
त्रिशूर पूरम 2025 कब है? जानिए इस भव्य त्योहार की तारीख, सांस्कृतिक महत्त्व और इसकी प्रमुख झांकियों के बारे में
त्रिशूर पूरम केरल राज्य के त्रिशूर ज़िले में मनाया जाने वाला एक भव्य और पारंपरिक हिंदू उत्सव है। यह उत्सव हर साल मलयालम महीने मेढम (अप्रैल–मई) में आता है और वडक्कुन्नाथन मंदिर में मुख्य रूप से आयोजित होता है। इस लेख के माध्यम से आइये जानते हैं इसके बारे में...
केरल का सबसे बड़ा उत्सव त्रिशूर पूरम हर साल त्रिशूर शहर के वडक्कुनाथन मंदिर में मनाया जाता है। इस पर्व का आयोजन केरल के उत्तरी जनपद त्रिशूर में किया जाता है। आपको बता दें कि पूरम शब्द का शाब्दिक अर्थ है समूह या मिलन।
त्रिशूर पूरम, सभी पूरमों में सबसे प्रमुख और प्रसिद्ध, मेदम माह में पूरम के दिन मनाया जाता है।
त्रिशूर पूरम लगभग 200 वर्ष पूर्व से मनाया जा रहा है। इसका प्रारंभ कोच्चि के महाराजा सकथन थंपुरन द्वारा किया गया था, उन्होंने इस उत्सव के आयोजन में पहली बार 10 मंदिरों को आमंत्रित किया, जो थे परमेक्कावु, तिरुवंबाडी, कनिमंगलम, करमुक्कू, लालूर, चूराकोट्टुकरा, पानामुक्कमपल्ली, अय्यनथोल, चेम्बुक्कावु और नेथिलकावु। इस पर्व की परंपरा शुरू होने से पहले, प्रति वर्ष अरट्टुपुझा पूरम नामक एकदिवसीय उत्सव मनाया जाता था, जिसमें त्रिशूर के समीप स्थित सभी मंदिर भाग लेते थे। परंतु सन् 1798 में, त्रिशूर के मंदिरों को इस उत्सव में भाग लेने से रोक दिया गया। कारण यह था कि वे निरंतर बारिश होने के कारण उत्सव में विलंब से आए थे, जिसके पश्चात् मंदिर के अधिकारियों ने इस मामले को सकथन थंपुरन के सामने रखा, जिन्होंने त्रिशूर पूरम नामक उत्सव मनाए जाने की परंपरा प्रारंभ की।
इस उत्सव की परंपरा ये है कि इस दिन हर साल आस-पास के मंदिरों में रहने वाले देवी-देवता शंकर जी को समर्पित प्रसिद्ध वडक्कुमनाथ मंदिर में उत्सव के लिए आते हैं। उनके इस आगमन का नेतृत्व देवी भगवती व भगवान कृष्ण करते हैं, जो वडक्कुमनाथ मंदिर के समीप स्थित परमेक्कावु व थिरुवंबादी मंदिरों के प्रमुख देवता हैं। इस पर्व का मुख्य आकर्षण भव्य जुलूस होता है, जिसमें 50 से अधिक हाथी शामिल होते हैं, जो सोने के आभूषणों से सजे होते हैं।
पूरम पर्व का प्रारंभ एक सप्ताह पूर्व ध्वजा फहराकर किया जाता है, और इस उत्सव में भाग लेने वाले मंदिर विशेष आतिशबाजी करके इस पर्व के शुभारंभ की घोषणा करते हैं। इस त्यौहार से जुड़ी एक अन्य परंपरा भी प्रचलित है, जिसे पुरा विलांभरम कहा जाता है, जिसमें त्रिशूर पूरम मनाए जाने वाले स्थान, यानि वडक्कुनाथन मंदिर के दक्षिण प्रवेश द्वार को एक हाथी धक्का देता है, जिसके ऊपर 'नीथिलक्कविलम्मा' की मूर्ति होती है।
ध्वजा फहराने के चार दिन पश्चात्, नमूना वेदिकेट्टू का आयोजन होता है, जो तिरुवंबडी और परमेक्कावु देवस्वोम्स द्वारा प्रस्तुत किया जाने वाला एक विशेष आतिशबाजी कार्यक्रम है। पूरम का प्रारंभ प्रातःकाल में होता है, एवं इस त्योहार का मुख्य आकर्षण मदथिल वरवु होता है, जोकि एक पंचवाद्यम मेलम है। इसमें 200 से अधिक कलाकार भाग लेकर अपनी मनमोहक प्रस्तुति देते हैं।
त्रिशूर पूरम उत्सव की मुख्य आतिशबाजी सातवें दिन आयोजित की जाती है, जिसे पकल वेदिकेट्टू नाम से जाना जाता है। इसे देखने के लिए लोग बड़ी संख्या में दूर-दूर से एकत्रित होते हैं। इसी आतिशबाजी के साथ इस पर्व का समापन होता है।
भक्तों, ये थी त्रिशूर पूरम की सम्पूर्ण जानकारी। ऐसे ही व्रत, त्यौहार व अन्य धार्मिक जानकारियों के लिए जुड़े रहिए 'श्री मंदिर' पर।
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