
मकर संक्रांति 2025 कब है? जानिए इसका सही समय, महत्व और कैसे मनाएं यह पर्व पूरे धूमधाम से!
मकर संक्रांति एक महत्वपूर्ण भारतीय पर्व है, जो सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करने और उत्तरायण होने का प्रतीक है। यह हर साल 14 या 15 जनवरी को मनाया जाता है। इस दिन से दिन बड़े और रातें छोटी होने लगती हैं, और इसे ऋतु परिवर्तन का शुभ समय माना जाता है। मकर संक्रांति के अवसर पर गंगा, यमुना और अन्य पवित्र नदियों में स्नान कर पुण्य अर्जित किया जाता है। तिल-गुड़, खिचड़ी और अन्य पारंपरिक पकवान बनाए जाते हैं। पतंग उड़ाने की परंपरा भी इस त्योहार का एक खास हिस्सा है।
हिंदू धर्म में सबसे महत्वपूर्ण संक्रान्ति मानी जाने वाली मकर संक्रांति आने वाली है। कहा जाता है कि यह जीवन में स्थिरता लाती है। मकर संक्रांति को शुभ कार्यों के लिए अच्छा माना जाता है। इस दिन कई गतिविधियाँ जैसे कि स्नान करना, भगवान सूर्य को नैवेद्य अर्पित करना, दान-दक्षिणा देना, श्राद्ध-तर्पण करना पुण्य काल के दौरान करने की सलाह दी जाती है।
यदि मकर संक्रांति सूर्यास्त के बाद प्रारंभ होती है तो पुण्य काल की सभी गतिविधियाँ अगले दिन सूर्योदय तक के लिए स्थगित कर दी जाती हैं। इसलिए पुण्य काल के सभी कार्य दिन के समय ही करने चाहिए।
चाहे बच्चें हो, नौजवान या बुजुर्ग, सभी वर्गों के लोग मकर संक्रान्ति का इंतजार बेहद उत्सुकता से करते हैं। मकर संक्रान्ति महोत्सव पर विशेष रूप से हम आपके लिए लेकर आए हैं आस्था, मस्ती और मनोरंजन से ओतप्रोत इस सुंदर त्यौहार से जुड़ी बेहद खास जानकारी।
वैदिक ज्योतिष के अनुसार पौष मास में जब सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है तो उस दिन को मकर संक्रान्ति के रूप में मनाया जाता है। वर्तमान शताब्दी में यह त्योहार जनवरी माह के चौदहवें या पन्द्रहवें दिन ही पड़ता है, इस दिन सूर्य धनु राशि को छोड़ मकर राशि में प्रवेश करता है। हालाँकि हिंदू कैलेण्डर में बारह संक्रान्तियाँ होती हैं परन्तु मकर संक्रान्ति अपने धार्मिक महत्व के कारण सभी संक्रान्तियों में सर्वाधिक विशेष है। मकर संक्रान्ति की लोकप्रियता के कारण ही, ज्यादातर लोग इसे केवल संक्रान्ति ही कहते हैं। मकर संक्रान्ति का दिन विशेष रूप से भगवान सूर्य को समर्पित होता है। इस दिन सूर्य देव की पूजा-अर्चना, स्नान एवं दान का विधान है।
सनातन धर्म में सूर्य को देवता माना जाता है जो पृथ्वी पर सभी जीवित प्राणियों का पोषण करते हैं। अतः इस दिन सूर्य देव की आराधना की जाती है। साथ ही यह दिन पवित्र जल स्रोतों में धार्मिक स्नान करने और दान इत्यादि जैसे शुभ कार्यों को करने के लिये महत्वपूर्ण माना जाता है। वहीं जिस दिन सूर्य देव मकर राशि में प्रवेश करते हैं उस दिन को सूर्य देव की पूजा के लिये वर्ष का सर्वाधिक शुभफल देने वाला दिन माना जाता है। इस तरह हिन्दू संस्कृति में मकर संक्रान्ति का दिन बेहद खास और धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण होता है।
इस जीवंत त्यौहार का गहरा महत्व सूर्य और अन्य प्राकृतिक संसाधनों के प्रति उनके समर्पण में है। मकर संक्रान्ति वास्तव में ऐसी सभी प्राकृतिक घटनाओं के लिए धन्यवाद और प्रार्थना करने का समय है जो हमारे जीवन और कल्याण के लिए अनिवार्य हैं। इस दिन लोग भगवान सूर्यनारायण की पूजा करते हैं, उन्हें अर्घ्य देते हैं और सफलता एवं समृद्धि के लिए भगवान सूर्य को धन्यवाद देते हैं।
यही नहीं, शास्त्रों में मकर संक्रांति के दिन स्नान, ध्यान और दान का भी विशेष महत्व बताया गया है। पुराणों में मकर संक्रांति को देवताओं का दिन भी बताया गया है।
मकर संक्रान्ति पर करें इन 10 वस्तुओं का महादान, होगा सभी परेशानियों का अंत।
शास्त्रों में मकर संक्रान्ति को तिल संक्रान्ति भी कहा जाता है। काले तिल और तिल से बनी चीजों को दान करने से पुण्य लाभ मिलता है। विशेषकर शनिदेव को प्रसन्न करने के लिए तिल का दान किया जाता है। इसके अलावा सूर्यदेव और भगवान विष्णु भी तिल दान करने से प्रसन्न होते हैं। माना जाता है कि यह दान करने से शनि दोष भी दूर होता है।
उत्तर भारत के कुछ क्षेत्रों में मकर संक्रान्ति को खिचड़ी भी कहा जाता है। इस दिन खिचड़ी का दान करने से विशेष पुण्य प्राप्त होता है। मकर संक्रान्ति पर चावल और काली उड़द की दाल को खिचड़ी के रूप में दान किया जाता है। कहते हैं कि दाल-चावल के इस महादान से अक्षय फल की प्राप्ति होती है।
मकर संक्रान्ति पर गुड़ और गुड़ से बनी चीजों को दान करने से विशेष लाभ प्राप्त होता है। ज्योतिष शास्त्र में गुड़ का संबंध गुरु ग्रह से होता है। मकर संक्रान्ति पर गुड़ दान करने पर शनि, गुरु और सूर्य तीनों प्रसन्न होते हैं।
मकर संक्रान्ति पर नमक दान करने की प्रथा भी है। नमक दान करने से एक विशेष तरह का लाभ मिलता है। शास्त्रों में बताया गया है कि मकर संक्रान्ति पर नमक के दान से अनिष्टों और बुरी ऊर्जाओं का नाश होता है।
मकर संक्रान्ति पर ऊनी कपड़े का दान करना भी बेहद शुभ माना जाता है। इस दिन किसी गरीब जरूरतमंद को ऊनी कपड़े, कंबल आदि का दान जरूर करना चाहिए।
मकर संक्रान्ति के दिन देशी घी और इससे बनी मिठाईयों का दान करना बहुत ही शुभ होता है। माना जाता है कि मान-सम्मान, यश और भौतिक सुविधाओं की प्राप्ति के लिए मकर संक्रान्ति पर देशी घी का दान किया जाता है।
मकर संक्रान्ति के दिन पवित्र नदियों में स्नान करने का भी विशेष फल मिलता है। साथ ही इस दिन गंगा में स्नान करने के बाद गरीबों को रेवड़ी का दान देना बहुत शुभ होता है।
आपकी क्षमता के अनुसार मकर संक्रान्ति पर गरीबों और जरूरमंदों को नए कपड़ों का दान करना चाहिए।
मकर संक्रान्ति के दिन पक्षियों को दाना और भूखे जानवरों को भोजन खिलाना अत्यंत फलकारी माना जाता है। साथ ही इस दिन किसी ब्राह्मण को गौ-दान करना और गाय को चारा खिलाना भी बेहद शुभ होता है।
मकर संक्रान्ति के विशेष अवसर पर किसी सुहागन स्त्री को सुहाग का सामान अवश्य दान करें। आप इस दान में बिंदी, सिन्दूर, मेहँदी, आलता, लाल वस्त्र और श्रृंगार से जुड़ी बहुत सी चीजों को शमिल कर सकते हैं।
आप सभी को श्री मंदिर की ओर से संक्रांति की शुभकामनाएं!
नोट - चौकी को पूर्व दिशा में स्थापित करें। ताकि पूजा करते समय आपका मुख पूर्व दिशा की तरफ रहे।
ज्योतिष के अनुसार, मकर संक्रांति के दिन स्नान, दान के बाद जो जातक सूर्य देव के मंत्रों और उनके 12 नामों का जाप करते हैं, उनके जीवन की बहुत सी समस्याएं सूर्य देव की कृपा से समाप्त हो जाती हैं। इस लेख में जानिए सूर्य देव की आरती, 5 मंत्र और 12 नाम, जिनका जाप अवश्य करना चाहिए-
जय कश्यप-नन्दन,
ॐ जय अदिति नन्दन।
त्रिभुवन – तिमिर – निकंदन,
भक्त-हृदय-चन्दन॥
॥ जय कश्यप-नन्दन ॥
सप्त-अश्वरथ राजित,
एक चक्रधारी।
दु:खहारी, सुखकारी,
मानस-मल-हारी॥
॥ जय कश्यप-नन्दन ॥
सुर – मुनि – भूसुर – वन्दित,
विमल विभवशाली।
अघ-दल-दलन दिवाकर,
दिव्य किरण माली॥
॥ जय कश्यप-नन्दन ॥
सकल – सुकर्म – प्रसविता,
सविता शुभकारी।
विश्व-विलोचन मोचन,
भव-बन्धन भारी॥
॥ जय कश्यप-नन्दन ॥
कमल-समूह विकासक,
नाशक त्रय तापा।
सेवत साहज हरत अति
मनसिज-संतापा॥
॥ जय कश्यप-नन्दन ॥
नेत्र-व्याधि हर सुरवर,
भू-पीड़ा-हारी।
वृष्टि विमोचन संतत,
परहित व्रतधारी॥
॥ जय कश्यप-नन्दन ॥
सूर्यदेव करुणाकर,
अब करुणा कीजै।
हर अज्ञान-मोह सब,
तत्त्वज्ञान दीजै॥
॥ जय कश्यप-नन्दन ॥
इस मकर संक्रांति आप भी श्रद्धापूर्वक सूर्य देव के इन मंत्र, आरती और नामों का जाप करें। आपकी हर मनोकामना पूरी होगी।
खुशियों से परिपूर्ण मकर संक्रांति का पर्व उल्लास की एक लहर लेकर आता है। लोग विभिन्न प्रकार से इस पर्व को मनाते है। इस दिन पतंग उड़ाने की परंपरा भी बेहद प्रचलित है।
भारत के अधिकांश हिस्सों में इस दिन पतंगबाजी की जाती है, खासतौर पर गुजरात में। इसके अलावा मध्य प्रदेश, दिल्ली, महाराष्ट्र आदि प्रदेशों में भी मकर संक्रांति पर पतंग उड़ाने की परंपरा है।
आज इस लेख में हम जानेंगे कि आखिरकार इस परंपरा के पीछे का कारण क्या है, क्यों खासतौर पर इस दिन पतंग उड़ाई जाती है, तो चलिए शुरू करते हैं-
इसके पीछे कोई विशेष धार्मिक कारण नहीं मिलता, लेकिन पतंग उड़ाना अपनी खुशियों को व्यक्त करने का एक माध्यम है। यह पर्व लोगों में प्रेम और एकता की भावना को बढ़ावा देता है। समाज के सभी तबके के लोग एकत्रित होते हैं और इस पर्व को मनाने के लिए पतंग उड़ाते हैं। इस प्रकार यह पर्व संप्रायिकता की भावना को भी बढ़ावा देता है।
इसके अलावा, इस परंपरा के पीछे एक अन्य कारण यह दिखाई देता है कि, मकर संक्रांति पर सूर्य उत्तरायण होता है, इस कारण इस समय सूर्य की किरणें औषधि का काम करती हैं। क्योंकि सर्दी के कारण हमारे शरीर में कफ की मात्रा बढ़ जाती है और त्वचा भी रुखी हो जाती है।
इसके साथ ही पतंग उड़ाते समय हमारा शरीर सीधे सूर्य की किरणों के संपर्क में आ जाता है, जिससे सर्दी से जुड़ी समस्याओं से भी निजात मिलती है।
मकर संक्रान्ति पर खासकर हम सभी को तिल और गुड़ के लड्डू खाना बेहद पसंद आता है। लेकिन क्या आपको पता है कि मकर संक्रान्ति के शुभ दिन पर तिल और गुड़ का इतना महत्व क्यों होता है? तो आइये जानते हैं इस परंपरा से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण तथ्य।
तो चलिए सबसे पहले बात करते हैं इस प्रथा के पीछे छुपी धार्मिक मान्यता की। साथ ही हम आपको इससे जुड़ी वैज्ञानिक अवधारणा भी बताएँगे।
हिंदू संस्कृति में मकर संक्रान्ति के अवसर पर तिल और गुड़ के दान एवं भोग का विशेष महत्व माना जाता है। लोग इस दिन पूरी श्रद्धा और भक्ति भाव से तिल के लड्डू बनाते हैं और सूर्य देव सहित भगवान विष्णु को अर्पित करते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर मकर संक्रान्ति पर तिल के लड्डू बनाने और खाने की परंपरा क्यों है, और खासकर इन्हें गुड़ में ही क्यों बनाया जाता है?
सृष्टि के पालनहार माने जाने वाले श्री विष्णुजी के लिए भी तिल बेहद खास है। मान्यता है कि मकर संक्रान्ति के दिन तिल का दान एवं भोग व्यक्ति को सभी प्रकार के पापों से मुक्त कर देता है। साथ ही विष्णुजी की विशेष कृपा दृष्टि भी प्रदान करता है।
तिल और गुड़ को बेहद ही स्वास्थ्यवर्धक खाद्य वस्तु माना गया है। इसमें कॉपर, मैग्नीशियम, आयरन, फास्फोरस, जिंक, प्रोटीन, कैल्सियम, बी कॉम्प्लेक्स और कार्बोहाइट्रेड जैसे महत्वपूर्ण तत्व पाये जाते हैं। इसके अतिरिक्त इनमें एंटीऑक्सीडेंट्स भी होते हैं जो कई बीमारियों के उपचार में मदद करते हैं। यह पाचन क्रिया को भी सही रखता है और शरीर को निरोगी बनाता है।
मकर संक्रान्ति का पर्व हर वर्ष जनवरी माह में मनाया जाता है। इस दौरान मौसम काफी ठंडा होता है। वहीं तिल और गुड़ की तासीर गर्म होती है और सर्दी के मौसम में जब शरीर का तापमान गिर जाता है तो शरीर को अतिरिक्त गर्मी की जरूरत होती है। ऐसे में तिल और गुड़ का सेवन शरीर में गर्मी व ऊर्जा के स्तर को बनाए रखता है।
मकर संक्रान्ति के दिन सूर्य देव मकर राशि में प्रवेश करते हैं, इसलिए इस पर्व को मकर संक्रान्ति कहकर भी पुकारा जाता है और मकर राशि के स्वामी शनि देव हैं। साथ ही तिल शनिदेव की प्रिय वस्तु है। ऐसा माना जाता है कि इस दिन अगर तिल का दान व उसका सेवन किया जाए तो इससे शनि देव प्रसन्न होते हैं और उनकी नकारात्मक दृष्टि से हमें मुक्ति मिलती है। जो लोग इस दिन तिल का सेवन व दान करते हैं, उनका राहु व शनि दोष निवारण बेहद सरलता से हो जाता है।
मान्यताओं के अनुसार मकर संक्रान्ति पर धर्म कार्यों से अद्भुत लाभों की प्राप्ति होती है। हमारे आज के इस विशेष लेख में हम आपको ऐसे ही लाभों के बारे में बताएँगे। आप अंत तक हमारे साथ बने रहें।
पुण्य प्राप्ति - मकर संक्रांति के दिन पवित्र नदियों में स्नान करने से या उनके जल को घर के पानी मिलाकर स्नान करने से सभी पाप नष्ट होते हैं और हज़ार गुना अधिक पुण्यफल मिलता है।
कार्य सफलता - मकर संक्रांति के दिन सूर्य उत्तरायण होते हैं। इस दिन जल में सफेद चंदन, दूध, सफेद फूल और तिल डालकर सूर्य को अर्घ्य दें। इससे आपको कोई बड़ा पद मिलेगा, और हर काम में सफल होंगे।
आर्थिक प्रगति - माना जाता है कि मकर संक्रांति के दिन दान तिल, गुड़, खिचड़ी, नए कपड़े, कंबल आदि का दान करने से घर में चल रहे क्लेश समाप्त होते हैं और घर में कभी भी धन्य धान्य की कमी नहीं होती।
सुख समृद्धि की प्राप्ति - मकर संक्रांति के दिन गाय को हरा चारा खिलाने से आपके जीवन में शांति और समृद्धि का वास होगा।
स्वास्थ का वरदान - कहते हैं कि मकर संक्रांति के दिन तिल-गुड़ ज़रूर खाना चाहिए, इससे सूर्य देव और शनि देव दोनों की कृपा मिलती है, साथ ही सर्दियों में होने वाली बीमारियां भी दूर रहती हैं।
तो दोस्तों, आप भी मकर संक्रांति पर दान पुण्य करें, आपको अपार सुख समृद्धि मिले।
मकर संक्रांति के दिन देर तक सोना घर-परिवार में दरिद्रता का कारण बनता है। धार्मिक मान्यता है कि मकर संक्रांति के पर्व पर भगवान सूर्य उनके पुत्र शनि की राशि अर्थात मकर में गोचर करते हैं, इसीलिए इस दिन सूर्योदय के बाद देर तक सोते रहने से आप सूर्यदेव के साथ ही शनिदेव के कोप के भागी भी बनेंगे।
इस दिन ऐसा करें कि सुबह जल्दी उठकर जल में गंगाजल और तिल मिलाकर स्नान करें।
मकर संक्रांति के दिन दान करना मनुष्य को कई पापों से मुक्ति दिलाता है। इस दिन भूलकर भी किसी जरूरतमंद को अपनी दहलीज से खाली हाथ न जाने दें। अपनी क्षमता के अनुसार दान अवश्य करें।
तेल, कम्बल, गरम कपड़े और अन्न, ये कुछ ऐसी वस्तुएं है जो आपको मकर संक्रांति पर दान करनी चाहिए।
हिन्दू धर्म में मकर संक्रांति के दिन मांस-मदिरा और शराब के सेवन को वर्जित माना जाता है। इस दिन ऐसा करना पाप की श्रेणी में आता है। भूल से भी इस शुभ तिथि पर घर में या घर से बाहर भी मांस मदिरा और शराब का सेवन न करें।
इसके बदले इस दिन तिल-गुड़ के लड्डू, खिचड़ी, चूड़ा-दही आदि का सेवन करें
दोस्तों अब एक विशेष बात! मकर संक्रांति के उत्सव में पतंग उड़ाना, गिल्ली डंडा, लट्टू आदि से खेलना आज भी कई क्षेत्रों में प्रचलित है। इस दिन आपका उत्सव किसी अन्य के लिए तकलीफ न बनें, इस बात का ध्यान रखें। मकर संक्रांति के शुभ दिन पर किसी की निंदा न करें, किसी से अपशब्द न कहें और अपने मन में सद्भाव रखें।
इसके लिए मकर संक्रांति के उत्सव में अपनी और अन्य लोगों की सुरक्षा का ध्यान रखें।
दोस्तों, मकर संक्रान्ति का त्यौहार किसी उत्सव से कम नहीं होता। समाज के सभी वर्गों में हर उम्र के लोग इस महापर्व को अपने -अपने तरीके से मनाते हैं। जहाँ बड़े-बूढ़े दान को महत्वपूर्ण मानते हैं, वहीं बच्चों के लिए यह त्यौहार लड्डू खाने और गिल्ली-डंडा खेलने का बहाना होता है।
हमारा आज का ये विशेष लेख मकर संक्रान्ति महोत्सव के अलग-अलग रंगों को दर्शाता है। जिसमें हम आपके लिए लेकर आए हैं इस त्यौहार से जुड़ी 8 बेहद खास बातें।
यह दिन विशेष रूप से भगवान सूर्य को समर्पित होता है। ज्योतिष के अनुसार पौष मास में सूर्य भगवान धनु राशि को छोड़ मकर राशि में प्रवेश करते हैं। इसलिए यह संक्रान्ति मकर संक्रान्ति के नाम से लोकप्रिय है। इस दिन से दिन बड़े होने लगते हैं और रातें छोटी होती हैं, जिससे प्रकृति में सकारात्मक बदलाव आते हैं। हालाँकि हिंदू कैलेण्डर में बारह संक्रान्तियाँ होती हैं, परन्तु मकर संक्रान्ति अपने धार्मिक महत्व के कारण सभी संक्रान्तियों में सर्वाधिक विशेष मानी जाती है।
संक्रान्ति पर पवित्र नदियों में स्नान का बहुत महत्व है। लेकिन इस दिन गंगासागर में स्नान का विशेष महत्व माना गया है, कहा जाता है सारे तीरथ बार बार गंगासागर एक बार। विभिन्न धारणाओं के अनुसार साल में 1 दिन गंगासागर में जाकर स्नान करने से शरीर रोगों से मुक्त हो जाता है।
मकर संक्रांति 2025 के पुण्य काल का समय 9:03 AM से 5:46 PM तक रहेगा, जो कुल 8 घंटे 42 मिनट तक चलेगा। महा पुण्य काल सुबह 9:03 AM से 10:48 AM तक होगा, जो 1 घंटा 45 मिनट का रहेगा। इस दौरान किए गए स्नान और दान से विशेष पुण्य मिलता है।
कहा जाता है कि मकर संक्रांति के दिन दान करने से घर में सुख- शांति और समृद्धि आती है। मकर संक्रांति के दिन तिल दान करना अत्यंत पुण्यकार्य माना जाता है। इसके अलावा इस दिन भगवान सूर्य, विष्णु और शनिदेव को भी तिल-गुड़ अर्पित किया जाता है। मान्यताओं के अनुसार मकर संक्रांति पर किए गए तिल के दान को शनि दोष को भी दूर करने में भी सहायक माना जाता है।
मकर संक्रांति से सूर्य की उत्तरायण यात्रा शुरू होती है। उत्तरायण का मतलब है कि सूर्य अब उत्तर दिशा की ओर बढ़ेगा, और इसका धार्मिक और तात्त्विक महत्व है। इसे शुभ समय माना जाता है और इसे अच्छे कार्यों के लिए उपयुक्त समय के रूप में देखा जाता है।
मकर संक्रांति पर तिल और गुड़ का विशेष महत्व है। इनका सेवन करने से शरीर में गर्मी बनी रहती है और सेहत भी दुरुस्त रहती है। साथ ही, तिल और गुड़ के सेवन से शरीर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है, और यह एक परंपरा है जो भारतीय संस्कृति का हिस्सा है। लोग तिल के लड्डू या तिल गुड़ बांटने की परंपरा निभाते हैं।
मकर संक्रांति के दिन खिचड़ी का सेवन करना भी शुभ माना जाता है। खिचड़ी पाचन को दुरुस्त रखती है, इसमें बहुत सारी सब्जियां मिलाकर बनाते हैं जैसे अदरक, टमाटर, मटर, गोभी, आलू, पालक आदि। सुपाच्य खिचड़ी खाने से शरीर भी बहुत स्वस्थ रहता है।
इस दिन पतंग उड़ाने की परंपरा भी बेहद प्रचलित है। भारत के अधिकांश हिस्सों में इस दिन पतंगबाजी की जाती है, खासतौर पर गुजरात में। इसके अलावा मध्य प्रदेश, दिल्ली, महाराष्ट्र आदि प्रदेशों में भी मकर संक्रांति पर पतंग उड़ाने की परंपरा है।
हालाँकि इसके पीछे कोई विशेष धार्मिक कारण नहीं मिलता, लेकिन पतंग उड़ाना अपनी खुशियों को व्यक्त करने का एक माध्यम है। इसके अलावा, इस परंपरा के पीछे एक अन्य कारण यह दिखाई देता है कि, मकर संक्रांति पर सूर्य का उत्तरायण होता है, इस कारण इस समय सूर्य की किरणें औषधि का काम करती हैं। पतंग उड़ाते समय हमारा शरीर सीधे सूर्य की किरणों के संपर्क में आ जाता है, जिससे सर्दी से जुड़ी समस्याओं से निजात मिलती है।
अगर आप भी पतंगबाजी करते हैं तो कृपया अपनी और दूसरों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए पतंग उड़ाएं, नुकसान पहुंचाने वाले मांझे का प्रयोग न करें।
मकर संक्रांति को विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग नामों से मनाया जाता है। जैसे- पंजाब में इसे "लोहड़ी" के रूप में मनाया जाता है, दक्षिण भारत में "पोंगल", महाराष्ट्र में "उगादी" और उत्तर भारत में इसे मकर संक्रांति के नाम से मनाया जाता है। हर राज्य में इस दिन की अपनी खास परंपराएं और रीति-रिवाज होते हैं, जैसे तंगली की पूजा, मेला आदि।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, चिरकाल में सगर नाम के एक अत्यंत परोपकारी राजा थे, वे अपने पुण्य कर्मों और महान गुणों के कारण तीनों लोकों में प्रसिद्ध हो गए और चारों ओर उनका ही गुणगान होने लगा। इस बात से देवताओं के राजा इंद्र को चिंता होने लगी कि कहीं राजा सगर स्वर्ग के राजा न बन जाएं। इसी बीच राजा सगर ने अश्वमेध यज्ञ का आयोजन किया। तब इंद्र देव ने उनके अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा चुराकर कपिल मुनि के आश्रम के पास बांध दिया।
अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा चोरी होने की सूचना पर राजा सगर ने अपने सभी 60 हजार पुत्रों को उसकी खोज में लगा दिया। वे सभी पुत्र घोड़े को खोजते हुए कपिल मुनि के आश्रम तक पहुंच गए। वहां पर उन्होंने अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा देखा। और कपिल मुनि पर घोड़ा चोरी करने का आरोप लगा दिया। इससे क्रोधित होकर कपिल मुनि ने राजा सगर के सभी 60 हजार पुत्रों को श्राप से जलाकर भस्म कर दिया।
यह जानकर राजा सगर भागते हुए कपिल मुनि के आश्रम पहुंचे और उनके पुत्रों को क्षमा दान देने का निवेदन किया। तब कपिल मुनि ने कहा कि सभी पुत्रों के मोक्ष के लिए एक ही मार्ग है, तुम मोक्षदायिनी गंगा को पृथ्वी पर लाओ। राजा सगर के पोते राजकुमार अंशुमान ने कपिल मुनि के सुझाव पर प्रण लिया कि जब तक वह मां गंगा को पृथ्वी पर नहीं लाते, तब तक उनके वंश का कोई राजा चैन से नहीं बैठेगा। इस प्रकार वे आजीवन तपस्या में लीन रहे और उनकी मृत्यु के बाद राजा भागीरथ ने अपने कठिन तप से मां गंगा को प्रसन्न किया। तब माँ गंगा ने राजा भागीरथ को वरदान दिया कि वे पृथ्वी पर अवतरित होंगी।
किंतु मां गंगा का वेग इतना था कि वे पृथ्वी पर उतरतीं तो, सर्वनाश हो जाता। इसके बाद राजा भागीरथ ने भगवान शिव को अपने तप से प्रसन्न किया, ताकि वे अपनी जटाओं से होकर मां गंगा को पृथ्वी पर उतरने दें, जिससे गंगा का वेग कम हो सके। तब भगवान शिव ने भागीरथ राजा की विनती स्वीकार करते हुए मां गंगा को अपनी जटाओं में धारण कर लिया। इसी के साथ भगवान शिव गंगाधर नाम से भी प्रसिद्ध हुए।
इस प्रकार मां गंगा का पृथ्वी पर अवतरण हुआ। तब राजा भागीरथ मां गंगा को कपिल मुनि के आश्रम तक लेकर आए, जहां पर मां गंगा ने राजा सगर के 60 हजार पुत्रों को मोक्ष प्रदान किया। इसके बाद मां गंगा आगे जाकर सागर में समाहित हो गईं।
जिस दिन मां गंगा ने राजा सगर के 60 हजार पुत्रों को मोक्ष प्रदान किया, उस दिन मकर संक्रान्ति का ही दिन था। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसी मकर संक्रान्ति के दिन से गंगासागर या गंगा नदी में स्नान करने की परम्परा शुरू हुई। माना जाता है कि मकर संक्रान्ति के दिन गंगा नदी में स्नान करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है और सभी जन्मों के पापों से मुक्ति प्राप्त होती है।
तो दोस्तों ये थी मकर संक्रांति से जुड़ी बातें, मकर संक्रांति का दिन खुशी, समृद्धि और नए आशीर्वाद का प्रतीक है। ऐसी ही अन्य जानकारियों के लिए आप जुड़े रहिए श्री मंदिर के साथ। हम आशा करते हैं इस वर्ष की मकर संक्रान्ति आप सभी के जीवन में गुड़ जैसी मिठास लेकर आए।
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