प्रातः स्नान के बाद किसी ब्राह्मण या जरूरतमंद को दान दें और फिर सात्विक भोजन ग्रहण कर व्रत का पारण करें।

विश्वेश्वर व्रत पूजा का फल

  • इस व्रत को पूर्ण श्रद्धा और विधि से करने पर —
  • भगवान शिव सभी कष्टों और बाधाओं को दूर करते हैं।
  • आरोग्य, धन, सुख, शांति और दीर्घायु की प्राप्ति होती है।
  • परिवार में समृद्धि और सद्भाव बना रहता है।
  • मनुष्य के सभी पापों का क्षय होता है और आत्मा शुद्ध होती है।

विश्वेश्वर व्रत के नियम

विश्वेश्वर व्रत भगवान शिव के विश्वनाथ स्वरूप को समर्पित एक पवित्र व्रत है। इस व्रत में शुद्धता, संयम और भक्ति का पालन अत्यंत आवश्यक होता है। नीचे व्रत के मुख्य नियम दिए गए हैं –

शुद्धता और संयम का पालन

  • व्रत वाले दिन प्रातःकाल स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
  • शरीर, मन और वाणी की पवित्रता बनाए रखें।
  • असत्य बोलने, क्रोध करने, या विवाद करने से बचें।

उपवास का नियम

  • इस दिन पूर्ण उपवास रखा जाता है। केवल जल या फलाहार ग्रहण किया जा सकता है।
  • अन्न, नमक और तामसिक भोजन वर्जित है।
  • अगले दिन प्रातः सात्विक भोजन करके व्रत का पारण करें।

शिव मंत्र का जप

  • पूरे दिन “ॐ नमः शिवाय” या “महामृत्युंजय मंत्र” का जप करें।
  • कम से कम 108 बार मंत्र जप करने का नियम है।
  • संध्या समय शिव आरती और शिव चालीसा का पाठ करना शुभ होता है।

शिवलिंग का अभिषेक

  • भगवान शिव का जल, दूध, दही, घी, शहद और शक्कर से पंचामृत अभिषेक करें।
  • येलुरु विश्वेश्वर मंदिर की परंपरा के अनुसार नारियल जल या नारियल के तेल से अभिषेक करना अत्यंत शुभ माना गया है।

दान और सेवा

  • व्रत के दिन किसी ब्राह्मण, गौशाला या जरूरतमंद को अन्न, वस्त्र या धन का दान करें।
  • दान को भगवान शिव को प्रसन्न करने का श्रेष्ठ माध्यम माना गया है।

विश्वेश्वर व्रत पर भगवान शिव को कैसे करें प्रसन्न

भगवान शिव “आशुतोष” कहलाते हैं, अर्थात जो शीघ्र प्रसन्न हो जाते हैं। विश्वेश्वर व्रत के दिन इन उपायों से भगवान शिव की विशेष कृपा प्राप्त की जा सकती है:

शिव पंचाक्षर मंत्र का जाप

  • “ॐ नमः शिवाय” महामंत्र का श्रद्धापूर्वक जाप करें।
  • यह मंत्र भगवान शिव की कृपा प्राप्त करने का सबसे सरल और प्रभावी साधन है।

रुद्राभिषेक करवाना

  • यदि संभव हो, तो इस दिन शिव मंदिर में रुद्राभिषेक करवाएं।
  • यह भगवान विश्वेश्वर को प्रसन्न करने का श्रेष्ठ विधान है।

बिल्वपत्र और धतूरा अर्पण

  • भगवान शिव को बिल्वपत्र, धतूरा और सफेद पुष्प अति प्रिय हैं।
  • तीन पत्तियों वाले बिल्वपत्र पर “ॐ नमः शिवाय” लिखकर अर्पण करना शुभ माना जाता है।

शिव कथा, शिव चालीसा या रुद्राष्टक का पाठ

  • दिनभर में भगवान शिव की कथा, शिव चालीसा या महामृत्युंजय मंत्र का पाठ करें।
  • यह साधना मानसिक शांति और आत्मिक बल दोनों प्रदान करती है।

सात्विकता और ब्रह्मचर्य का पालन

  • इस दिन नकारात्मक विचारों, मांसाहार, मद्यपान और किसी भी प्रकार की हिंसा से दूर रहें।
  • मन, वचन और कर्म की पवित्रता ही भगवान शिव को प्रसन्न करती है।

विश्वेश्वर व्रत पर किए जाने वाले उपाय

विश्वेश्वर व्रत के दिन कुछ विशेष धार्मिक उपाय करने से जीवन की बाधाएँ दूर होती हैं और भगवान शिव की कृपा शीघ्र प्राप्त होती है।

नारियल जल से अभिषेक

  • येलुरु विश्वेश्वर मंदिर की कथा के अनुसार, राजा कुंडा ने नारियल जल से भगवान शिव का अभिषेक कर उन्हें प्रसन्न किया था।
  • इसलिए इस दिन नारियल जल या तेल से अभिषेक करने पर जीवन में समृद्धि और शांति आती है।

सोमवार को व्रत रखना

  • यदि यह व्रत सोमवार को पड़ता है (जैसे वर्ष 2025 में), तो इसका फल अनेक गुना बढ़ जाता है।
  • इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती की संयुक्त पूजा करनी चाहिए।

सफेद वस्त्र या चांदी का दान

  • भगवान शिव को सफेद रंग प्रिय है। इस दिन सफेद वस्त्र, चावल या चांदी का दान करने से दरिद्रता और आर्थिक बाधाएँ दूर होती हैं।

दीपदान

  • संध्या के समय शिव मंदिर में तिल के तेल का दीपक जलाना शुभ माना गया है।
  • यह पितृ दोष और ग्रहबाधा निवारण का प्रभावी उपाय है।

जल में दूध मिलाकर शिवलिंग पर चढ़ाना

  • शिवलिंग पर दूध मिले जल से अभिषेक करने से रोग, दुख और मानसिक तनाव दूर होता है।
  • यह उपाय विशेष रूप से निरोगी काया और मानसिक शांति के लिए किया जाता है।

विश्वेश्वर व्रत केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि भक्ति, आत्मसंयम और शिव कृपा प्राप्त करने का माध्यम है। जो भक्त इस दिन नियमपूर्वक उपवास, जप, दान और पूजा करता है, उसे भगवान शिव की असीम कृपा प्राप्त होती है। इस व्रत से जीवन के सभी संकट दूर होते हैं और सुख, शांति तथा समृद्धि की प्राप्ति होती है।

व्रत कथा

बहुत समय पहले कुथार राजवंश में एक शूद्र राजा हुआ करते थे, जिन्हें कुंडा राजा के नाम से जाना जाता था। एक समय की बात है, राजा ने भार्गव मुनि को अपने राज्य में आने का निमंत्रण भेजा था। लेकिन उन्होंने उस निमंत्रण को अस्वीकार कर दिया। आपको बता दें, कि मुनि ने राजा से कहा कि आपके राज्य में मंदिरों और पवित्र पावन नदियों का अभाव है। मुनि को कार्तिक पूर्णिमा से पहले भीष्म पंचक के पांच दिन के त्यौहार में तीसरे दिन पूजा करने के लिए उचित स्थान की आवश्यकता होती है, जिसका उन्हें राजा कुंडा के राज्य में अभाव लग रहा है।

राजा कुंडा को जब इस बात का पता लगा, तो वह इस बात से बहुत परेशान हुए। तब भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए उन्होंने अपना राज्य अपने सहायक के हवाले कर दिया और खुद राज्य छोड़ गंगा नदी के किनारे तपस्या करने के लिए चले गए। उन्होंने नदी किनारे एक महान यज्ञ का अनुष्ठान किया था और इस प्रकार भगवान शिव की आराधना की। तब भगवान शिव उनकी तपस्या से प्रसन्न हुए और राजा से वरदान मांगने को कहा। तब राजा ने भगवान शंकर से उनके राज्य में रहने की इच्छा जताई, जिसे भगवान भोलेनाथ ने स्वीकार कर लिया।

उस समय भगवान शंकर राजा कुंडा के राज्य में एक कंद के पेड़ में रहने लगे थे। एक दिन एक आदिवासी स्त्री वहां जंगल में अपने खोए हुए बेटे को ढूंढ रही थी, जो वहीं जंगल में खो गया था। उस स्त्री ने वहां कंद के वृक्ष के पास जाकर उस पर अपनी तलवार से प्रहार किया। तलवार लगते ही उस वृक्ष से खून बहने लगा था। बहते हुए खून को देखकर उस स्त्री ने समझा, कि वह कंद नहीं बल्कि उसका पुत्र है और उसका नाम ‘येलु’,‘येलु’ पुकारने लगी तथा जोर-जोर से रोने लगी। तभी उस स्थान पर भगवान शिव लिंग के रूप में प्रकट हुए थे और तभी से यहां पर बने मंदिर को येलुरु विश्वेश्वर मंदिर कहा जाने लगा था।

उस स्त्री द्वारा तलवार से किए गए प्रहार से शिवलिंग पर एक निशान पड़ गया था। ऐसा कहते हैं, कि वह निशान आज भी येलुरु श्री विश्वेश्वर मंदिर में स्थापित शिवलिंग में देखा जा सकता है। यह भी माना गया है, कि कुंडा राजा ने प्रहार के स्थान पर नारियल पानी डाला था तभी कंद का खून बहना बंद हुआ था। इसलिए आज भी यहां भगवान शिव को नारियल पानी या नारियल का तेल चढ़ाने का विधान है। इसके अलावा, भगवान को चढ़ाया गया तेल मंदिर में दीपक जलाने के काम में लिया जाता है।

यह थी भगवान भोलेनाथ को समर्पित विश्वेश्वर व्रत की संपूर्ण जानकारी। उम्मीद है यह लेख भगवान शिव की आराधना के साथ-साथ व्रत का अनुष्ठान करने में आपके लिए उपयोगी होगा। ऐसे ही अन्य पर्व, उत्सव, त्योहारों के विषय में अवगत होने के लिए जुड़े रहिए श्री मंदिर के साथ।

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Published by Sri Mandir·November 5, 2025

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