
स्वामी रामकृष्ण जयंती 2025: स्वामी रामकृष्ण के अद्भुत विचारों से जीवन में बदलाव लाएं! जानें कब है यह दिन।
स्वामी रामकृष्ण जयंती महान संत रामकृष्ण परमहंस की जयंती के रूप में मनाई जाती है। वे अद्वितीय आध्यात्मिक गुरु थे, जिन्होंने भक्ति, ध्यान और साधना के माध्यम से ईश्वर प्राप्ति का मार्ग दिखाया। उनका जीवन सरलता, भक्ति और करुणा का प्रतीक था।
आध्यात्मिक जीवन ही श्रेष्ठ और वास्तविक जीवन है। इस कथन को सिद्ध कर देने वाले कई महापुरुषों को भारत भूमि पर जन्म मिला है, जिन्होंने समूचे संसार को शान्ति व सद्भावना का पाठ पढ़ाया है। ऐसे ही महापुरुषों में एक श्रेष्ठ नाम आता है भारत के महान संत, आध्यात्मिक गुरु एवं विचारक श्री रामकृष्ण परमहंस जी का। स्वामी रामकृष्ण परमहंस के बारे में पढ़ना कोई शास्त्र पढ़ने से कम नहीं है। उनके जीवन से जुड़ी हर घटना हमारे अंतर्मन पर एक छाप छोड़ती है, और गहरा चिंतन करने पर विवश कर देती है।
दिनांक के अनुसार स्वामी रामकृष्ण की जयंती 18 फरवरी को होती है। वहीं, हिन्दू पंचांग के अनुसार फाल्गुन मास में शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को स्वामी रामकृष्ण की जयंती मनाई जाती है। इस साल ये तिथि 1 मार्च 2025, शनिवार को पड़ रही है।
अधिकांशतः ऐसा माना जाता है कि रामकृष्ण जी का जन्म सन् 1836 ई० में हुगली के पास स्थित कामारपूकर नाम के गाँव में एक ब्राह्मण कुल में हुआ था। हालांकि उनके जन्म के सन् व दिनांक को लेकर काफ़ी मदभेद देखने को मिलते हैं। उनके पिता का नाम श्री खुदीराम चट्टोपाध्याय था। कहते हैं कि रामकृष्ण के जन्म से पहले ही उनके माता-पिता को कई अलौकिक और दिव्य घटनाएं देखने को मिली थीं।
स्वामी रामकृष्ण जी का स्वभाव बचपन से ही बहुत विनम्र था। इस कारण आस-पास के सभी लोग उनसे बहुत प्रसन्न रहते थे। स्वामी जी का मन बचपन से ही कृष्ण चरित्र सुनने और उनकी लीलाएं करने में बहुत लगता था। उन्हें बचपन से ही विश्वास था कि ईश्वर के दर्शन हो सकते हैं। वो कभी-कभी इतनी तन्मयता के साथ भगवान की आराधना करते थे की स्वयं अचेत हो जाया करते थे। उनके अंदर सेवा भावना भी कूट-कूट कर भरी थी, इसी कारण वो अतिथिशाला में जाकर वहां आगंतुकों की खूब सेवा किया करते थे।
रामकृष्ण जी ने पढ़ने के लिए पाठशाला जाना आरंभ किया, परंतु उनका मन पढ़ने में बिल्कुल नहीं लगता था। दुःखी होकर एक दिन वो अपने बड़े भाई से बोले– “भाई, पढ़ने-लिखने से आख़िर क्या होगा? क्या इस पढ़ाई-लिखाई का उद्देश्य केवल पैसा कमाना है? मैं तो वो विद्या ग्रहण करना चाहता हूँ, जो मुझे परमात्मा की शरण तक पहुंचाने का कार्य करे!” स्वामी जी ने ऐसा कहकर उस दिन से पाठशाला जाना छोड़ दिया।
स्वामी जी का मन पूजा में खूब रमता था, इसलिए वो काली देवी के मंदिर के पुजारी बन गए। वे काली माता के भक्त थे। उनके लिए काली सिर्फ़ एक देवी नहीं, बल्कि जीवित वास्तविकता थीं। दिन-रात उन्हें काली दर्शन के अलावा कुछ भी नहीं सूझता था। उन्होंने कई वर्षों तक कठोर तपस्या की, और खाना-पीना, सोना सब छोड़कर ध्यानमग्न रहे। इस बीच स्वामी जी का भतीजा कभी-कभी जबरन उन्हें थोड़ा भोजन करा दिया करता था। सन्यास लेने के पश्चात् ही स्वामी जी का नाम रामकृष्ण परमहंस पड़ा।
एक दिन कुछ यूं हुआ कि रामकृष्ण जी हुगली नदी के किनारे बैठे थे, तभी महान योगी तोता पुरी उसी रास्ते से गुज़रे।
तोता पुरी ने देखा और भांप लिया कि रामकृष्ण में इतनी क्षमता है कि वो कठिन से कठिन ज्ञान भी प्राप्त कर सकते हैं, लेकिन वो सब कुछ छोड़कर केवल काली माता की भक्ति में ही डूबे हुए हैं। तोता पुरी रामकृष्ण के पास आए और बोले- रामकृष्ण! तुम अपनी भक्ति में इतने तल्लीन क्यों हो? तुम्हारे पास तो इतनी क्षमता है कि अथाह ज्ञान की प्राप्ति कर सकते हो? ये सुनकर स्वामी जी किसी बच्चे की तरह हठ करते हुए बोले- मुझे तो सिर्फ़ काली ही चाहिए बस! तोता पुरी ने उन्हें बहुत समझाने की कोशिश की लेकिन रामकृष्ण समझने को तैयार न थे।
तोता पुरी ने देखा कि रामकृष्ण उसी तरह काली माता की भक्ति में लगे हुए हैं, तब उन्होंने कहा, काली को पाना तो बहुत आसान है। बस अभी भावनाएं और शरीर अधिक शक्तिशाली हैं, लेकिन तुम्हारी जागरूकता कमज़ोर पड़ रही है। इसलिए काली जी की भक्ति करते समय तुम्हें और अधिक जागरूक रहने की आवश्यकता है। रामकृष्ण इस बात से सहमत हो गए और कहा, 'ठीक है! मैं अपनी जागरूकता को और शक्तिशाली बनाऊंगा और अब मैं अपनी पूरी चेतना में बैठकर काली का आह्वान करूंगा। आह्वान करने के बाद जैसे ही उन्हें काली माता के दर्शन हुए, उनका शरीर परमानंद में लीन होकर फिर से बेकाबू हो उठा।
इसके पश्चात् तोता पुरी ने कहा- अगली बार जब तुम्हें काली दिखें तो एक तलवार लेकर उनके टुकड़े कर देना! रामकृष्ण ने आश्चर्यचकित होकर पूछा- मैं आख़िर तलवार कहां से लाऊंगा। योगी तोता पुरी ने कहा- तलवार भी वहीं से लाओ, जहां से तुम काली लाते हो।
तोतापुरी ने आगे कहा- इस बार जैसे ही काली तुम्हारे सामने आयेंगी और तुम अपनी चेतना भूल जाओगे, तभी मैं तुम्हें एक कांच के टुकड़े से काट दूंगा! जैसे ही मैं ऐसा करूंगा, तुम्हें तुरंत तलवार बनाकर काली को काटना है। योगी की इस बात से रामकृष्ण सहमत हो गए।
स्वामी रामकृष्ण जैसे ही काली भक्ति में खोए, योगी तोता पूरी ने उनके माथे पर कांच के टुकड़े से एक गहरा चीरा लगा दिया। तभी स्वामी रामकृष्ण ने एक काल्पनिक तलवार बनाई, और काली के टुकड़े कर दिए। इस प्रकार वो परमानंद से मुक्त हो गए, उनकी चेतना वापस आ गई, और उन्होंने अपनी समस्त इंद्रियों को वश में कर लिया। अब वो वास्तव में 'परमहंस' और 'पूर्ण ज्ञाता' बन गए। इससे पहले वो काली मां के एक प्रेमी, एक भक्त, और एक ऐसी संतान थे, जो हमेशा माता को अपने वश में रखना चाहता था।
स्वामी रामानंद जी के वैवाहिक जीवन से जुड़ी एक रोचक घटना सुनने को मिलती है। कहते हैं कि जब उनका विवाह हुआ तो स्वामी जी की पत्नी शारदा देवी की आयु क़रीब 5-6 साल थी। वर्षों बाद एक दिन स्वामी जी की ससुराल जाने की इच्छा हुई, बस वो चल पड़े। वहां पहुंचकर उन्होंने बिना किसी से कोई बात किए घर में प्रवेश किया।
विवाह के समय स्वामी जी की पत्नी की आयु कम थी, इसलिए वो इतने वर्षों बाद पति को सामने देख पहचान न सकीं। वो उन्हें कोई पागल समझ चिल्लाकर बोली- मां ओ मां! जल्दी आकर देख न! घर में कोई पागल प्रवेश कर रहा है! मां घबराकर बाहर आईं और स्वामी जी को इस तरह देखकर हैरान रह गईं। बोलीं- बेटी, ये तो मेरा दामाद यानि तेरा पति है! हाय! तेरी तो किस्मत फूट गई, जो तुझे ऐसा पति मिला। ये बोलते हुए वो अचेत होकर भूमि पर गिर पड़ीं।
जब कन्या की मां को होश आया तो देखा कि स्वामी जी पूजा की सब सामग्री जुटाकर पत्नी से कह रहे हैं- तू देख क्या रही है? आ, आकर इस चौकी पर बैठ जा! शारदा देवी चुपचाप आकर बैठ गईं। स्वामी जी मां-मां का संबोधन कर उसके चरणों में पुष्प अर्पित करने लगे और आरती करने लगे। उनकी सास ने सब ये सब देखा तो वो उनपर क्रोधित हुईं, और बुरा-भला कहने लगीं। लेकिन वो पूजा करते रहे, और उसके बाद बिना किसी से कुछ कहे वहां से चले गए। रामकृष्ण के चले जाने के कुछ ही दिन पश्चात् उनकी पत्नी को ज्ञात हुआ कि उनका पति पागल नहीं, बल्कि एक असाधारण ज्ञानी पुरुष है। एक दिन उन्होंने स्वामी जी का दर्शन करने का निर्णय लिया, और मां के साथ 30-40 मील पैदल चलकर दक्षिणेश्वर पहुंचीं।
स्वामी जी ने उनका बहुत सत्कार किया और कहा- रामकृष्ण, जो तुम्हारा पति था, वो अब मर चुका है! ये तो वो रामकृष्ण है जो संसार की सभी स्त्रियों को मां मानता है! इतना कहकर वो शारदा देवी के चरणों में गिर पड़े। शारदा देवी पति के मन की भावना समझ गईं, और उन्हीं के साथ मंदिर में रहकर काली माता की सेवा करने का निश्चय किया।
स्वामी विवेकानंद रामकृष्ण परमहंस के शिष्यों में सबसे प्रमुख थे। पहले तो कई बार ऐसा होता था जब विवेकानंद रामकृष्ण जी की बातों से सहमत नहीं होते थे, लेकिन धीरे-धीरे उनकी संगति में रहकर उन्हें स्वामी जी के वचनों में आध्यात्मिक सत्य की अनुभूति होने लगी। इसके बाद तो विवेकानंद जी की स्वामी रामकृष्ण के प्रति श्रद्धा और गुरुभक्ति दोनों बढ़ती गई। स्वामी विवेकानंद हमेशा इस बात का ज़िक्र किया करते थे कि आज उनके पास जो भी गुण या ज्ञान है, वो सब उनके गुरु स्वामी रामकृष्ण परमहंस जी की ही देन है। साल 1897 में विवेकानंद ने अपने गुरु की याद में भारतीय समाजसेवा संगठन रामकृष्ण मिशन की स्थापना की।
बताया जाता है कि आख़िरी दिनों में स्वामी जी को गले का कैंसर हो गया था। वैद्य तरह-तरह जड़ी बूटी देकर उन्हें बचाने का भरसक प्रयत्न कर रहे थे, लेकिन रामकृष्ण जी को ज्ञात हो चुका था कि अब इस दुनिया में रहने के लिए उनके पास ज़्यादा समय नहीं है। वो लगभग 3 माह तक रोगग्रस्त रहे, लेकिन धर्मोपदेश देना नहीं छोड़ा। अंततः सन् 1886 में श्रावणी पूर्णिमा के दिन वो समाधि में लीन हो गए और प्रतिपदा के दिन प्रातःकाल उनकी जीवनलीला समाप्त हो गई।
स्वामी रामकृष्ण परमहंस जी के जीवन की ऐसी बहुत सी घटनाएँ हैं, जिनसे हम ये समझ सकते हैं कि वे माता काली के अनन्य भक्त और एक सिद्ध पुरुष थे। हमें आशा है कि इस लेख के माध्यम से स्वामी रामकृष्ण परमहंस जी के बारे में रोचक जानकारी मिली होगी। अगर आप आगे भी ऐसी ही महान व्यक्तित्व, धर्म से जुड़ी जानकारियों और विशेष त्योहारों से अवगत होना चाहते हैं तो बने रहिए श्री मंदिर के साथ।
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