
क्या आप जानना चाहते हैं कि गणगौर पूजा 2026 में कब मनाई जाएगी और इसका धार्मिक महत्व क्या है? इस लेख में जानिए गणगौर पूजा की सही तिथि, माता गौरी और भगवान शिव की आराधना का महत्व तथा इस पर्व से जुड़ी महत्वपूर्ण परंपराओं के बारे में।
गणगौर राजस्थान सहित उत्तर भारत के कई हिस्सों में मनाया जाने वाला लोकआस्था से जुड़ा हुआ पर्व है। यह व्रत विशेष रूप से स्त्रियों और कुंवारी कन्याओं द्वारा किया जाता है। इस दिन भगवान शिव और माता गौरी की पूजा की जाती है। मान्यता है गणगौर का अनुष्ठान करने से सुहागिन स्त्रियों को अखंड सौभाग्य और कुंवारी कन्याओं को मनचाहे वर की प्राप्ति होती है।
साल 2026 में गणगौर का मुख्य पर्व चैत्र शुक्ल तृतीया को मनाया जाएगा। हिंदू पंचांग के अनुसार यह तिथि मार्च–अप्रैल के बीच पड़ती है।
आपको बता दें कि ये पर्व 16 दिनों तक चलता है। अंतिम दिन विशेष रूप से माता गौरी और भगवान शिव की प्रतिमाओं का पूजन, श्रृंगार और शोभायात्रा निकाली जाती है। राजस्थान के जयपुर, उदयपुर और जोधपुर जैसे शहरों में यह उत्सव अत्यंत भव्य रूप से आयोजित होता है।
गणगौर पूजा का धार्मिक और सामाजिक दोनों ही दृष्टिकोण से विशेष महत्व है। यह पर्व मुख्य रूप से माता पार्वती की तपस्या, समर्पण और अखंड सौभाग्य का प्रतीक है। मान्यता है कि माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए कठोर तप किया था। उसी तप और समर्पण की स्मृति में यह पर्व मनाया जाता है।
विवाहित स्त्रियां इस दिन अपने पति की लंबी आयु, सुख-समृद्धि और दांपत्य जीवन की खुशहाली के लिए व्रत रखती हैं। वहीं अविवाहित कन्याएं अच्छे और योग्य वर की प्राप्ति के लिए माता गौरी से प्रार्थना करती हैं। विशेषकर राजस्थान में यह त्योहार सामाजिक एकता और सांस्कृतिक विरासत का जीवंत उदाहरण बन जाता है।
गणगौर होली के अगले दिन, यानी चैत्र कृष्ण प्रतिपदा से शुरू होता है और पूरे 16 दिनों तक चलता है।
पहले दिन शुद्ध मिट्टी से भगवान शिव (ईसर) और माता पार्वती (गौर) की प्रतिमा बनाएं। यदि स्वयं बनाना संभव न हो तो तैयार प्रतिमा खरीदकर एक साफ चौकी पर लाल या पीला वस्त्र बिछाकर स्थापित करें। प्रतिमाएं पूरे 16 दिन तक वहीं विराजमान रहेंगी।
पहले दिन से 15 तक प्रतिदिन सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। विवाहित महिलाएं यथासंभव श्रृंगार करें। इसके बाद तांबे या मिट्टी के लोटे में ताजा जल भरें, उसमें हरी दूब और फूल रखें और गणगौर के गीत गाते हुए घर लाएं।
प्रतिदिन ईसर-गौर के सामने दीप जलाएं और चंदन, अक्षत, धूप, दूब और पुष्प अर्पित करें। माता गौर को चूड़ी, बिंदी, मेहंदी, सिंदूर आदि सुहाग की वस्तुएं अर्पित करें और परिवार के सुख, शांति व अखंड सौभाग्य की प्रार्थना करें।
इन 15 दिनों में कई स्थानों पर दीवार पर रोली, मेहंदी या काजल से प्रतिदिन बिंदियां लगाई जाती हैं। यह सोलह श्रृंगार और सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है।
सोलहवें दिन, यानी चैत्र शुक्ल तृतीया को मुख्य गणगौर पूजन किया जाता है। इस दिन विशेष रूप से सोलह श्रृंगार करके विस्तृत विधि से पूजा करें और माता को संपूर्ण सुहाग सामग्री अर्पित करें।
मुख्य दिन एक बड़ी थाली में चांदी का छल्ला और सुपारी रखें। उसमें जल, दूध, दही, हल्दी और कुमकुम मिलाकर सुहाग जल तैयार करें। यह जल सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है।
दोनों हाथों में दूब लेकर पहले इस सुहाग जल के छींटे गणगौर माता पर दें, फिर अपने ऊपर छिड़कें। इससे पति की दीर्घायु और सुखी दांपत्य जीवन की प्राप्ति होती है।
इसके बाद मीठे गुने, चूरमा या अन्य पारंपरिक मिष्ठान का भोग लगाएं। फिर श्रद्धा से गणगौर माता की कथा सुनें या पढ़ें, और कथा के बाद आरती करें।
शाम के शुभ मुहूर्त में पास के किसी पवित्र सरोवर, नदी या कुंड में प्रतिमाओं का विधिपूर्वक विसर्जन करें।
परंपरा के अनुसार गणगौर पर चढ़ाया गया प्रसाद पुरुषों को नहीं दिया जाता। माता पार्वती को अर्पित सिंदूर महिलाएं अपनी मांग में लगाती हैं, जो अखंड सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है।
बहुत समय पहले की बात है। एक दिन भगवान शिव, माता पार्वती और देवर्षि नारद जी पृथ्वी पर भ्रमण करने निकले। वह दिन चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि का था। तीनों देवता घूमते-घूमते एक छोटे से गांव में पहुँचे। जैसे ही गांव वालों को यह समाचार मिला कि स्वयं भोलेनाथ और माता गौरी उनके गांव पधारे हैं, पूरा गांव आनंद से भर गया। हर कोई अपने सामर्थ्य के अनुसार उनका स्वागत करना चाहता था।
सबसे पहले गांव की गरीब महिलाएं आईं। उनके पास न सोना था, न चांदी, न बड़े पकवान। वे एक छोटी सी थाली में हल्दी और अक्षत लेकर, सच्चे मन और श्रद्धा के साथ माता पार्वती के सामने उपस्थित हुईं। उनकी आँखों में भक्ति थी, और हृदय में विश्वास। माता पार्वती उनकी सरलता देखकर बहुत प्रसन्न हुईं। उन्होंने अपने करुणामय हृदय से उन पर अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद बरसाया। उन्हें वरदान दिया कि उनका सुहाग सदा सुरक्षित और अटल रहेगा।
कुछ समय बाद गांव की धनवान स्त्रियाँ आईं। वे सोलह श्रृंगार करके, सोने-चांदी की थालियों में तरह-तरह के व्यंजन और उपहार लेकर आईं। उनका स्वागत भी भव्य था। उन्हें देखकर भगवान शिव मुस्कुराए और माता पार्वती से बोले, “देवि, आपने तो सारा सुहाग-आशीर्वाद पहले ही उन गरीब स्त्रियों को दे दिया। अब इनको क्या देंगी?”
माता पार्वती ने शांत स्वर में उत्तर दिया, “स्वामी, मैंने उन्हें उनकी श्रद्धा के अनुसार आशीर्वाद दिया है। अब मैं इन स्त्रियों को अपने सतीत्व और समर्पण का वरदान दूँगी।” ऐसा कहकर माता ने प्रतीक रूप में अपनी उंगली चीरकर कुछ बूंदें छिड़कीं और आशीर्वाद दिया “जो स्त्री बाहरी आडंबर छोड़कर, सच्चे मन से अपने पति की सेवा करेगी, उसे अखंड सौभाग्य अवश्य प्राप्त होगा।”
इसके बाद माता पार्वती ने भगवान शिव से आज्ञा ली और पास की नदी में स्नान करने चली गईं। स्नान के बाद उन्होंने नदी किनारे की बालू से भगवान शिव की एक सुंदर प्रतिमा बनाई। उन्होंने पूरी श्रद्धा से पूजा की, भोग लगाया, प्रदक्षिणा की और दो कण प्रसाद के रूप में ग्रहण किए। फिर अपने मस्तक पर तिलक लगाया। इस पूजा में उन्हें काफी समय लग गया।
जब वे वापस लौटीं तो भगवान शिव ने मुस्कुराकर पूछा, “देवि, आज इतनी देर कैसे हो गई?”
पार्वतीजी ने संकोच में कहा, “वहाँ मुझे मेरे भाई और भावज मिल गए थे, उनसे बात करते-करते देर हो गई।”
भोलेनाथ तो अंतर्यामी थे। वे सब जान रहे थे। उन्होंने फिर पूछा, “अच्छा, तो वहाँ आपने क्या भोजन किया?”
पार्वतीजी ने सहज भाव से कहा, “मुझे मेरे भाई भावज ने दूध-भात खिलाया”।
यह सुनकर भगवान शिव बोले, “तो हम भी वही दूध-भात ग्रहण करेंगे।” और वे नदी की ओर चल पड़े। अब पार्वतीजी मन ही मन घबरा गईं। उन्होंने भीतर ही भीतर भगवान शिव का स्मरण किया और प्रार्थना की “हे प्रभु! यदि मैं आपकी सच्ची भक्त हूँ, तो आज मेरी लाज रखिए।”
इधर, जैसे ही वे नदी तट पर पहुँचे, वहाँ एक अद्भुत महल दिखाई दिया। उस महल में पार्वतीजी के भाई और परिवार के लोग उपस्थित थे। उन्होंने बड़े प्रेम से शिव-पार्वती का स्वागत किया। दोनों वहाँ दो दिन तक रहे।
तीसरे दिन पार्वतीजी ने कहा, “स्वामी, अब चलें।” लेकिन शिवजी का मन अभी और रुकने का था। तब पार्वतीजी थोड़ी रूठकर अकेली ही चल पड़ीं। उन्हें जाता देख भोलेनाथ को भी उनके पीछे चलना पड़ा। नारदजी भी साथ थे।
कुछ दूर जाने पर शिवजी को ध्यान आया कि वे अपनी माला वहीं भूल गए हैं। पार्वतीजी ने कहा, “मैं ले आती हूँ।” परंतु शिवजी ने नारदजी को भेज दिया।
नारदजी जब वहाँ पहुँचे तो आश्चर्यचकित रह गए। वहाँ कोई महल नहीं था। केवल नदी तट और पेड़ दिखाई दे रहे थे। तभी एक पेड़ पर शिवजी की माला टंगी हुई मिली। वे माला लेकर वापस लौट आए और सारी बात बताई।
भगवान शिव मुस्कुराए और बोले, “नारद, यह सब पार्वती की पतिव्रता शक्ति की लीला है।”
नारदजी ने माता पार्वती को प्रणाम किया और कहा, “माता! आप पतिव्रताओं में श्रेष्ठ हैं। आपके नाम का स्मरण करने मात्र से स्त्रियों को अखंड सौभाग्य की प्राप्ति होगी। जो स्त्री सच्चे मन से अपने पति की मंगल कामना करेगी, उसे महादेव की कृपा से दीर्घायु और सुखी दांपत्य जीवन मिलेगा।”
Did you like this article?

विनायक चतुर्थी 2026 में कब है जानिए यहां। इस लेख में पढ़ें विनायक चतुर्थी की तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि, व्रत नियम और भगवान गणेश की आराधना से जुड़े महत्व की विस्तृत जानकारी।

स्वायंभुव मन्वादि 2026 में कब है? जानिए इसकी तिथि, हिंदू धर्म में मन्वादि का महत्व, धार्मिक मान्यताएँ और इस दिन किए जाने वाले शुभ कार्यों के बारे में।

मत्स्य जयंती 2026 में कब है? जानिए इसकी तिथि, भगवान विष्णु के मत्स्य अवतार का महत्व, पूजा विधि और इस पावन दिन से जुड़ी धार्मिक मान्यताएँ।