सूर्य अष्टकम स्तोत्र

सूर्य अष्टकम स्तोत्र

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सूर्य अष्टकम स्तोत्र (Surya Ashtakam Stotra)

सूर्य देव की पूजा के लिए रविवार का दिन रहता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार सूर्य देव का स्थान सबसे ऊपर है। उनको उगते और डूबते दोनों तरह से अर्घ्य देने का विधान है। सूर्य देव की पूजा अर्चना करने से सभी कष्ट दूर होते हैं। जो व्यक्ति सूर्य देव की उपासना करता है उसकी कुंडली में यदि ग्रह दोष है तो वह भी दूर हो जाता है। सूर्य देव सम्पूर्ण जगत में शक्ति और ऊर्जा के भंडार हैं। उनकी ऊर्जा द्वारा ही सारे संसार के कार्य पूरे होते हैं।

सूर्य अष्टकम स्तोत्र का महत्व (Importance of Surya Ashtakam Stotra)

सूर्य देव की आराधना को बहुत ही महत्वपूर्ण माना गया है। प्रतिदिन सूर्योदय के समय जल अर्पित करने से सूर्य देव की कृपा प्राप्ति होती है। व्यक्ति का भाग्योदय होता है। ऐसा माना जाता है कि उनकी पूजा करने से व्यक्ति के जीवन में किसी भी प्रकार की बाधा नहीं आती है। सुख समृद्धि प्राप्त होती है। व्यक्ति सदा ही सकारात्मक ऊर्जा से परिपूर्ण रहता है। रविवार के दिन जो भी व्यक्ति सूर्योदय के समय तांबे के लोटे में रोली मिला हुआ जल सूर्य देव को चढ़ाता है और सूर्याष्टकम का पाठ करता है उसके सभी ग्रह दोष ख़त्म हो जाते हैं।

सूर्य अष्टकम स्तोत्र पढ़ने के फायदे (Benefits of reading Surya Ashtakam Stotra)

  • श्री सूर्य अष्टकम का पाठ करने वाले व्यक्ति को इच्छित सफलता प्राप्त होती है। उसके द्वारा की गई मेहनत व्यर्थ नहीं जाती है।
  • नवग्रह मंडल में सूर्य देव का स्थान सबसे ऊपर है। इस कारण जो भी भक्त श्री सूर्य अष्टकम का नित्य पाठ करता है उसे ग्रह बाधा से मुक्ति मिल जाती है। बुरे ग्रह का कुप्रभाव भी उस व्यक्ति पर नहीं पड़ता है। ऐसे भक्त को राहु केतु और शनि किसी भी ग्रह का कष्ट नहीं झेलना पड़ता है।
  • इस स्त्रोत का नित्य पाठ करने से रोगों से मुक्ति मिलती है। कठिन से कठिन असाध्य रोगों में भी जल्दी लाभ होने लगता है।
  • जो व्यक्ति नौकरी की तलाश में परेशान हो चुका है। उसे श्री सूर्य अष्टकम का पाठ जरूर करना चाहिए। इस स्त्रोत के नियमित पाठ से योग्यतानुसार मनचाहे नौकरी का योग बनने लगता है। इतना ही नहीं व्यापार में भी सफलता प्राप्त होती है।
  • सूर्याष्टक का पाठ करने से मानसिक विकास होता है। सोचने की क्षमता में वृद्धि होती है। व्यक्ति में अच्छे बुरे की पहचान करने की क्षमता विकसित हो जाती है। सकारात्मक सोच उत्पन्न होती है। और नकारात्मकता का नाश हो जाता है। व्यक्ति हर समय ऊर्जावान बना रहता है।
  • जो व्यक्ति सूर्याष्टक का पाठ करता है। वह कुसंगति से बचा रहता है। उसकी तामसिक भावना नष्ट हो जाती है।

सूर्य अष्टकम स्तोत्र का हिंदी अर्थ (Hindi meaning of Surya Ashtakam Stotra)

श्री सूर्य अष्टकम ॥

आदिदेव नमस्तुभ्यं प्रसीद मम भास्कर । दिवाकर नमस्तुभ्यं प्रभाकर नमोSस्तु ते ॥1॥

अर्थात - हे आदिदेव भास्कर! आपको प्रणाम है, आप मुझ पर प्रसन्न हों, हे दिवाकर! आपको नमस्कार है, हे प्रभाकर! आपको प्रणाम है।

सप्ताश्वरथमारूढं प्रचण्डं कश्यपात्मजम् । श्वेतपद्मधरं देवं तं सूर्यं प्रणमाम्यहम् ॥2॥

अर्थात - सात घोड़ों वाले रथ पर आरूढ़, हाथ में श्वेत कमल धारण किये हुए, प्रचण्ड तेजस्वी कश्यप कुमार सूर्य को मैं प्रणाम करता हूँ।

लोहितं रथमारूढं सर्वलोकपितामहम् । महापापहरं देवं तं सूर्यं प्रणमाम्यहम् ॥3॥

अर्थात - लोहित वर्ण रथारूढ़ सर्वलोक पितामह महापाप हारी सूर्य देव को मैं प्रणाम करता हूँ।

त्रैगुण्यं च महाशूरं ब्रह्मविष्णुमहेश्वरम् । महापापहरं देवं तं सूर्यं प्रणमाम्यहम् ॥4॥

अर्थात - जो त्रिगुणमयी ब्रह्मा, विष्णु और शिव रूप हैं, उन महापाप हारी महान वीर सूर्यदेव को मैं नमस्कार करता हूँ।

बृंहितं तेज:पु़ञ्जं च वायुमाकाशमेव च । प्रभुं च सर्वलोकानां तं सूर्यं प्रणमाम्यहम् ॥5॥

अर्थात - जो बढ़े हुए तेज के पुंज हैं और वायु तथा आकाश स्वरूप हैं, उन समस्त लोकों के अधिपति सूर्य को मैं प्रणाम करता हूँ।

बन्धूकपुष्पसंकाशं हारकुण्डलभूषितम् । एकचक्रधरं देवं तं सूर्यं प्रणमाम्यहम् ॥6॥

अर्थात - जो बन्धूक के पुष्प समान रक्तवर्ण और हार तथा कुण्डलों से विभूषित हैं, उन एक चक्रधारी सूर्यदेव को मैं प्रणाम करता हूँ।

तं सूर्यं जगत्कर्तारं महातेज:प्रदीपनम् । महापापहरं देवं तं सूर्यं प्रणमाम्यहम् ॥7॥

अर्थात - महान तेज के प्रकाशक, जगत के कर्ता, महापाप हारी उन सूर्य भगवान को मैं नमस्कार करता हूँ।

तं सूर्यं जगतां नाथं ज्ञानविज्ञानमोक्षदम् । महापापहरं देवं तं सूर्यं प्रणमाम्यहम् ॥8॥

अर्थात - उन सूर्यदेव को जो जगत के नायक हैं, ज्ञान, विज्ञान तथा मोक्ष को भी देते हैं, साथ ही जो बड़े-बड़े पापों को भी हर लेते हैं, उनको मैं प्रणाम करता हूँ।

सूर्याष्टकं पठेन्नित्यं ग्रहपीडा प्रणाशनम् । अपुत्रो लभते पुत्रं दारिद्रो धनवान् भवेत् ॥

अमिषं मधुपानं च यः करोति रवेर्दिने । सप्तजन्मभवेत् रोगि जन्मजन्म दरिद्रता ॥

स्त्री-तैल-मधु-मांसानि ये त्यजन्ति रवेर्दिने । न व्याधि शोक दारिद्र्यं सूर्य लोकं च गच्छति ॥

इति श्रीशिवप्रोक्तं सूर्याष्टकं सम्पूर्णम् ।

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