बहुला चतुर्थी कब है?
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बहुला चतुर्थी कब है?

क्या आप जानना चाहते हैं कि बहुला चतुर्थी कब है और इसका क्या महत्व है? इस लेख में जानिए इस व्रत की सही तिथि, पूजा विधि, पौराणिक कथा और इस दिन किए जाने वाले विशेष उपायों की पूरी जानकारी।

बहुला चतुर्थी के बारे में

बहुला चतुर्थी हिंदू धर्म का एक पवित्र व्रत है, जो विशेष रूप से गाय और उसके बछड़े की पूजा को समर्पित माना जाता है। यह व्रत संतान की सुख-समृद्धि, परिवार की रक्षा और गौ-सेवा के महत्व को दर्शाता है। इस दिन महिलाएं व्रत रखकर गौ माता की पूजा करती हैं तथा उनके कल्याण की कामना करती हैं। बहुला चतुर्थी करुणा, धर्म और प्रकृति के प्रति सम्मान का संदेश देने वाला पावन पर्व है।

बहुला चतुर्थी कब है?

बहुला चतुर्थी भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाई जाती है। यह तिथि हिंदू पंचांग के अनुसार हर वर्ष बदलती रहती है, क्योंकि इसकी गणना चंद्रमा की गति के आधार पर की जाती है। वर्ष 2026 में बहुला चतुर्थी का व्रत भाद्रपद कृष्ण चतुर्थी के दिन पड़ेगा, जो 31 अगस्त, सोमवार के दिन है।

  • गोधुली पूजा मुहूर्त - 06:06 पी एम से 06:31 पी एम
  • बोल चौथ के दिन चन्द्रोदय - 08:09 पी एम
  • चतुर्थी तिथि प्रारम्भ - अगस्त 31, 2026 को 08:50 ए एम बजे
  • चतुर्थी तिथि समाप्त - सितम्बर 01, 2026 को 07:41 ए एम बजे

इस व्रत का संबंध मुख्य रूप से भगवान श्रीकृष्ण और गौ माता से जुड़ा हुआ है। मान्यता है कि इसी दिन गौ माता ‘बहुला’ की कथा का विशेष महत्व है, जिसमें सत्य, धर्म और करुणा का संदेश दिया गया है। ग्रामीण क्षेत्रों में यह व्रत विशेष रूप से लोकप्रिय है और किसान परिवार इसे श्रद्धा और आस्था के साथ मनाते हैं।

बहुला चतुर्थी के दिन महिलाएं विशेष रूप से व्रत रखती हैं और गौ माता की पूजा करती हैं। इस दिन गाय और बछड़े को विशेष भोजन कराया जाता है और उनकी सेवा की जाती है। यह पर्व न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह प्रकृति और पशुओं के प्रति प्रेम और सम्मान का प्रतीक भी है। पंचांग के अनुसार चतुर्थी तिथि का आरंभ और समाप्ति समय हर वर्ष अलग होता है, इसलिए व्रत रखने वाले लोगों को सही तिथि और मुहूर्त की जानकारी अवश्य लेनी चाहिए। इस दिन व्रत रखने से सुख-समृद्धि, संतान की रक्षा और परिवार में खुशहाली आने की मान्यता है।

बहुला चतुर्थी व्रत क्या है?

बहुला चतुर्थी व्रत एक महत्वपूर्ण हिंदू धार्मिक व्रत है, जो गौ माता की पूजा और उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त करने के लिए किया जाता है। इस व्रत का विशेष महत्व ग्रामीण और कृषक समाज में अधिक देखा जाता है, जहां गाय को परिवार का अभिन्न हिस्सा माना जाता है। इस व्रत की कथा ‘बहुला गाय’ से जुड़ी है, जो सत्य और धर्म का प्रतीक मानी जाती है। पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार एक शेर ने बहुला गाय को पकड़ लिया। तब बहुला ने अपने बछड़े को दूध पिलाने के बाद वापस आने का वचन दिया। शेर ने उसे जाने दिया और बहुला ने अपने वचन का पालन करते हुए वापस आकर अपनी सत्यनिष्ठा का परिचय दिया। उसकी इस ईमानदारी से प्रभावित होकर शेर ने उसे छोड़ दिया। इस कथा से सत्य, वचनबद्धता और धर्म का महत्व स्पष्ट होता है।

इस दिन महिलाएं निर्जला या फलाहार व्रत रखती हैं और गौ माता की पूजा करती हैं। गाय को हरी घास, गुड़ और अन्य खाद्य सामग्री खिलाई जाती है। पूजा में दीप, धूप, फूल और रोली का प्रयोग किया जाता है। बहुला चतुर्थी व्रत केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह मानव और पशु के बीच के संबंध को भी मजबूत करता है। यह व्रत हमें सिखाता है कि हमें प्रकृति और जीव-जंतुओं के प्रति दया और करुणा रखनी चाहिए। आज के समय में भी यह व्रत अपनी परंपरा और महत्व को बनाए हुए है। लोग इसे श्रद्धा से करते हैं और अपने परिवार की सुख-समृद्धि के लिए भगवान से प्रार्थना करते हैं।

बहुला चतुर्थी व्रत का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व

बहुला चतुर्थी का व्रत हिंदू धर्म में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। धार्मिक दृष्टि से यह व्रत गौ माता की पूजा और उनके संरक्षण का संदेश देता है। हिंदू धर्म में गाय को “माता” का दर्जा दिया गया है और उसे सभी देवताओं का निवास स्थान माना जाता है। इस व्रत के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण की भी पूजा की जाती है, क्योंकि उनका जीवन गौ सेवा और गोपालन से जुड़ा हुआ है। इस दिन पूजा-पाठ करने से पापों का नाश होता है और जीवन में सुख-शांति आती है।

सांस्कृतिक रूप से यह व्रत भारतीय परंपराओं और ग्रामीण जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा है। गांवों में इस दिन विशेष उत्सव जैसा माहौल रहता है। महिलाएं पारंपरिक वस्त्र पहनकर पूजा करती हैं और लोकगीत गाए जाते हैं। यह व्रत समाज में नैतिक मूल्यों को भी बढ़ावा देता है। बहुला गाय की कथा हमें सिखाती है कि सत्य और ईमानदारी सबसे बड़ी ताकत होती है। इसके अलावा यह पर्व पर्यावरण संरक्षण और पशु प्रेम का भी संदेश देता है। आज के आधुनिक समय में भी यह व्रत अपनी प्रासंगिकता बनाए हुए है। यह लोगों को अपनी जड़ों से जोड़ता है और उन्हें भारतीय संस्कृति की याद दिलाता है।

बहुला चतुर्थी व्रत से जुड़ी परंपराएं और मान्यताएं

बहुला चतुर्थी व्रत से कई परंपराएं और मान्यताएं जुड़ी हुई हैं। इस दिन गौ माता की विशेष पूजा की जाती है और उन्हें हरा चारा, गुड़ और अनाज खिलाया जाता है। मान्यता है कि गाय की सेवा करने से सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। इस दिन महिलाएं व्रत रखती हैं और शाम के समय पूजा करती हैं। कई स्थानों पर महिलाएं मिट्टी की गाय बनाकर उसकी पूजा करती हैं। यह परंपरा विशेष रूप से उन जगहों पर होती है जहां वास्तविक गाय उपलब्ध नहीं होती।

एक महत्वपूर्ण मान्यता यह भी है कि इस दिन दूध और दूध से बने उत्पादों का सेवन नहीं किया जाता। इसका उद्देश्य गाय के प्रति सम्मान प्रकट करना है। बहुला गाय की कथा सुनना और सुनाना भी इस दिन की महत्वपूर्ण परंपरा है। लोग अपने बच्चों को यह कथा सुनाते हैं ताकि उनमें नैतिक मूल्यों का विकास हो। इस दिन दान-पुण्य का भी विशेष महत्व होता है। गरीबों को भोजन कराना और जरूरतमंदों की मदद करना पुण्यदायी माना जाता है।

बहुला चतुर्थी व्रत कैसे मनाई जाती है?

बहुला चतुर्थी का व्रत सुबह स्नान करके और साफ कपड़े पहनकर शुरू किया जाता है। महिलाएं पूरे दिन व्रत रखती हैं और भगवान श्रीकृष्ण तथा गौ माता का ध्यान करती हैं। शाम के समय पूजा की जाती है। पूजा में गाय और बछड़े की प्रतिमा या चित्र स्थापित किया जाता है। उन्हें फूल, रोली, चावल और दीपक अर्पित किए जाते हैं। गाय को हरी घास और गुड़ खिलाया जाता है। यदि घर में गाय नहीं है तो पास के गौशाला में जाकर गाय की सेवा की जाती है। पूजा के बाद बहुला गाय की कथा सुनी जाती है। इसके बाद व्रत खोला जाता है और परिवार के साथ प्रसाद ग्रहण किया जाता है। यह पर्व सादगी और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है, जिसमें दिखावा नहीं बल्कि आस्था का महत्व होता है।

बहुला चतुर्थी व्रत की तैयारी कैसे की जाती है?

बहुला चतुर्थी की तैयारी व्रत से एक दिन पहले ही शुरू हो जाती है। इस व्रत को श्रद्धा और विधि-विधान से करने के लिए साफ-सफाई और मानसिक शुद्धता का विशेष ध्यान रखा जाता है। घर की साफ-सफाई की जाती है और पूजा स्थल को अच्छी तरह सजाया जाता है, ताकि वहां सकारात्मक ऊर्जा बनी रहे। व्रत रखने वाली महिलाएं एक दिन पहले ही पूजा की सभी आवश्यक सामग्री जुटा लेती हैं। इसमें रोली, चावल, फूल, दीपक, धूप, जल, गुड़, हरी घास, मिट्टी की गाय-बछड़े की प्रतिमा या चित्र शामिल होते हैं। जिन घरों में गाय नहीं होती, वे पास के गौशाला जाने की योजना बनाते हैं।

व्रत के दिन के लिए सात्विक भोजन की भी तैयारी की जाती है। कई महिलाएं पहले से ही फल, सूखे मेवे और व्रत में उपयोग होने वाले खाद्य पदार्थ तैयार कर लेती हैं। इस दिन तामसिक भोजन से दूर रहने का संकल्प लिया जाता है। मानसिक तैयारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है। व्रती मन में संकल्प लेती हैं कि वे पूरे दिन संयम, शांति और श्रद्धा बनाए रखेंगी। क्रोध, झूठ और नकारात्मक विचारों से दूर रहने की कोशिश की जाती है। कुछ लोग इस दिन विशेष पूजा या कथा सुनने के लिए पंडित को भी आमंत्रित करते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में सामूहिक रूप से पूजा करने की भी परंपरा है, जिससे सामाजिक एकता और सहयोग की भावना बढ़ती है। इस प्रकार, बहुला चतुर्थी की तैयारी केवल बाहरी व्यवस्था तक सीमित नहीं होती, बल्कि इसमें मन, वचन और कर्म की शुद्धता भी शामिल होती है, जो इस व्रत को और अधिक प्रभावी बनाती है।

बहुला चतुर्थी व्रत में किए जाने वाले पवित्र कार्य

बहुला चतुर्थी के दिन कई पवित्र कार्य किए जाते हैं, जो इस व्रत को विशेष बनाते हैं। इस दिन का मुख्य उद्देश्य गौ माता की सेवा और पूजा करना होता है। सुबह स्नान के बाद व्रती महिलाएं भगवान का स्मरण करती हैं और व्रत का संकल्प लेती हैं। इस दिन गौ माता को स्नान कराना, उन्हें सजा-संवार कर पूजा करना अत्यंत शुभ माना जाता है। गाय को हरा चारा, गुड़, रोटी और अन्य खाद्य पदार्थ खिलाए जाते हैं। यह सेवा भाव और करुणा का प्रतीक है। पूजा के दौरान दीपक जलाना, धूप अर्पित करना और मंत्रों का जाप करना महत्वपूर्ण होता है। कई स्थानों पर महिलाएं मिलकर भजन-कीर्तन भी करती हैं, जिससे वातावरण भक्तिमय हो जाता है।

बहुला गाय की कथा सुनना और सुनाना इस दिन का एक प्रमुख हिस्सा है। यह कथा सत्य और वचनबद्धता का संदेश देती है, जिससे लोगों को नैतिक शिक्षा मिलती है। दान-पुण्य करना भी इस दिन का महत्वपूर्ण कार्य है। गरीबों को भोजन, वस्त्र या धन दान करना पुण्यदायी माना जाता है। इससे समाज में सहयोग और सहानुभूति की भावना बढ़ती है। इस दिन संयम और शुद्धता का पालन करना भी आवश्यक होता है। व्रती पूरे दिन सकारात्मक सोच बनाए रखते हैं और भगवान से अपने परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।

बहुला चतुर्थी व्रत के दिन किए जाने वाले शुभ कार्य

बहुला चतुर्थी के दिन कई शुभ कार्य किए जाते हैं, जो जीवन में सुख, शांति और समृद्धि लाने वाले माने जाते हैं। इस दिन सबसे महत्वपूर्ण कार्य गौ माता की पूजा और सेवा करना है। गाय को भोजन कराना और उनकी देखभाल करना अत्यंत पुण्यदायी माना जाता है। इस दिन भगवान श्रीकृष्ण का स्मरण और पूजा करना भी शुभ होता है। उनके जीवन से जुड़ी शिक्षाएं हमें धर्म और करुणा का मार्ग दिखाती हैं। पूजा के समय दीपक जलाना, मंत्रों का जाप करना और आरती करना विशेष फलदायी माना जाता है। घर में साफ-सफाई रखना और पूजा स्थल को सजाना भी इस दिन का शुभ कार्य है। इससे सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और वातावरण पवित्र बना रहता है।

बहुला चतुर्थी के दिन व्रत रखना और नियमों का पालन करना भी शुभ माना जाता है। व्रती महिलाएं पूरे दिन संयम रखती हैं और शाम को पूजा के बाद व्रत खोलती हैं। इस दिन जरूरतमंदों की सहायता करना, गरीबों को भोजन कराना और दान देना अत्यंत पुण्यदायी होता है। इससे समाज में प्रेम और सहयोग की भावना बढ़ती है। इसके अलावा, परिवार के साथ समय बिताना और धार्मिक चर्चा करना भी इस दिन का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इससे पारिवारिक संबंध मजबूत होते हैं और सभी में सकारात्मक सोच का विकास होता है

बहुला चतुर्थी व्रत का ज्योतिषीय महत्व

बहुला चतुर्थी का व्रत ज्योतिषीय दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। यह व्रत चतुर्थी तिथि को किया जाता है, जिसका संबंध चंद्रमा से होता है। चंद्रमा मन और भावनाओं का कारक माना जाता है, इसलिए इस दिन व्रत रखने से मानसिक शांति और संतुलन प्राप्त होता है। इस दिन भगवान श्रीकृष्ण और गौ माता की पूजा करने से ग्रह दोषों का निवारण होता है। विशेष रूप से चंद्र दोष और राहु-केतु के प्रभाव को कम करने में यह व्रत सहायक माना जाता है।

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, जो लोग मानसिक तनाव, पारिवारिक समस्याओं या आर्थिक कठिनाइयों से जूझ रहे हैं, उनके लिए यह व्रत लाभकारी होता है। इससे जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और बाधाएं दूर होती हैं। इस दिन व्रत रखने से कुंडली में शुभ ग्रहों की स्थिति मजबूत होती है। साथ ही, यह व्रत संतान सुख और परिवार की खुशहाली के लिए भी किया जाता है। पूजा के दौरान मंत्रों का जाप और ध्यान करने से मन शांत होता है और व्यक्ति आध्यात्मिक रूप से मजबूत बनता है। इस दिन किए गए दान-पुण्य से भी ग्रहों के अशुभ प्रभाव कम होते हैं। इस प्रकार, बहुला चतुर्थी का व्रत न केवल धार्मिक बल्कि ज्योतिषीय दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है, जो जीवन में संतुलन और सुख-समृद्धि लाने में सहायक होता है।

हिंदू धर्म में बहुला चतुर्थी व्रत का महत्व

हिंदू धर्म में बहुला चतुर्थी का विशेष स्थान है। यह व्रत गौ माता के प्रति श्रद्धा और सम्मान को दर्शाता है, जिन्हें हिंदू धर्म में अत्यंत पवित्र माना गया है। गाय को ‘माता’ का दर्जा दिया गया है और उसे समस्त देवताओं का निवास स्थान माना जाता है। यह व्रत हमें धर्म, करुणा और सेवा का संदेश देता है। बहुला गाय की कथा के माध्यम से यह सिखाया जाता है कि सत्य और वचनबद्धता जीवन के सबसे महत्वपूर्ण गुण हैं। भगवान श्रीकृष्ण का जीवन भी गौ सेवा से जुड़ा हुआ है, इसलिए इस व्रत में उनकी पूजा का विशेष महत्व होता है। यह व्रत भगवान की कृपा प्राप्त करने का एक माध्यम माना जाता है।

धार्मिक दृष्टि से यह व्रत पापों के नाश और पुण्य की प्राप्ति के लिए किया जाता है। इससे व्यक्ति के जीवन में सुख, शांति और समृद्धि आती है। यह व्रत समाज में नैतिक मूल्यों को बढ़ावा देता है और लोगों को अपनी संस्कृति और परंपराओं से जोड़ता है। आज के आधुनिक समय में भी यह व्रत अपनी प्रासंगिकता बनाए हुए है और लोगों को धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।

बहुला चतुर्थी व्रत का आध्यात्मिक महत्व

बहुला चतुर्थी व्रत का आध्यात्मिक महत्व अत्यंत गहरा और व्यापक है। यह व्रत केवल बाहरी पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आत्मा की शुद्धि और मन की एकाग्रता का माध्यम भी है। इस व्रत के माध्यम से व्यक्ति अपने अंदर करुणा, दया और प्रेम जैसे गुणों का विकास करता है। गौ माता की सेवा और पूजा से यह भावना उत्पन्न होती है कि सभी जीवों में ईश्वर का वास है। व्रत रखने से व्यक्ति अपने इंद्रियों पर नियंत्रण करना सीखता है। यह आत्म-संयम और अनुशासन का अभ्यास कराता है, जो आध्यात्मिक उन्नति के लिए आवश्यक है।

ध्यान, पूजा और मंत्र जाप से मन शांत होता है और व्यक्ति अपने भीतर की शक्ति को पहचानता है। इससे मानसिक तनाव कम होता है और जीवन में सकारात्मकता आती है। बहुला चतुर्थी का व्रत हमें सिखाता है कि सच्चा धर्म केवल पूजा नहीं, बल्कि सेवा और करुणा में भी निहित है। यह व्रत हमें आत्मिक रूप से मजबूत बनाता है और ईश्वर के करीब लाता है। इस प्रकार, यह व्रत व्यक्ति के जीवन में आध्यात्मिक जागरूकता और संतुलन लाने का एक महत्वपूर्ण साधन है।

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Published by Sri Mandir·June 22, 2026

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