
क्या आप जानना चाहते हैं कि 2026 में वरुथिनी एकादशी कब मनाई जाएगी और इसका क्या महत्व है? इस लेख में जानिए वरुथिनी एकादशी की तिथि, व्रत विधि, शुभ मुहूर्त और इस दिन किए जाने वाले धार्मिक कार्यों की पूरी जानकारी।
एकादशी का व्रत करने से भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है। जो लोग इस व्रत का पालन करते हैं, उनके जीवन में सुख-शांति और धन-समृद्धि बनी रहती है। साथ ही, जाने-अनजाने में हुए पापों का प्रभाव भी कम हो जाता है। विशेष रूप से वरुथिनी एकादशी को बहुत शुभ माना गया है। यह व्रत सौभाग्य बढ़ाने वाला और पापों को दूर करने वाला होता है, और इसे करने से मोक्ष प्राप्त होने का भी विश्वास है।
एकादशी तिथि की शुरुआत 13 अप्रैल 2026 को रात 1:16 बजे होगी और इसका समापन 14 अप्रैल 2026 को रात 1:08 बजे होगा।
सनातन धर्म में एकादशी तिथि को बहुत पवित्र और महत्वपूर्ण माना जाता है। यह व्रत हर महीने कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष की एकादशी को रखा जाता है। इस दिन सृष्टि के पालनकर्ता भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की विधि-विधान से पूजा करने का महत्व बताया गया है।
वरुथिनी एकादशी को अत्यंत शुभ और पुण्य देने वाली तिथि माना जाता है। इस दिन व्रत रखने और भगवान विष्णु की भक्ति करने से उनकी विशेष कृपा प्राप्त होती है। मान्यता है कि यह व्रत व्यक्ति के पापों को कम करता है और जीवन में सुख-शांति और समृद्धि लाता है।
इस व्रत के प्रभाव से व्यक्ति के अच्छे कर्म बढ़ते हैं और जीवन में सकारात्मक परिवर्तन देखने को मिलते हैं। इसे सौभाग्य प्रदान करने वाला व्रत भी कहा जाता है, जो मान-सम्मान और उन्नति दिलाने में सहायक होता है।
धार्मिक विश्वास के अनुसार, वरुथिनी एकादशी का पालन करने से मोक्ष प्राप्ति का मार्ग आसान होता है और व्यक्ति भगवान के करीब पहुंचता है। इसलिए इस दिन श्रद्धा और नियमपूर्वक व्रत रखना विशेष फलदायक माना गया है।
सनातन धर्म में दान को बहुत बड़ा पुण्य कर्म माना गया है। खासकर एकादशी के दिन किया गया दान बहुत फलदायी होता है और लंबे समय तक शुभ परिणाम देता है। वरुथिनी एकादशी पर दान करने से व्यक्ति को इस जीवन के पापों से राहत मिलती है और आने वाले जन्मों में भी अच्छे फल प्राप्त होते हैं। धर्म ग्रंथों में भी दान के महत्व को विस्तार से समझाया गया है।
मनुस्मृति में कहा गया है, सतयुग में तप, त्रेता में ज्ञान, द्वापर में यज्ञ और कलियुग में दान को सबसे श्रेष्ठ माना गया है।
एकादशी के दिन किया गया दान बहुत पुण्य देने वाला माना जाता है, जो लंबे समय तक किए गए तप के बराबर फल देता है। यह हमारे अंदर दया, करुणा और सहानुभूति जैसे अच्छे गुणों को बढ़ाता है और समाज में प्रेम और संतुलन बनाए रखने में भी मदद करता है।
पौराणिक कथा के अनुसार, एक समय मान्धाता नाम के राजा पर एक जंगली भालू ने हमला कर दिया और उनका पैर घायल हो गया। इससे राजा बहुत भयभीत हो गए। तब उन्होंने अपनी रक्षा के लिए भगवान विष्णु से प्रार्थना की। भगवान ने उन्हें वरुथिनी एकादशी का व्रत करने की सलाह दी। राजा ने पूरे नियम और श्रद्धा के साथ यह व्रत रखा। इस व्रत के प्रभाव से उन्हें शुभ फल मिला और उनका शरीर फिर से स्वस्थ और सुंदर हो गया। इसी घटना से वरुथिनी एकादशी व्रत की शुरुआत मानी जाती है।
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