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इष्टि कब है

क्या आप जानना चाहते हैं कि इष्टि 2026 में कब है और इसका धार्मिक महत्व क्या है? इस लेख में आपको इष्टि की सही तिथि, पूजा विधि, शुभ मुहूर्त और इस व्रत से जुड़े नियम सरल भाषा में जानने को मिलेंगे।

इष्टि के बारे में

इष्टि एक मासिक अनुष्ठान है जो पूर्णिमा और अमावस्या के बाद आता है और यह हर महीने बदलता है। साल 2026 के लिए, इष्टि की तिथियां जनवरी (4, 19) से शुरू होकर दिसंबर (24) तक हैं, जो चंद्रमा की कलाओं पर आधारित होती हैं और इसका पालन मुख्य रूप से भगवान विष्णु के भक्तों द्वारा यज्ञ और मंत्र जाप के लिए किया जाता है।

2026 में इष्टि कब है?

  • जनवरी: 4, 19 (और 2025 में 14 जनवरी को थी)
  • फरवरी: 2, 18
  • मार्च: 4, 19
  • अप्रैल: 2, 18
  • मई: 2, 17
  • जून: 1, 15, 30
  • जुलाई: 15, 30
  • अगस्त: 13, 28
  • सितंबर: 11, 27
  • अक्टूबर: 11, 26
  • नवंबर: 10, 25
  • दिसंबर: 9, 24

इष्टि कब करनी चाहिए?

इष्टि परिवार की सुख-शांति, संतान सुख, वंश वृद्धि और पितरों की कृपा के लिए की जाती है। इसे विशेष रूप से वे लोग करते हैं जिन्हें संतान प्राप्ति में बाधा आ रही हो, जिनके परिवार में बार-बार संकट या अशांति बनी रहती हो, जो पितृ दोष या वंश संबंधी समस्याओं से परेशान हों, जो अपने पूर्वजों का ऋण चुकाना चाहते हों। इष्टि करने का सर्वोत्तम समय प्रातःकाल माना गया है, जब मन और वातावरण दोनों शुद्ध होते हैं।

इष्टि का धार्मिक महत्व

हिंदू शास्त्रों में इष्टि को यज्ञ स्वरूप कर्म माना गया है। यह केवल पूजा नहीं, बल्कि देवता, पितर और मानव तीनों के बीच संतुलन बनाने वाला कर्म है। यह पितरों को तृप्त करने का श्रेष्ठ उपाय मानी जाती है। इससे कुल देवता और कुल देवी की विशेष कृपा प्राप्त होती है। परिवार में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। संतान और वंश से जुड़े दोष शांत होते हैं। गृह क्लेश और मानसिक तनाव में कमी आती है। शास्त्रों में कहा गया है कि जो व्यक्ति श्रद्धा से इष्टि करता है, उसके वंश की रक्षा स्वयं देवता करते हैं।

इष्टि के पीछे पौराणिक मान्यता

पौराणिक कथाओं के अनुसार, राजा दशरथ ने संतान प्राप्ति के लिए पुत्रेष्टि यज्ञ कराया था। उसी यज्ञ के फलस्वरूप भगवान राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न का जन्म हुआ। इसी परंपरा से जुड़ा हुआ कर्म आगे चलकर इष्टि कहलाया। मान्यता है कि इष्टि करने से पूर्वज प्रसन्न होते हैं। पितर देवताओं से मिलकर परिवार के लिए वरदान मांगते हैं। जो दोष जन्म-जन्मांतर से चले आ रहे होते हैं, वे धीरे-धीरे समाप्त होते हैं। इष्टि को इसलिए भी विशेष माना गया क्योंकि इसमें देव, पितर और अग्नि—तीनों का आह्वान किया जाता है।

इष्टि के दिन क्या करें?

  • ब्रह्म मुहूर्त में उठें और स्नान करें
  • घर और पूजा स्थान को स्वच्छ रखें
  • सात्विक वस्त्र पहनें (हल्के रंग श्रेष्ठ माने जाते हैं)
  • पूजा से पहले संकल्प अवश्य लें
  • पितरों के नाम से तिल, जल और कुश अर्पित करें
  • यथाशक्ति दान करें- अन्न, वस्त्र या दक्षिणा
  • गाय, कुत्ता या पक्षियों को भोजन कराएं
  • पूरे दिन शांत और संयमित व्यवहार रखें
  • यदि संभव हो तो इष्टि कर्म योग्य पंडित से ही करवाना उत्तम माना जाता है।

इष्टि के दिन क्या न करें?

  • इष्टि के दिन कुछ बातों से विशेष रूप से बचना चाहिए-
  • मांस, मदिरा, लहसुन-प्याज का सेवन न करें
  • क्रोध, झगड़ा या कटु वचन न बोलें
  • किसी का अपमान या तिरस्कार न करें
  • बाल-नाखून न काटें
  • झूठ, छल या नकारात्मक सोच से दूर रहें
  • पूजा के दिन आलस्य न करें
  • मान्यता है कि इन बातों से इष्टि का पूर्ण फल प्राप्त नहीं होता।

इष्टि से मिलने वाले लाभ

  • पितृ दोष में कमी आती है
  • संतान संबंधी बाधाएं दूर होती हैं
  • परिवार में सुख-समृद्धि बढ़ती है
  • मानसिक तनाव और भय कम होता है
  • जीवन में स्थिरता और सकारात्मकता आती है
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Published by Sri Mandir·February 16, 2026

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