
क्या आप जानना चाहते हैं कि पिठोरी अमावस्या कब मनाई जाती है और इसका धार्मिक महत्व क्या है? इस लेख में जानिए पिठोरी अमावस्या की तिथि, पूजा-विधि, शुभ मुहूर्त, पौराणिक कथा, आध्यात्मिक महत्व और इस दिन किए जाने वाले विशेष उपायों की संपूर्ण जानकारी।
पिठोरी अमावस्या भाद्रपद माह की अमावस्या को मनाई जाती है, जिसे मुख्य रूप से महाराष्ट्र और उत्तर भारत में विशेष महत्व दिया जाता है। इस दिन माताएं संतान की दीर्घायु, उत्तम स्वास्थ्य और समृद्धि के लिए व्रत रखती हैं। इसमें माता दुर्गा और 64 योगिनियों की पूजा की जाती है। पूजा में आटे (पिठ) से मूर्तियां या पकवान बनाकर अर्पित करने की परंपरा के कारण इसे 'पिठोरी' कहा जाता है। पितृ तर्पण के लिए भी यह तिथि अत्यंत शुभ मानी जाती है।
हिंदू धर्म में अमावस्या तिथि का विशेष महत्व माना गया है। प्रत्येक अमावस्या अपने भीतर कोई न कोई आध्यात्मिक संदेश, धार्मिक मान्यता और विशेष साधना का अवसर लेकर आती है। इन्हीं पवित्र अमावस्याओं में से एक है पिठोरी अमावस्या, जो विशेष रूप से मातृत्व, संतान-सुख और परिवार की सुख-समृद्धि से जुड़ी हुई मानी जाती है। भाद्रपद मास में आने वाली यह अमावस्या महिलाओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। इस दिन महिलाएं अपने बच्चों की लंबी आयु, उत्तम स्वास्थ्य और सुखी जीवन की कामना से व्रत रखती हैं तथा मां दुर्गा, भगवान शिव और 64 योगिनियों की पूजा करती हैं।
पिठोरी अमावस्या केवल एक व्रत या धार्मिक परंपरा भर नहीं है, बल्कि यह मां के प्रेम, त्याग और अपनी संतान के प्रति अटूट समर्पण का प्रतीक भी है। इस दिन की पूजा में विशेष रूप से आटे से देवी-देवताओं की प्रतिमाएं बनाई जाती हैं, इसी कारण इसे ‘पिठोरी’ अमावस्या कहा जाता है। ‘पिठो’ शब्द का अर्थ आटा माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि श्रद्धा और विधिपूर्वक किया गया यह व्रत संतान से जुड़े कष्टों को दूर करता है और परिवार में सुख-शांति लाता है।
आइए विस्तार से जानते हैं कि वर्ष 2026 में पिठोरी अमावस्या कब मनाई जाएगी, इसका धार्मिक महत्व क्या है, पूजा-विधि कैसे की जाती है और इस दिन कौन-कौन से शुभ कार्य करना विशेष फलदायी माना गया है।
वर्ष 2026 में पिठोरी अमावस्या का व्रत 10 सितम्बर 2026, बृहस्पतिवार को रखा जाएगा। भाद्रपद मास की अमावस्या तिथि को मनाया जाने वाला यह पर्व विशेष रूप से विवाहित महिलाओं और माताओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। इस दिन व्रत, स्नान, दान और देवी पूजन का विशेष महत्व बताया गया है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस तिथि पर श्रद्धा और नियमपूर्वक की गई पूजा-अर्चना से संतान सुख, अखंड सौभाग्य और परिवार की समृद्धि प्राप्त होती है। साथ ही, यह दिन पितरों के तर्पण, दान-पुण्य और आध्यात्मिक साधना के लिए भी अत्यंत शुभ माना गया है।
पिठोरी अमावस्या भाद्रपद मास की अमावस्या तिथि को मनाया जाने वाला एक अत्यंत पवित्र व्रत और पर्व है। यह पर्व मुख्य रूप से मातृत्व, संतान-सुख और परिवार की खुशहाली से जुड़ा हुआ माना जाता है। इस दिन महिलाएं अपने बच्चों की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और उज्ज्वल भविष्य की कामना करते हुए व्रत रखती हैं।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन मां दुर्गा, भगवान शिव और 64 योगिनियों की विशेष पूजा की जाती है। पूजा के दौरान महिलाएं गेहूं के आटे से देवी-देवताओं की छोटी-छोटी प्रतिमाएं बनाती हैं और उनका विधिपूर्वक पूजन करती हैं। यही कारण है कि इस अमावस्या को ‘पिठोरी अमावस्या’ कहा जाता है।
यह पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह माता और संतान के बीच प्रेम, सुरक्षा और आशीर्वाद के पवित्र संबंध का भी प्रतीक माना जाता है। इस दिन की पूजा को विशेष रूप से उन महिलाओं के लिए फलदायी बताया गया है जो संतान-सुख की इच्छा रखती हैं या अपनी संतान के जीवन में सुख-समृद्धि की कामना करती हैं।
पिठोरी अमावस्या का महत्व हिंदू धर्म में अत्यंत विशेष माना गया है। यह पर्व केवल धार्मिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि पारिवारिक और आध्यात्मिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। और यह दिन विशेष रूप से सभी माताओं द्वारा अपनी सभी संतानों के सुख, सुरक्षा एवं उज्ज्वल भविष्य की कामना के लिए ही समर्पित होता है।
धार्मिक मान्यता है कि इस दिन देवी शक्ति की आराधना करने से परिवार में सुख-शांति और समृद्धि का वास होता है। इस व्रत के प्रभाव से बच्चों पर आने वाले संकट दूर होते हैं और उन्हें अच्छे स्वास्थ्य एवं दीर्घायु का आशीर्वाद प्राप्त होता है। यह अमावस्या पितरों की शांति और तर्पण के लिए भी अत्यंत शुभ मानी जाती है। इस दिन दान-पुण्य, पिंडदान और जरूरतमंदों की सहायता करने से विशेष पुण्य फल प्राप्त होता है।
पिठोरी अमावस्या हमें यह भी सिखाती है कि परिवार के प्रति समर्पण, प्रेम और कर्तव्य जीवन का सबसे बड़ा धर्म है। मातृत्व की भावना, त्याग और निस्वार्थ प्रेम का यह पर्व भारतीय संस्कृति की सुंदरता को दर्शाता है।
पिठोरी अमावस्या का धार्मिक महत्व अत्यंत व्यापक माना गया है। इस दिन देवी दुर्गा, भगवान शिव और 64 योगिनियों की पूजा की जाती है। तांत्रिक परंपरा में 64 योगिनियों का विशेष स्थान माना गया है और उनकी आराधना से जीवन में सुरक्षा, शक्ति और समृद्धि प्राप्त होती है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन की गई पूजा व्यक्ति के जीवन से नकारात्मक ऊर्जा को दूर करती है और घर में सकारात्मकता का संचार करती है। यह दिन देवी शक्ति की उपासना, उनकी आराधना के लिए बहुत शुभ माना जाता है। आध्यात्मिक दृष्टि से भी यह अमावस्या विशेष महत्व रखती है। अमावस्या का दिन आत्मचिंतन, साधना और आध्यात्मिक उन्नति के लिए उत्तम माना गया है। इस दिन व्रत और पूजा करने से मन को शांति प्राप्त होती है तथा व्यक्ति का आत्मबल बढ़ता है।
माना जाता है कि श्रद्धा और भक्ति के साथ किया गया यह व्रत व्यक्ति को मानसिक संतुलन, धैर्य और सकारात्मक सोच प्रदान करता है। माता दुर्गा की कृपा से जीवन की बाधाएं दूर होती हैं और साधक को आध्यात्मिक ऊर्जा प्राप्त होती है।
पिठोरी अमावस्या से अनेक धार्मिक परंपराएं और मान्यताएं जुड़ी हुई हैं। इस दिन महिलाएं विशेष रूप से व्रत रखती हैं और अपने बच्चों के कल्याण के लिए पूजा करती हैं। सबसे प्रमुख परंपरा आटे से देवी-देवताओं की प्रतिमाएं बनाने की मानी जाती है। महिलाएं गेहूं के आटे से मां दुर्गा, भगवान शिव और 64 योगिनियों की प्रतिमाएं बनाकर उन्हें चौकी पर स्थापित करती हैं और विधिपूर्वक पूजा करती हैं।
कई स्थानों पर इस दिन सुहाग सामग्री अर्पित करने की भी परंपरा है। महिलाएं माता को चूड़ी, सिंदूर, चुनरी और श्रृंगार सामग्री अर्पित करती हैं। इस दिन पवित्र नदियों में स्नान करना और सूर्य देव को अर्घ्य देना भी शुभ माना जाता है। इसके साथ ही पितरों के निमित्त तर्पण और पिंडदान करने की परंपरा भी प्रचलित है। दक्षिण भारत में इस अमावस्या को पोलाला अमावस्या के रूप में मनाया जाता है और देवी पोलेरम्मा की पूजा की जाती है। वहीं कई क्षेत्रों में सप्तमातृकाओं की पूजा भी की जाती है।
पिठोरी अमावस्या की तैयारी महिलाएं कई दिन पहले से ही शुरू कर देती हैं। इस दिन घर की विशेष साफ-सफाई की जाती है और पूजा स्थल को पवित्र बनाया जाता है। पूजा के लिए आवश्यक सामग्री जैसे गेहूं का आटा, फूल, रोली, हल्दी, अक्षत, दीपक, धूप, कलश और सुहाग सामग्री पहले से एकत्र की जाती है।
कई महिलाएं इस दिन व्रत रखने के कारण पहले से सात्विक भोजन की तैयारी करती हैं। पूजा स्थल को फूलों और रंगोली से सजाया जाता है ताकि वातावरण भक्तिमय और पवित्र बना रहे। इसके अलावा महिलाएं व्रत कथा की पुस्तक, पूजा थाली और आरती की तैयारी भी पहले से कर लेती हैं। कुछ स्थानों पर परिवार के सभी सदस्य मिलकर पूजा की तैयारी करते हैं, जिससे घर में धार्मिक वातावरण बना रहता है।
पिठोरी अमावस्या का पर्व अत्यंत श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाता है। इस दिन महिलाएं प्रातःकाल जल्दी उठकर स्नान करती हैं और स्वच्छ वस्त्र धारण करती हैं। इसके बाद व्रत और पूजा का संकल्प लिया जाता है। पूजा स्थल पर चौकी रखकर उस पर पीला या लाल वस्त्र बिछाया जाता है। फिर गेहूं के आटे से बनाई गई देवी-देवताओं और 64 योगिनियों की प्रतिमाएं स्थापित की जाती हैं।
पूजा के दौरान दीपक जलाकर मां दुर्गा, भगवान शिव और योगिनियों का विधिपूर्वक पूजन किया जाता है। उन्हें फूल, अक्षत, रोली, मिठाई और नैवेद्य अर्पित किया जाता है। इसके बाद पिठोरी अमावस्या की व्रत कथा सुनी या पढ़ी जाती है। अंत में आरती करके परिवार की सुख-समृद्धि और संतान की रक्षा की कामना की जाती है। कई स्थानों पर इस दिन गरीबों को भोजन कराने, दान देने और ब्राह्मणों को भोजन कराने की भी परंपरा है।
पिठोरी अमावस्या के दिन प्रातःकाल स्नान करके व्रत और पूजा का संकल्प लेना चाहिए। इस दिन पवित्रता और सात्विकता का विशेष ध्यान रखना चाहिए। महिलाओं को गेहूं के आटे से देवी-देवताओं और 64 योगिनियों की प्रतिमाएं बनाकर उनकी पूजा करनी चाहिए। पितरों के निमित्त तर्पण और दान-पुण्य करना भी अत्यंत शुभ माना गया है। जरूरतमंदों को भोजन, वस्त्र और अन्न का दान करना पुण्यदायी माना गया है।
इस दिन ब्राह्मणों को भोजन कराना और गौ सेवा करना भी विशेष फलदायी बताया गया है। कुशा एकत्र करना और उसे घर में पवित्र स्थान पर रखना भी शुभ माना जाता है। साथ ही पूरे दिन भगवान का स्मरण, भजन-कीर्तन और धार्मिक कार्यों में समय बिताना अत्यंत लाभकारी माना गया है।
पिठोरी अमावस्या का पर्व हमें मातृत्व, प्रेम, त्याग और परिवार के महत्व का संदेश देता है। यह पर्व बताता है कि माता का अपने बच्चों के प्रति प्रेम और समर्पण कितना पवित्र और निस्वार्थ होता है। यह अमावस्या हमें परिवार की खुशहाली, बच्चों की सुरक्षा और समाज में सकारात्मकता बनाए रखने की प्रेरणा देती है। साथ ही यह पर्व हमें यह भी सिखाता है कि श्रद्धा, भक्ति और सच्चे मन से की गई पूजा व्यक्ति के जीवन में सुख, शांति और समृद्धि ला सकती है।
पिठोरी अमावस्या का यह पावन पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति में निहित पारिवारिक मूल्यों, मातृत्व की भावना और देवी शक्ति के प्रति श्रद्धा का सुंदर प्रतीक है। हम कामना करते हैं कि पिठोरी अमावस्या का यह पावन पर्व आपके जीवन में सुख, समृद्धि, आरोग्य और खुशियां लेकर आए तथा माता दुर्गा की कृपा आप और आपके परिवार पर सदैव बनी रहे। ऐसी ही धार्मिक और व्रत-त्योहारों से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी के लिए श्री मंदिर के साथ जुड़े रहें।
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