श्रावण पूर्णिमा कब है?
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श्रावण पूर्णिमा कब है?

क्या आप जानना चाहते हैं कि श्रावण पूर्णिमा कब मनाई जाती है और इसका क्या महत्व है? इस लेख में जानिए श्रावण पूर्णिमा की तिथि, धार्मिक महत्व, पूजा विधि, व्रत कथा और इस दिन किए जाने वाले विशेष उपायों की पूरी जानकारी।

श्रावण पूर्णिमा के बारे में

हिंदू पंचांग के अनुसार श्रावण महीने में पड़ने वाली पूर्णिमा को श्रावण या श्रावणी पूर्णिमा कहा जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन स्नान, तप और दान करना बहुत शुभ माना जाता है। इसी दिन रक्षाबंधन का पर्व भी मनाया जाता है। मध्य और उत्तर भारत में कजरी पूर्णिमा भी इसी दिन होती है। इस अवसर पर यज्ञोपवीत पूजन और उपनयन संस्कार करने की परंपरा भी है। साथ ही, चंद्र दोष को दूर करने के लिए यह दिन विशेष रूप से फलदायी माना गया है।

श्रावण पूर्णिमा व्रत क्या है

श्रावण पूर्णिमा सावन महीने का अंतिम दिन होता है और इसके बाद भाद्रपद माह आरंभ हो जाता है। धर्मग्रंथों में इस तिथि को विशेष महत्व दिया गया है। इस दिन लोग पवित्र स्नान करते हैं, व्रत रखते हैं और श्रद्धा से भगवान की पूजा करते हैं।

इस मौके पर दान देना भी शुभ माना जाता है, जैसे अन्न, कपड़े और धन का दान। कई स्थानों पर हवन और पूजा-पाठ का आयोजन होता है। यही दिन रक्षाबंधन और कजरी पूर्णिमा जैसे पर्वों के रूप में भी मनाया जाता है, जिससे इसकी महत्ता और बढ़ जाती है।

श्रावण पूर्णिमा का महत्व

  • इस दिन भाई-बहन का पर्व रक्षाबंधन मनाया जाता है, जिसे सावनी या सलूनो भी कहा जाता है। इसमें बहन भाई की कलाई पर राखी बांधती है। इसके अलावा ब्राह्मण, गुरु और परिवार की छोटी लड़कियां भी अपने संबंधियों, जैसे बेटी अपने पिता को, रक्षा सूत्र बांधती हैं।
  • इसी दिन जनेऊ बदलने की परंपरा होती है, जिसे श्रावणी उपाकर्म कहा जाता है। जनेऊ धारण करने वाले लोग इस दिन मन, वचन और कर्म को शुद्ध रखने का संकल्प लेते हैं। स्नान, ऋषि तर्पण आदि विधियों के बाद नया यज्ञोपवीत पहना जाता है। ब्राह्मण अपने यजमानों को जनेऊ और राखी देकर उनसे दक्षिणा लेते हैं।
  • मान्यता है कि गुरु पूर्णिमा से शुरू होने वाली अमरनाथ यात्रा श्रावण पूर्णिमा के दिन पूरी होती है। इसी दिन कांवड़ यात्रा भी समाप्त होती है और भक्त शिवलिंग पर जल चढ़ाते हैं। दक्षिण भारत में इस दिन नारली पूर्णिमा मनाई जाती है, जिसमें भगवान शिव की पूजा कर विशेष अर्पण किया जाता है।
  • उत्तर भारत में इसे कजरी पूर्णिमा भी कहा जाता है। इस दिन अच्छी फसल की कामना से खेतों में अनाज बोया जाता है और माता दुर्गा की पूजा की जाती है।
  • यह दिन दान-पुण्य के लिए भी बहुत शुभ माना जाता है। स्नान के बाद गाय को चारा, चींटियों और मछलियों को दाना खिलाना अच्छा माना जाता है। गोदान का भी विशेष महत्व होता है और ब्राह्मणों को भोजन कराकर दान दिया जाता है।
  • इस दिन भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा करने का विधान है। उनकी पूजा से सुख, धन और समृद्धि की प्राप्ति होती है। साथ ही भगवान शिव, विष्णु, महालक्ष्मी और हनुमान जी को रक्षा सूत्र अर्पित करना भी शुभ माना जाता है।

श्रावण पूर्णिमा पूजा विधि

स्नान और संकल्प: सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और पानी में गंगाजल मिलाना शुभ माना जाता है। इसके बाद साफ-सुथरे कपड़े पहनकर भगवान के सामने व्रत रखने का संकल्प लें। ऐसा करने से मन और तन दोनों शुद्ध होते हैं।

भगवान विष्णु की पूजा: भगवान विष्णु की प्रतिमा या चित्र को पंचामृत से स्नान कराएं। फिर चंदन, तुलसी दल, अक्षत, पीले फूल, फल और मिठाई अर्पित करें। इस दिन उनकी पूजा करने से घर में सुख-शांति और समृद्धि बनी रहती है।

सत्यनारायण कथा: इस दिन सत्यनारायण भगवान की पूजा और कथा का पाठ या श्रवण करना बहुत फलदायी माना जाता है। इससे जीवन में सकारात्मकता आती है और इच्छाएं पूरी होने की मान्यता है।

भगवान शिव की आराधना: सावन के अंतिम दिन भगवान शिव की पूजा का खास महत्व होता है। शिवलिंग पर कच्चा दूध, बेलपत्र, धतूरा और फूल चढ़ाकर अभिषेक करें। इससे शिव जी की कृपा प्राप्त होती है।

चंद्रमा को जल अर्पित करें: रात में चंद्रमा के दर्शन होने पर “ॐ सोमाय नमः” मंत्र बोलते हुए जल चढ़ाएं। इससे मन शांत होता है और चंद्र से जुड़े दोष कम होते हैं।

दान का महत्व: पूजा के बाद ब्राह्मणों या जरूरतमंद लोगों को अन्न, वस्त्र या धन का दान करें। इसके अलावा गाय को चारा खिलाना भी शुभ और पुण्य देने वाला माना जाता है।

श्रावण पूर्णिमा व्रत कथा

एक समय की बात है, जब यशोदा मैया ने भगवान श्री कृष्ण से कहा, “हे कृष्ण! आप ही सृष्टि के रचयिता, पालन करने वाले और संहार करने वाले हैं। मुझे ऐसा कोई व्रत बताइए, जिसे करने से स्त्रियों को विधवा होने का डर न रहे और लोगों की मनोकामनाएं पूरी हों।”

इस पर श्री कृष्ण ने कहा, “माता, आपने बहुत अच्छा प्रश्न पूछा है। मैं आपको एक ऐसे व्रत के बारे में बताता हूं, जो बहुत फलदायी है। सौभाग्य पाने के लिए स्त्रियों को 32 पूर्णिमा का व्रत करना चाहिए। इस व्रत से उन्हें सुख, समृद्धि और अच्छा भाग्य मिलता है। साथ ही, यह व्रत भगवान शिव के प्रति भक्ति को भी बढ़ाता है।”

यह सुनकर यशोदा जी ने फिर पूछा, “हे कृष्ण! सबसे पहले यह व्रत किसने किया था? इसकी पूरी कथा मुझे बताइए।” तब श्री कृष्ण ने उन्हें एक कहानी सुनाई:

व्रत कथा

राजा चंद्रहास के राज्य कातिका नगर में धनेश्वर नाम का एक ब्राह्मण रहता था। उसकी पत्नी का नाम रूपवती था। उनके पास धन-दौलत की कोई कमी नहीं थी, लेकिन उनके कोई संतान नहीं थी, जिससे वे दुखी रहते थे।

एक दिन उस नगर में एक तपस्वी योगी आया। वह हर घर से भिक्षा मांगता था, लेकिन ब्राह्मण के घर से नहीं लेता था। कई दिनों तक ऐसा ही चलता रहा। एक दिन धनेश्वर ने इसका कारण पूछा।

तब योगी ने कहा, “जिस घर में संतान नहीं होती, वहां से भिक्षा लेना उचित नहीं माना जाता।” यह सुनकर धनेश्वर बहुत दुखी हुआ और उसने योगी से उपाय पूछा।

योगी ने उसे देवी चंडी की पूजा करने की सलाह दी। अगले दिन धनेश्वर जंगल में जाकर पूरी श्रद्धा से उपवास और देवी चंडी की आराधना करने लगा।

लगातार 16 दिनों की तपस्या के बाद देवी चंडी प्रसन्न होकर उसके सामने प्रकट हुईं। उन्होंने कहा, “तुम्हें जल्द ही पुत्र प्राप्त होगा, लेकिन उसकी आयु केवल 16 वर्ष की होगी। इसके बाद उसकी मृत्यु हो जाएगी।”

श्रावण पूर्णिमा की परंपराएं

रक्षाबंधन: उत्तर भारत में इस दिन रक्षाबंधन मनाया जाता है। बहनें भाई की कलाई पर राखी बांधकर उसकी लंबी उम्र, सुख और समृद्धि की कामना करती हैं।

जनेऊ बदलने की परंपरा (श्रावणी उपाकर्म): दक्षिण भारत और अन्य जगहों पर इस दिन ब्राह्मण पवित्र नदी में स्नान करके पुराना जनेऊ बदलते हैं और नए सिरे से वेदों का अध्ययन शुरू करते हैं।

शिव और विष्णु पूजा: सावन का अंतिम दिन होने के कारण शिव मंदिरों में विशेष पूजा और रुद्राभिषेक किया जाता है। साथ ही भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा भी की जाती है, जिससे घर में सुख-शांति बनी रहती है।

सत्यनारायण कथा: इस दिन घरों और मंदिरों में सत्यनारायण भगवान की कथा का पाठ या श्रवण किया जाता है। इसे करने से जीवन में शांति और खुशहाली आती है।

नारियली पूर्णिमा: समुद्र किनारे वाले क्षेत्रों, जैसे महाराष्ट्र और दक्षिण भारत में, इस दिन मछुआरे समुद्र देवता को नारियल चढ़ाते हैं और सुरक्षित यात्रा की प्रार्थना करते हैं।

स्नान और दान: ब्रह्म मुहूर्त में पवित्र नदियों में स्नान करना बहुत शुभ माना जाता है। इस दिन अन्न, वस्त्र और घी का दान करना पुण्यदायी होता है।

कजरी पूर्णिमा: मध्य भारत में इस दिन कजरी पूर्णिमा मनाई जाती है। इसमें माता भगवती की पूजा की जाती है और अच्छी फसल के लिए प्रार्थना की जाती है।

श्रावण पूर्णिमा का धार्मिक महत्व

1. आध्यात्मिक महत्व: श्रावण पूर्णिमा को बेहद पवित्र तिथि माना जाता है। इस दिन भगवान शिव, विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा करने से शुभ फल मिलते हैं और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा आती है।

2. स्नान, व्रत और दान का महत्व: इस दिन पवित्र स्नान करना, व्रत रखना और दान देना बहुत लाभकारी माना जाता है। इससे पाप कम होते हैं और अच्छे कर्मों का फल मिलता है।

3. रक्षाबंधन का महत्व: इसी दिन रक्षाबंधन का पर्व मनाया जाता है, जो भाई-बहन के स्नेह और भरोसे का प्रतीक है। यह रिश्तों में प्रेम और अपनापन बढ़ाता है।

4. जनेऊ परिवर्तन (उपाकर्म): इस तिथि पर जनेऊ बदलने की परंपरा निभाई जाती है। यह मन, वचन और कर्म को शुद्ध रखने के नए संकल्प का संकेत है।

5. सत्यनारायण पूजा का महत्व: श्रावण पूर्णिमा पर सत्यनारायण भगवान की पूजा और कथा सुनना शुभ माना जाता है। इससे घर में शांति, सुख और समृद्धि बनी रहती है।

6. सावन का समापन: यह दिन सावन महीने के अंत का संकेत देता है। इसलिए इस दिन भगवान शिव की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है।

7. सामाजिक और पारिवारिक महत्व: यह पर्व धार्मिक होने के साथ-साथ सामाजिक रूप से भी महत्वपूर्ण है। यह परिवार में प्रेम, मेल-जोल और एकता को मजबूत करता है।

श्रावण पूर्णिमा का सांस्कृतिक महत्व

1. भाई-बहन के स्नेह का प्रतीक: इस दिन रक्षाबंधन मनाया जाता है, जो भाई-बहन के प्रेम, भरोसे और सुरक्षा के रिश्ते को दर्शाता है। यह परंपरा परिवारिक संबंधों को और मजबूत बनाती है।

2. विविध परंपराओं की झलक: इस अवसर पर अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग रीति-रिवाज निभाए जाते हैं, जैसे कजरी पूर्णिमा और नारियली पूर्णिमा। इससे भारत की सांस्कृतिक विविधता साफ दिखाई देती है।

3. मिल-जुलकर त्योहार मनाना: इस दिन लोग परिवार और समाज के साथ मिलकर पूजा, कथा और उत्सव मनाते हैं। इससे आपसी जुड़ाव और खुशी बढ़ती है।

4. लोक परंपराओं का संरक्षण: कई स्थानों पर कजरी जैसे लोकगीत गाए जाते हैं और पारंपरिक कार्यक्रम होते हैं, जो हमारी संस्कृति को जीवित रखने में मदद करते हैं।

5. प्रकृति और खेती से संबंध: यह समय खेती-बाड़ी का होता है, इसलिए किसान अच्छी फसल के लिए पूजा करते हैं। यह पर्व प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करने का भी अवसर देता है।

श्रावण पूर्णिमा की तैयारी कैसे करें

स्नान और शुद्धि: सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और पानी में गंगाजल मिलाएं। अगर संभव हो, तो किसी पवित्र नदी में स्नान करना और भी शुभ माना जाता है।

पूजा की तैयारी: भगवान शिव को बेलपत्र, फूल, धतूरा और दूध चढ़ाएं। साथ ही भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की भी पूजा करें, क्योंकि यह दिन उनकी आराधना के लिए भी खास होता है।

पीपल वृक्ष की पूजा: पीपल के पेड़ पर मीठा जल चढ़ाएं और दीप जलाएं। ऐसा करने से शिव और विष्णु जी की कृपा प्राप्त होती है।

रक्षाबंधन की तैयारी: राखी की थाली सजाएं, जिसमें कुमकुम, अक्षत और मिठाई रखें। इसी से विधि-विधान से राखी बांधी जाती है।

दान का महत्व: पूर्णिमा के दिन जरूरतमंद लोगों को भोजन, कपड़े या अन्य वस्तुएं देना बहुत शुभ माना जाता है।

शाम की पूजा: रात में चंद्रमा निकलने पर उन्हें जल अर्पित करें और “ॐ सोमाय नमः” मंत्र का जाप करें। इससे मन को शांति मिलती है।

व्रत का पालन: अगर व्रत रखते हैं, तो इस दिन सादा और सात्विक भोजन करें। फल, दूध या हल्का आहार लेना उचित माना जाता है।

श्रावण पूर्णिमा के शुभ कार्य

1. जल से अभिषेक: इस दिन शिवलिंग पर गंगाजल या स्वच्छ जल चढ़ाना शुभ माना जाता है। ऐसा करने से भगवान शिव प्रसन्न होते हैं।

2. प्रिय वस्तुएं अर्पित करें: शिवलिंग पर दूध, बेलपत्र, धतूरा और सफेद फूल चढ़ाएं। ये सभी चीजें शिव जी को अर्पित करना अच्छा माना जाता है।

3. रुद्राभिषेक का महत्व: इस दिन रुद्राभिषेक करना या करवाना लाभकारी माना जाता है। इससे जीवन की बाधाएं कम होती हैं और इच्छाएं पूरी होती हैं।

4. मंत्रों का जाप: “ॐ नमः शिवाय” मंत्र का श्रद्धा से जाप करें। इससे मन को शांति मिलती है और भक्ति बढ़ती है।

5. मंदिर जाकर दर्शन करें: नजदीकी शिव मंदिर में जाकर भगवान शिव के दर्शन करें और विधि से पूजा करें।

6. व्रत और संयम: इस दिन व्रत रखना शुभ होता है। हल्का और सात्विक भोजन करें और दिनभर भगवान शिव का स्मरण करें।

7. दीप और धूप जलाना: शिवलिंग के पास दीपक और धूप जलाकर पूजा करें। इससे वातावरण पवित्र बनता है और पूजा का फल बढ़ता है।

श्रावण पूर्णिमा में क्या करें और क्या न करें

क्या करें?

शिव पूजा और अभिषेक: भगवान शिव की पूजा करें और शिवलिंग पर दूध, दही, शहद और घी से अभिषेक करें। इससे शिव जी की कृपा प्राप्त होती है।

दान-पुण्य करें: इस दिन जरूरतमंद लोगों को अन्न और कपड़े दान करें। साथ ही गाय को चारा खिलाना भी पुण्यदायी माना जाता है।

रक्षाबंधन मनाएं: इस अवसर पर भाई-बहन के प्रेम का पर्व रक्षाबंधन मनाएं और एक-दूसरे की खुशहाली की कामना करें।

घर की साफ-सफाई: घर को साफ रखें और मुख्य द्वार पर घी का दीपक जलाएं। इससे सकारात्मक वातावरण बनता है।

सात्विक भोजन करें: इस दिन हल्का और शुद्ध भोजन करें, जैसे फल, दूध या सात्विक आहार। इससे शरीर और मन दोनों स्वस्थ रहते हैं।

क्या न करें?

  • हिंदू मान्यताओं के अनुसार सावन पूर्णिमा के दिन कुछ बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए। इस दिन गुस्सा करने या किसी से झगड़ा करने से बचें, खासकर पूजा के समय मन को शांत रखें।
  • इस दिन मांस, शराब या किसी भी तरह की नशीली चीजों का सेवन नहीं करना चाहिए। सात्विक भोजन करना ही उचित माना जाता है।
  • सावन पूर्णिमा पर गंदे, फटे-पुराने या पहले से पहने हुए कपड़े नहीं पहनने चाहिए। काले रंग के वस्त्र पहनने से भी बचना चाहिए और साफ-सुथरे कपड़े धारण करें।
  • इस दिन सूर्योदय के बाद सोना अच्छा नहीं माना जाता। साथ ही, किसी की बुराई, चुगली या गलत व्यवहार करने से भी दूर रहना चाहिए।
  • इसके अलावा, इस दिन तुलसी के पत्ते नहीं तोड़ने चाहिए। भगवान विष्णु की पूजा के लिए तुलसी पत्र एक दिन पहले ही तोड़कर रख लेना चाहिए।
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Published by Sri Mandir·June 15, 2026

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