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मीरा बाई जयंती

यह दिन भक्ति और आध्यात्मिक प्रेम का प्रतीक है।

मीराबाई जयन्ती के बारे में

मीरा बाई - भक्ति की अनोखी दास्तां मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरा न कोई। जाके सिर मोर मुकुट, मेरो पति सोई। भक्ति के सागर में डूबी हुई ये पंक्तियां श्री कृष्ण की एक ऐसी भक्त ने लिखी थीं, जिन्होंने प्रभु भक्ति में लीन होकर, अपना जीवन श्री कृष्ण के चरणों में समर्पित कर दिया। जी हां, हम बात कर रहे हैं श्री कृष्ण की अनन्य भक्त मीरा बाई की, जिनकी जन्म जयंती को आज भारत के कोने-कोने में मनाया जा रहा है। वैसे तो उन्हें किसी परिचय की जरूरत नहीं है, लेकिन फिर भी यहां हम उनके जीवन के कुछ अनछुए पहलुओं को प्रस्तुत कर रहे हैं।

मीरा बाई जयंती 2025

मीरा बाई (1498-1547) एक अनुपम हिन्दु कवि और भगवान श्री कृष्ण की प्रेमशील ओजस्वी भक्त थीं। मीरा बाई को वैष्णव भक्ति आन्दोलन के श्रेष्ठतम सन्तों की श्रेणी में सम्मिलित किया जाता है। भगवान श्री कृष्ण की भावपूर्ण स्तुति में लिखी गयी लगभग 1300 कविताओं का श्रेय उन्हें प्राप्त है।

मीराबाई का जन्म कब और कहाँ हुआ था?

मीराबाई का जन्म 1498 के लगभग राजस्थान के कुड़की गांव के मारवाड़ रियासत के जिलान्तर्गत मेड़ता में हुआ था। मीराबाई मेड़ता महाराज के छोटे भाई रतन सिंह की एकमात्र संतान थीं।

साल 2025 में मीराबाई जयंती कब है?

  • मीराबाई की यह लगभग 527वाँ जन्म वर्षगाँठ है।
  • मीराबाई जयन्ती 07 अक्टूबर 2025, मंगलवार को मनाई जाएगी।
  • पूर्णिमा तिथि प्रारम्भ - 06 अक्टूबर 2025 को 12:23 पी एम बजे से
  • पूर्णिमा तिथि समाप्त - 07 अक्टूबर 2025 को 09:16 ए एम बजे पर होगा।

इस दिन के शुभ मुहूर्त

  • ब्रह्म मुहूर्त - 04:15 ए एम से 05:04 ए एम
  • प्रातः सन्ध्या - 04:39 ए एम से 05:53 ए एम
  • अभिजित मुहूर्त - 11:22 ए एम से 12:09 पी एम
  • विजय मुहूर्त - 01:43 पी एम से 02:30 पी एम
  • गोधूलि मुहूर्त - 05:39 पी एम से 06:03 पी एम
  • सायाह्न सन्ध्या - 05:39 पी एम से 06:52 पी एम
  • अमृत काल - 11:19 पी एम से 12:45 ए एम, अक्टूबर 08
  • निशिता मुहूर्त - 11:21 पी एम से 12:10 ए एम, अक्टूबर 08

विशेष योग

  • सर्वार्थ सिद्धि योग - 01:28 ए एम, अक्टूबर 08 से 05:53 ए एम, अक्टूबर 08
  • अमृत सिद्धि योग - 01:28 ए एम, अक्टूबर 08 से 05:53 ए एम, अक्टूबर 08

क्यों मनाई जाती है मीराबाई जयंती?

श्री कृष्ण की परम भक्त मीरा बाई को कुछ लोग संत मीरा के नाम से भी पूजते हैं। श्री कृष्ण को पूजते-पूजते वह स्वयं पूजनीय बन गईं। उन्होंने अपने जीवन में भक्ति की ऐसी मिसाल प्रस्तुत की थी जिससे आज भी लोग प्रेरणा लेते हैं। मीराबाई श्रीकृष्ण की अनन्य उपासिका होने के कारण, उन्होंने अपना सर्वस्व अपने आराध्य पर न्योछावर कर दिया था। वह तो पूरे समय केवल श्रीकृष्ण का ही ध्यान करती थीं। इतनी ही नहीं मीरा बाई ने श्रीकृष्ण की मनोहर मूर्ति को अपने हृदय में बसा लिया था। उनके भक्ति मार्ग और अपने आराध्य के प्रति समर्पण के कारण ही आज उनकी जयंती को धूमधाम से मनाया जाता है।

मीराबाई के जीवन की महत्वपूर्ण बातें

श्री कृष्ण की भक्ति करते हुए मीरा बाई का जीवन आसान नहीं था। जहां एक ओर उन्होंने श्री कृष्ण को अपना पति मान लिया था, वहीं दूसरी तरफ घर वालों ने उनका विवाह मेवाड़ के राजकुमार से कर दिया गया था। वो बाह्य जगत की नजरों से तो मेवाड़ के राजकुमार की पत्नी थीं, लेकिन उन्होंने अपना मन और आत्मा श्री कृष्ण को अर्पित कर दिया था। चलिए अब उनके जीवन से जुड़ी हुई ऐसी ही महत्वपूर्ण घटनाओं के बारे में जानते हैं-

श्री कृष्ण को माना अपना पति- बचपन में जब किसी की बारात देखने घर की सारी स्त्रियां छत पर गई थीं, तब मीराबाई ने मां से पूछा था कि मेरा दूल्हा कौन है? उनकी मां ने कृष्ण की मूर्ति की तरफ इशारा किया और बोला कि वह है तुम्हारा दूल्हा और तब से ही उन्होंने श्रीकृष्ण को ही अपना पति मान लिया।

ज़हर का असर भी नहीं हुआ- माना जाता है कि वो घंटों तक,संसार को भूलकर मंदिर में कृष्ण की मूर्ति के सामने भक्तिभाव से नाचती रहती थीं। यह बात उनके ससुराल वालों को कदापि स्वीकार्य नहीं थी, और इसलिए उन लोगों ने कई बार मीरा बाई जी को विष देकर मारने की कोशिश की और कई बार तो सांप से कटवाने की कोशिश भी की, लेकिन श्री कृष्ण की अनुकंपा के कारण उन पर किसी भी साजिश का कोई असर नहीं हुआ।

राम भक्ति के लिए भी प्रसिद्ध थीं मीरा बाई- मीरा बाई को जब परिवार एवं ससुराल वालों के द्वारा कृष्ण भक्ति करने को मना किया गया, तो उन्होंने तुलसीदास जी से इस समस्या का उपाय मांगा। तब तुलसीदास जी ने उन्हें राम भक्ति करने को कहा और उन्होंने राम को लेकर भजन लिखना शुरू किया इनमें से बहुत ही चर्चित माना जाता है, ‘पायो जी मैंने राम रतन’।

मीराबाई की मृत्यु

मीराबाई की मृत्यु को लेकर इतिहासकारों के बीच कई मतभेद हैं। प्रचलित कथा के अनुसार कृष्ण जन्माष्टमी के दिन मीराबाई घंटों तक कृष्ण मंदिर में नाचती-गाती रहती थीं। ऐसी ही एक जन्माष्टमी में नाचते-नाचते वो जमीन पर गिर गईं और मंदिर के द्वार अपने आप बंद हो गए। जब कुछ क्षण बाद द्वार खुले तो मीरा बाई स्वयं तो वहां नहीं थीं, लेकिन उनकी साड़ी श्रीकृष्ण की मूर्ति से लिपटी हुई थी। ऐसा माना जाता है कि मीराबाई कृष्ण में विलीन हो गई थीं।

मीराबाई ने कितने भक्ति कविताओं की रचना की?

मीराबाई की भक्ति काव्य रचना संसार लौकिक और पारलौकिक दोनों ही दृष्टियों से श्रेष्ठ और रोचक हैं, मीराबाई की काव्य रचना सूत्र तो लौकिक प्रतीकों और रूपकों से बुना हुआ है। लेकिन उसका उद्देश्य पारलौकिक चिन्तनधारा के अनुकूल है, इसलिए वह दोनों ही दृष्टियों से अपनाने योग्य हैं। वह इसलिए रुचिपूर्ण है और हृदयस्पर्शी भी। उनकी कुछ प्रमुख रचनाओं के नाम इस प्रकार हैं:

  • राग गोविंद
  • गीत गोविंद
  • नरसी जी का मायरा
  • मीरा पद्मावली
  • राग सोरठा
  • गोविंद टीका

मीराबाई से हमें क्या सीख मिलती है?

वैसे तो मीरा बाई के जीवन में घटित होने वाली प्रत्येक घटनाएं हमें कुछ न कुछ सीख देती हैं, लेकिन उनके पूरे जीवन से हमें सबसे प्रमुख यही सीख मिलती है कि यदि आपने किसी को अपना ईश्वर माना है तो उसके प्रति अपना सब कुछ समर्पित कर देना चाहिए और बदले में उससे किसी भी चीज की कामना नहीं करना चाहिए।

इस प्रकार मीराबाई का प्रभाव अत्यंत अद्भुत और अद्वितीय था, जिसका अनुसरण आज भी किया जाता है। उनके लिखे काव्य श्री कृष्ण की सभी लीलाओं की व्याख्या करते हैं। हमें भी उन्हें अपना आदर्श मानना चाहिए और प्रभु की भक्ति में रम जाना चाहिए।

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Published by Sri Mandir·October 8, 2025

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