
ललिता जयंती 2025: देवी ललिता की पूजा और उपासना का दिन। जानें शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और इस दिन के धार्मिक महत्व के बारे में।
ललिता जयंती, देवी ललिता की पूजा और सम्मान का पर्व है। देवी ललिता, हिन्दू धर्म में शक्तिपीठों की प्रमुख देवी मानी जाती हैं और वे विशेष रूप से तंत्र विद्या, शक्ति और सौंदर्य की देवी के रूप में पूजी जाती हैं। यह पर्व हर साल माघ मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाया जाता है।
ललिता जयंती हर साल माघ महीने के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा के दिन मनाई जाती है। ये दिन माता ललिता को समर्पित है। शास्त्रों के अनुसार मां ललिता को दस महाविद्याओं में से तीसरी महाविद्या माना जाता है। इस दिन जातक पूरे विधि विधान से माता ललिता की आरा धना और उपासना करते हैं।
ललिता जयंती इस साल 12 फरवरी 2025, बुधवार को मनाई जाएगी। मान्यता है कि यदि इस दिन पूरी आस्था के साथ माता ललिता की पूजा की जाए तो सुख, शांति और सौभाग्य की प्राप्ति होती है।
मान्यता है कि जब माता सती ने दक्ष द्वारा शिव जी को यज्ञ में आमंत्रण न मिलने पर आत्मदाह कर लिया, तो भगवान शिव उनका मृत शरीर लेकर दुखी होकर विचरण कर रहे थे, तभी भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती जी शव के टुकड़े-टुकड़े कर दिए। माता सती के अंग जहां-जहां गिरे, वहां अलग-अलग शक्तियों का प्रादुर्भाव हुआ। उन्ही में से एक शक्ति माता ललिता भी हैं। इसलिए भक्त माता ललिता की आस्था में लीन होकर उनकी जयंती पर विधि विधान से पूजा करते हैं।
माना जाता है कि अगर कोई जातक श्रद्धा के साथ ललिता जयंती के दिन माता ललिता की उपासना करता है, या पूजा करता है तो उसे जन्म व मृत्यु के चक्र से मुक्ति मिल जाती है। अर्थात् उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है।
ललिता जयंती के दिन देश के अलग अलग हिस्सों में कई बड़े आयोजन होते हैं। इस दिन माता के मंदिर में भक्त भारी संख्या में पूजा अर्चना के लिए उपस्थित होते हैं। माता ललिता के आशीर्वाद से भक्तों को सुख समृद्धि के साथ साथ समस्त प्रकार की सिद्धियां प्राप्त होती हैं
माता ललिता मां पार्वती का ही स्वरूप हैं, इसलिए इनका एक नाम तांत्रिक पार्वती भी है। इसके अलावा इन्हें राजेश्वरी, षोडशी, त्रिपुरा सुंदरी आदि नामों से भी जाना जाता है।
माता ललिता से जुड़ी एक पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार की बात है, जब नैमिषारण्य में एक यज्ञ हो रहा था। इस यज्ञ अनुष्ठान में शामिल होने के लिए दक्ष प्रजापति भी उपस्थित हुए। उनके आने पर सभी देवता स्वागत के लिए खड़े हुए, लेकिन भगवान शिव अपनी जगह से नहीं उठे। राजा दक्ष को ये देखकर बहुत गुस्सा आया और जब उन्होंने अपने यहां यज्ञ करने की ठानी तो शंकर भगवान को निमंत्रण नहीं दिया। माता सती को जब पता चला कि उनके पिता एक यज्ञ कर रहे हैं, लेकिन इस आयोजन में उन्होंने भगवान शंकर को आमंत्रण नही दिया है तो अपने पति के इस अपमान से दुखी होकर माता सती ने यज्ञ कुंड में कूद कर अपने प्राणों की आहुति दे दी।
भगवान शिव को जब सती के आत्मदाह का पता चला तो वो व्याकुल हो उठे और सती के शव को अपनी पीठ पर लेकर पूरे ब्रह्मांड में घूमने लगे। शंकर जी की इस स्थिति से तीनों लोकों की व्यवस्था डगमगा गई। इसके बाद विष्णु जी अपने सुदर्शन चक्र से सती के शव के कई टुकड़े कर दिए। सती के अंग जहां जहां गिरे, वहां अलग अलग शक्तियां स्थापित हो गईं और शक्ति पीठ बन गए। नैमिषारण्य में माता का हृदय गिरा था, इसलिए ये जगह एक लिंग धारिणी शक्ति पीठ स्थल माना जाता है। यहां लिंग स्वरूप में भगवान शंकर की भी पूजा होती है, साथ ही यहां माता ललिता का एक मंदिर भी है।
देवी ललिता के प्रकट होने से जुड़ी एक और कथा है, जिसके अनुसार, माता का प्रादुर्भाव उस समय होता है, जब भगवान विष्णु द्वारा छोड़े गए सुदर्शन चक्र से पाताललोक का अस्तित्व खतरे में आ जाता है, और पूरी पृथ्वी जल में समाने लगती है। इस बात से चिंतित होकर सभी ऋषि-मुनि ललिता देवी की उपासना करते हैं। ऋषियों की प्रार्थना से प्रसन्न होकर देवी प्रकट होती हैं और इस विनाशकारी चक्र को रोक लेती हैं। जिसके बाद सृष्टि को एक बार फिर नया जीवन मिलता है।
तो यह थी ललिता जयंती से जुड़ी सम्पूर्ण जानकारी। हमें आशा है, कि इस व्रत को विधि-विधान से संपन्न करने में इस लेख से आपको सहायता मिलेगी। अगर आप आगे भी ऐसी ही धर्म से जुड़ी जानकारियों और विशेष त्योहारों से अवगत होना चाहते हैं तो बने रहिए श्री मंदिर के साथ।
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