पितृ पक्ष में भोजन दान का विशेष महत्व है। जानें कौन-से अनाज, फल, मिठाई और व्यंजन दान करने चाहिए ताकि पितरों की कृपा प्राप्त हो।
पितृ पक्ष, जिसे पूर्वजों की स्मृति, श्रद्धा और उनके आशीर्वाद को समर्पित माना जाता है। यह 15–16 दिनों की अवधि हर वर्ष भाद्रपद पूर्णिमा से लेकर आश्विन अमावस्या तक आती है। धार्मिक मान्यता है कि इस समय हमारे पितर धरती लोक पर आते हैं और अपने वंशजों के तर्पण, श्राद्ध और पिंडदान से प्रसन्न होकर उन्हें आशीर्वाद देते हैं। विशेष रूप से, भोजन दान को इस अवधि में सर्वोच्च महत्व दिया गया है। आगे इस लेख में हम विस्तार से जानेंगे कि पितृ पक्ष में भोजन दान का धार्मिक महत्व क्या है और क्यों इसे पूर्वजों को तृप्त करने का सबसे सरल और प्रभावी मार्ग माना गया है।
हिंदू परंपरा में अन्नदान को सबसे पवित्र और निस्वार्थ कर्मों में गिना गया है। माना जाता है कि पितृ पक्ष के दौरान हमारे पूर्वजों की आत्माएँ धरती पर आती हैं और शांति व मोक्ष की कामना करती हैं। ऐसे समय में, भोजन दान केवल सामाजिक सेवा नहीं, बल्कि एक गहरा आध्यात्मिक कर्म है। पूर्वजों के नाम पर अन्नदान करने से उनकी आत्माओं को तृप्ति मिलती है और उन्हें उच्च लोक की ओर अग्रसर होने में सहायता मिलती है।
यह कर्म न केवल पितरों की आत्मा के लिए लाभकारी होता है, बल्कि दान करने वाले के जीवन में भी सुख, समृद्धि और सफलता का मार्ग खोलता है। शास्त्रों में कहा गया है कि शुद्ध हृदय से किया गया अन्नदान ईश्वर की असीम कृपा प्राप्त कराने वाला होता है और इससे आत्मा शुद्ध होती है तथा जीवन में संतोष और आनंद की अनुभूति होती है।
पितृ पक्ष के दिनों में अन्नदान की परंपरा सदियों से चली आ रही है। इस दौरान जरूरतमंदों, ब्राह्मणों और अतिथियों को भोजन कराना, पितरों की आत्माओं को तृप्त करने का सबसे सरल और श्रेष्ठ उपाय माना गया है। ऐसा विश्वास है कि पितरों के नाम पर दिया गया यह अन्नदान सीधे उनकी आत्मा तक पहुँचता है और उन्हें शांति व मोक्ष की प्राप्ति होती है।
साथ ही, अन्नदान का फल केवल पितरों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वंशजों को भी इसका प्रत्यक्ष लाभ मिलता है। यह परंपरा हमें यह भी सिखाती है कि दूसरों की भूख मिटाना ही सच्ची सेवा है, और यह कार्य देने वाले और पाने वाले—दोनों के लिए संतोष और पुण्य का कारण बनता है।
हिंदू धर्म में पितृ पक्ष का अत्यंत महत्व है। इस अवधि में किए गए दान और भोजन अर्पण से पितरों की आत्मा को शांति और तृप्ति मिलती है। शास्त्रों में बताया गया है कि पितृ पक्ष में कुछ विशेष खाद्य पदार्थों का दान करना न केवल पितरों को प्रसन्न करता है, बल्कि घर-परिवार में सुख, शांति और समृद्धि भी लाता है। आइए जानते हैं कि इस समय कौन-से भोजन और वस्तुएँ दान करना शुभ माना गया है.......
अनाज - गेहूं और चावल को पितृ पक्ष में सर्वोत्तम दान माना गया है। उड़द की दाल सहित अन्य दालें भी दान की जा सकती हैं। मान्यता है कि अनाज दान करने से जीवन की बाधाएँ समाप्त होती हैं और परिवार में उन्नति का मार्ग खुलता है।
नमक - नमक भोजन का मुख्य अंग है और इसका दान पितरों को तृप्त करता है। इसे देने से जीवन में संतुलन और स्थिरता बनी रहती है।
घी और गुड़ - पवित्र गाय का घी और गुड़ का दान पितरों को संतुष्ट करता है। धार्मिक मान्यता है कि घी का दान करने से घर में धन-संपत्ति बढ़ती है और पूर्वजों का आशीर्वाद मिलता है। गुड़ का दान गृह-क्लेश दूर करता है और आत्माओं को शांति प्रदान करता है।
काले तिल - काले तिल का दान पितृ पक्ष में अत्यंत मंगलकारी माना गया है। इससे जीवन के कष्ट, संकट और दुख दूर होते हैं।
गाय और गौ-सेवा - सनातन परंपरा में गाय का दान सर्वोत्तम बताया गया है। पितृ पक्ष में गाय का दान करने से अचल संपत्ति की प्राप्ति होती है और जीवन में धन की कमी नहीं रहती।
वस्त्र - ब्राह्मणों और जरूरतमंदों को नए वस्त्र अर्पित करना अत्यंत शुभ है। विशेषकर धोती और गमछा दान करने से पुण्य प्राप्त होता है।
जूते-चप्पल और छाता - पितृ दोष से मुक्ति के लिए जूते-चप्पल और छाता का दान करना शुभ माना गया है। इससे कुंडली के दोष दूर होते हैं और घर में सुख-शांति आती है।
जीवों को भोजन कराना - पितृ पक्ष में केवल दान ही नहीं, बल्कि जीवों को भोजन कराना भी महत्वपूर्ण है। कौवों, गायों और चींटियों को भोजन अर्पित करना पितरों को प्रसन्न करता है और आत्माओं को शांति प्रदान करता है।
यह स्पष्ट है कि पितृ पक्ष में अन्न और आवश्यक वस्तुओं का दान केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि हमारे पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का श्रेष्ठ माध्यम है। श्रद्धा से किया गया भोजन दान पितरों को तृप्त कर उनके आशीर्वाद की प्राप्ति कराता है और घर-परिवार में सुख, शांति व समृद्धि का मार्ग प्रशस्त करता है।
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