सिद्ध कुञ्जिका स्तोत्रम्

सिद्ध कुञ्जिका स्तोत्रम्

इससे पाठ से होंगी सभी मनोकामनाएं पूर्ण


सिद्ध कुञ्जिका स्तोत्रम् (Siddha Kunjika Stotram)

सिद्ध कुंजिका स्तोत्र को बहुत कल्याणकारी माना गया है। यह स्तोत्र श्रीरुद्रयामल के गौरी तंत्र में शिव पार्वती संवाद के नाम से वर्णन मिलता है। केवल कुंजिका स्तोत्र के पाठ से सप्तशती के सम्पूर्ण पाठ का फल मिलता है। इस स्त्रोत का पाठ करने से साधक को आत्म शांति मिलती है। मन में सकारात्मक विचार आते है। इस स्त्रोत का पाठ करने से आर्थिक समस्याएं भी दूर हो जाते हैं।

सिद्ध कुञ्जिका स्तोत्र का महत्व (Importance of Siddha Kunjika Stotra)

सिद्ध कुंजिका स्तोत्र एक सिद्ध स्त्रोत है। इसे नियमित रूप से करने पर दुर्गासप्तशती पढ़ने के समान पुण्य प्राप्त होता है। यह स्तोत्र श्रीरुद्रयामल के मन्त्र द्वारा सिद्ध है। इसलिए इसे सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं होती। यह बहुत ही अद्भुत स्तोत्र है, जिसका प्रभाव बहुत चमत्कारी होता है। सिद्ध कुंजिका स्तोत्र का पाठ से मनुष्य के पांच बड़ी समस्याएं दूर हो जाती हैं।

सिद्ध कुञ्जिका स्तोत्र पढ़ने के फायदे (Benefits of reading Siddha Kunjika Stotra)

सिद्ध कुंजिका स्तोत्र का नियमित पाठ करने से समस्त विपदाएं खुद से ही दूर हो जाती हैं। साधक को सभी कष्टों से मुक्ति भी मिलती है। जो भी साधक पूर्ण भाव से इस स्त्रोत का नित्य पाठ करता है उसकी सभी मनोकामनाये पूर्ण हो जाती हैं। किसी व्यक्ति को यदि दुर्गा सप्तशती का पाठ करना कठिन लगे या पढ़ने का समय नहीं मिल रहा हो तो उस साधक को सिद्ध कुंजिका स्तोत्र का पाठ करना चाहिए। यह स्त्रोत सरल होने के साथ ही बहुत कम समय में बहुत ही प्रभावकारी असर दिखाता है। सिद्ध कुंजिका स्तोत्र का पाठ साधक अपनी सुविधा के अनुसार किसी भी वक्त कर सकता है, परन्तु यदि इसे शाम की आरती के बाद किया जाए तो यह बहुत ही जल्दी फल देता है।

सिद्ध कुञ्जिका स्तोत्र का हिंदी अर्थ (Hindi meaning of Siddha Kunjika Stotra)

                     **शिव उवाच**

शृणु देवि प्रवक्ष्यामि कुंजिकास्तोत्रमुत्तमम्। येन मन्त्रप्रभावेण चण्डीजापः शुभो भवेत् ।।1।।

अर्थात - शिव जी ने कहा - देवी सुनो। मैं उत्तम कुंजिका स्तोत्र का ज्ञान उपदेश करूँगा, जिस मन्त्र के प्रभाव से देवीचण्डी का जप सफल होता है।

न कवचं नार्गलास्तोत्रं कीलकं न रहस्यकम्। न सूक्तं नापि ध्यानं च न न्यासो न च वार्चनम् ।। 2 ।।

अर्थात - कवच, अर्गला, कीलक, रहस्य, सूक्त, ध्यान, न्यास यहाँ तक कि अर्चन भी आवश्यक नहीं है।

कुञ्जिकापाठमात्रेण दुर्गापाठफलं लभेत्। अति गुह्यतरं देवि देवानामपि दुर्लभम् ।।3।।

अर्थात - केवल कुंजिका के पाठ से दुर्गापाठ का फल प्राप्त हो जाता है। यह सिद्ध कुंजिका स्तोत्र अत्यंत गुप्त और देवों के लिए भी दुर्लभ है।

गोपनीयं प्रयत्नेन स्वयोनिरिव पार्वति। मारणं मोहनं वश्यं स्तंभोच्चाटनादिकम। पाठमात्रेण संसिध्येत् कुंजिकास्तोत्रमुत्तमम् ।।4।।

अर्थात - हे पार्वती! इसे स्वयोनि की भाँति प्रयत्न पूर्वक गुप्त रखना चाहिये। यह उत्तम कुंजिका स्तोत्र केवल पाठ के द्वारा मारण, मोहन, वशीकरण, स्तम्भन और उच्चाटन आदि उद्देश्यों को सिद्ध करता है।

अथ मंत्रः

“ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॐ ग्लौं हुं क्लीं जूं सः ज्वालय ज्वालय ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ज्वल हं सं लं क्षं फट् स्वाहा”

। इति मंत्रः ।

नमस्ते रुद्ररूपिण्यै नमस्ते मधुमर्दिनि नमः कैटभहारिण्यै नमस्ते महिषार्दिनि ।।1।। अर्थात - हे रुद्रस्वरूपिणी! हे मधु दैत्य को मारने वाली! कैटभविनाशिनीको नमस्कार, महिषासुर को मारने वाली देवी! तुम्हें प्रणाम है।

नमस्ते शुम्भहन्त्र्यै च निशुम्भासुरघातिनि जाग्रतं हि महादेवि जपं सिद्धं कुरुष्व मे ।।2।।

अर्थात - शुम्भ का हनन करने वाली और निशुम्भ को मारने वाली! तुम्हें नमस्कार है। हे महादेवि! मेरे जपको जाग्रत् और सिद्ध करो।

ऐंकारी सृष्टिरुपायै ह्रींकारी प्रतिपालिका क्लींकारी कामरूपिण्यै बीजरूपे नमोस्तु ते।।3।।

अर्थात - ‘ ऐंकार ‘ के रूप में सृष्टि स्वरूपिणी, ‘ ह्रीं ‘ के रूप में सृष्टि पालन करने वाली। ‘ क्लीं ‘ के रूप में कामरूपिणी की बीज रूपिणी देवी! तुम्हें नमस्कार है।

चामुण्डा चण्डघाती च यैकारी वरदायिनी विच्चे चाभयदा नित्यं नमस्ते मन्त्ररूपिणि ।।4।।

अर्थात - चामुण्डा के रूप में चण्ड विनाशिनी और ‘ यैकार ‘ के रूप में तुम वर देने वाली हो। ‘ विच्चे ‘ रूप में तुम नित्य ही अभय देती हो। ( इस प्रकार ‘ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे’ ) तुम इस मन्त्रका स्वरूप हो।

धां धीं धू धूर्जटे: पत्नी वां वीं वूं वागधीश्वरी क्रां क्रीं क्रूं कालिका देवि शां शीं शूं मे शुभं कुरु ।।5।।

अर्थात - ‘ धां धीं धूं ‘ के रूप में धूर्जटी की तुम पत्नी हो। ‘ वां वीं वू ‘ के रूप में तुम वाणी की अधीश्वरी हो। ‘ क्रां क्रीं क्रू ‘ के रूप में कालिकादेवी, ‘ शां शी शृं ‘ के रूप में मेरा कल्याण करो।

हुं हुं हुंकाररूपिण्यै जं जं जं जम्भनादिनी भ्रां भ्रीं भ्रूं भैरवी भद्रे भवान्यै ते नमो नमः।।6।।

अर्थात - ‘ हुं हुं हुंकार ‘ स्वरूपिणी, ‘ जं जं जं ‘ जम्भनादिनी, ‘ भ्रां भी ‘ के रूप में हे कल्याण कारिणी भैरवी भवानी ! तुम्हें बार-बार प्रणाम है।

अं कं चं टं तं पं यं शं वीं दुं ऐं वीं हं क्षं धिजाग्रं धिजाग्रं त्रोटय त्रोटय दीप्तं कुरु कुरु स्वाहा।।7।।

अर्थात - ‘ अं कं चं टं तं पं यं शं वीं दुं ऐं वीं हं क्षं धिजाग्रं धिजाग्रं ‘ इन सबको तोड़ो और दीप्त करो, करो स्वाहा।

पां पीं पूं पार्वती पूर्णा खां खीं खूं खेचरी तथा
सां सीं सूं सप्तशती देव्या मंत्रसिद्धिं कुरुष्व मे।।8।।

अर्थात -‘ पां पी पूं ‘ के रूप में तुम पार्वती पूर्णा हो। ‘ खां खी खू ‘ के रूप में तुम खेचरी अथवा खेचरी मुद्रा हो। ‘ सां सी सूं ‘ स्वरूपिणी सप्तशती देवी के मंत्र को मेरे लिये सिद्ध करो।

इदं तु कुंजिकास्तोत्रं मंत्रजागर्तिहेतवे । अभक्ते नैव दातव्यं गोपितं रक्ष पार्वति ।। यस्तु कुंजिकया देवि हीनां सप्तशतीं पठेत् । न तस्य जायते सिद्धिररण्ये रोदनं यथा ।।

इति श्रीरुद्रयामले गौरीतन्त्रे शिवपार्वतीसंवादे कुंजिकास्तोत्रं सम्पूर्णम्।

यह कुंजिका स्तोत्र मन्त्र को जगाने के लिये है। इसे भक्ति हीन पुरुष को नहीं देना चाहिये। हे पार्वती! इसे गुप्त रखो। हे देवी! जो भी व्यक्ति कुंजिका के बिना सप्तशती का पाठ करता है उसे उसी प्रकार सिद्धि नहीं मिलती जिस प्रकार वन में रोना निरर्थक हो जाता है।

।। ॐ तत्सत्।।

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