
क्या आप जानना चाहते हैं कि पर्युषण पर्वारंभ कब मनाया जाता है और इसका धार्मिक महत्व क्या है? इस लेख में जानिए पर्युषण पर्व की तिथि, पूजा-विधि, प्रमुख अनुष्ठान, आध्यात्मिक महत्व, क्षमा और आत्मशुद्धि के संदेश तथा इस पावन पर्व से जुड़ी विशेष मान्यताओं की संपूर्ण जानकारी।
पर्युषण पर्व जैन धर्म का सबसे पवित्र, महत्वपूर्ण और आध्यात्मिक पर्व माना जाता है। इसे आत्मशुद्धि, तप, संयम, साधना और क्षमा का महापर्व कहा जाता है। यह पर्व व्यक्ति को बाहरी संसार से हटकर अपनी आत्मा के करीब आने और आत्मचिंतन करने की प्रेरणा देता है। ‘पर्युषण’ शब्द संस्कृत के दो शब्दों — परि और उषण — से मिलकर बना है। इसका अर्थ होता है “चारों ओर से आत्मा के पास बस जाना” अर्थात अपने मन, वचन और कर्म को शुद्ध कर आत्मिक उन्नति की ओर बढ़ना।
वर्ष 2026 में जैन धर्म के पवित्र पर्युषण महापर्व का आरंभ मंगलवार, 8 सितम्बर 2026 से होगा। इस दिन से जैन श्रद्धालु उपवास, पूजा, प्रतिक्रमण, स्वाध्याय और धार्मिक साधना की शुरुआत करते हैं। यह पर्व आत्मशुद्धि, तप, संयम और क्षमायाचना का प्रतीक माना जाता है।
श्वेतांबर समाज में पर्युषण पर्व 8 सितम्बर से 14 सितम्बर 2026 तक मनाया जाएगा। यह पर्व कुल आठ दिनों तक चलता है। इस दौरान कल्पसूत्र का वाचन, प्रतिक्रमण और धार्मिक आराधना का विशेष महत्व होता है। इस परंपरा में 15 सितम्बर 2026 को संवत्सरी पर्व मनाया जाएगा, जिसे क्षमायाचना का सबसे महत्वपूर्ण दिन माना जाता है।
दिगंबर समाज में दशलक्षण पर्व का आरंभ 15 सितम्बर 2026 से होगा और यह 25 सितम्बर 2026 तक चलेगा। यह पर्व दस दिनों तक मनाया जाता है। दशलक्षण पर्व में धर्म के दस लक्षणों — क्षमा, मार्दव, आर्जव, सत्य, शौच, संयम, तप, त्याग, आकिंचन और ब्रह्मचर्य — का विशेष महत्व बताया गया है। इस परंपरा में 24 सितम्बर 2026 को क्षमावाणी पर्व मनाया जाएगा, जब श्रद्धालु एक-दूसरे से क्षमा मांगते हैं।
पर्युषण पर्वारंभ का अर्थ है जैन धर्म के सबसे पवित्र आध्यात्मिक पर्व की शुरुआत। यह वह समय होता है जब श्रद्धालु सांसारिक मोह-माया से दूर होकर आत्मा की शुद्धि और आध्यात्मिक उन्नति की ओर ध्यान केंद्रित करते हैं। इस पर्व के दौरान लोग उपवास रखते हैं, प्रतिक्रमण करते हैं, जैन आगम और कल्पसूत्र का अध्ययन करते हैं तथा अपने द्वारा जाने-अनजाने में हुई गलतियों के लिए क्षमा मांगते हैं। पर्युषण का सबसे महत्वपूर्ण संदेश है —“मिच्छामि दुक्कड़म्” अर्थात यदि मेरे किसी कार्य, वचन या विचार से किसी को दुख पहुंचा हो तो मुझे क्षमा करें।
जैन धर्म में पर्युषण पर्व को सभी पर्वों का राजा माना गया है। इन दिनों श्रद्धालु उपवास, जप, तप, प्रतिक्रमण, स्वाध्याय, ध्यान और क्षमायाचना जैसे धार्मिक कार्य करते हैं। मान्यता है कि इस समय की गई साधना का फल कई गुना अधिक प्राप्त होता है। यह पर्व हमें अहिंसा, क्षमा, संयम, दया और आत्मअनुशासन का महत्व सिखाता है।
पर्युषण पर्वारंभ जैन समाज के लिए विशेष महत्व रखता है। यह समय आत्मनिरीक्षण और आत्मशुद्धि का अवसर माना जाता है। श्रद्धालु इन दिनों क्रोध, अहंकार, लोभ और मोह जैसे विकारों को दूर करने का प्रयास करते हैं।
इस पर्व के दौरान उपवास, ध्यान, स्वाध्याय, प्रतिक्रमण और धार्मिक साधना की जाती है। मान्यता है कि सच्चे मन से की गई तपस्या और आराधना से मन को शांति मिलती है तथा आत्मिक शक्ति बढ़ती है। पर्युषण पर्व हमें क्षमा, विनम्रता, संयम और अहिंसा का संदेश देता है। यही कारण है कि इस पर्व को आत्मिक उन्नति और सकारात्मक परिवर्तन का पर्व कहा जाता है।
धार्मिक दृष्टि से पर्युषण पर्व जैन धर्म में अत्यंत शुभ और पुण्यदायी माना जाता है। इन दिनों श्रद्धालु जैन आगम, कल्पसूत्र और धर्म उपदेशों का अध्ययन करते हैं तथा भगवान महावीर के बताए मार्ग पर चलने का प्रयास करते हैं। आध्यात्मिक रूप से यह पर्व आत्मा की शुद्धि और कर्मों के नाश का माध्यम माना जाता है। उपवास, तप और प्रतिक्रमण के द्वारा व्यक्ति अपने मन, वचन और कर्म को शुद्ध करने का प्रयास करता है।
पर्युषण का सबसे बड़ा संदेश अहिंसा, क्षमा और आत्मसंयम है। इस दौरान लोग अपने द्वारा हुई गलतियों के लिए क्षमा मांगते हैं और दूसरों को भी क्षमा करते हैं। इससे मन का अहंकार दूर होता है और आत्मिक शांति प्राप्त होती है।
पर्युषण पर्व जैन धर्म का अत्यंत पवित्र और आध्यात्मिक पर्व माना जाता है। इस महापर्व की तैयारी श्रद्धालु कई दिन पहले से ही शुरू कर देते हैं। लोग अपने घर, मंदिर और मन को शुद्ध रखने का प्रयास करते हैं, क्योंकि पर्युषण का मुख्य उद्देश्य आत्मशुद्धि और आत्मचिंतन माना जाता है।
इस दौरान श्रद्धालु सांसारिक सुख-सुविधाओं से थोड़ा दूर रहकर साधना और संयम का पालन करने का संकल्प लेते हैं। कई लोग उपवास, एकासन, मौन व्रत और सात्विक जीवन अपनाने की तैयारी करते हैं। जैन मंदिरों और उपाश्रयों में विशेष पूजा, प्रवचन और धार्मिक कार्यक्रमों की व्यवस्था की जाती है।
पर्युषण से पहले लोग धार्मिक ग्रंथों, विशेष रूप से कल्पसूत्र और जैन आगमों के अध्ययन की तैयारी भी करते हैं। इसके साथ ही मन में क्रोध, अहंकार और द्वेष जैसी भावनाओं को छोड़कर क्षमा और दया का भाव विकसित करने का प्रयास किया जाता है।
पर्युषण पर्व श्रद्धा, तप, ध्यान और आत्मसंयम के साथ मनाया जाता है। इन दिनों जैन श्रद्धालु उपवास, ध्यान, जप, स्वाध्याय और प्रतिक्रमण जैसे धार्मिक कार्य करते हैं। कई लोग अपनी क्षमता के अनुसार एक दिन, कई दिन या पूरे पर्व तक उपवास रखते हैं। कुछ श्रद्धालु मौन व्रत धारण कर ध्यान और आत्मचिंतन में समय बिताते हैं। मंदिरों और उपाश्रयों में धार्मिक प्रवचन, भजन, पूजा और कल्पसूत्र का वाचन किया जाता है। श्रद्धालु भगवान महावीर के जीवन और उनके तप, त्याग तथा अहिंसा के संदेश को याद करते हैं।
पर्युषण के दौरान दया, सेवा और दान-पुण्य का विशेष महत्व होता है। लोग जरूरतमंदों की सहायता करते हैं और सभी जीवों के प्रति करुणा का भाव रखते हैं। इस पर्व का सबसे महत्वपूर्ण भाग क्षमायाचना माना जाता है। श्रद्धालु अपने मन, वचन और कर्म से हुई गलतियों के लिए दूसरों से क्षमा मांगते हैं और स्वयं भी सभी को क्षमा करते हैं
पर्युषण पर्वारंभ हमें आत्मचिंतन, आत्मशुद्धि और आत्मसंयम का संदेश देता है। यह पावन पर्व सिखाता है कि व्यक्ति को अपने भीतर के क्रोध, अहंकार, लोभ और द्वेष जैसे विकारों को दूर कर शांति, दया और क्षमा का मार्ग अपनाना चाहिए। यह पर्व अहिंसा और करुणा की भावना को मजबूत करता है। पर्युषण हमें हर जीव के प्रति प्रेम, सम्मान और संवेदनशीलता रखने की प्रेरणा देता है।
पर्युषण का सबसे बड़ा संदेश क्षमा का है। यह हमें सिखाता है कि मन में किसी के प्रति वैर या कटुता नहीं रखनी चाहिए और अपनी गलतियों के लिए विनम्रता से क्षमा मांगनी चाहिए। यह महापर्व हमें बाहरी दिखावे से दूर होकर अपनी आत्मा के करीब आने, अच्छे कर्म करने और आध्यात्मिक उन्नति की ओर बढ़ने की प्रेरणा देता है।
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