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श्री शिवमहिम्न स्तोत्रम्

श्री शिवमहिम्न स्तोत्रम्

पढ़ें श्री शिवमहिम्न स्तोत्रम्


शिवमहिम्न स्तोत्रम्

शिवभक्त श्री गंधर्वराज पुष्पदंत द्वारा रचित शिवमहिम्न स्तोत्र या फिर श्री शिवमहिम्नस्तोत्रम् का अभिप्राय शिव की महिमा से है। यह एक अत्यंत ही मनोहारी शिव स्तोत्र है जो अगाध प्रेम भाव से ओतप्रोत होने के कारण भगवान शिव को बहुत प्रिय है। यहां शिवमहिम्न स्तोत्र को अर्थ सहित प्रस्तुत किया जा रहा है। साथ ही इसकी महिमा और लाभ की जानकारी भी यहां दी जा रही है।

क्या है शिवमहिम्न स्तोत्र?

शिवमहिम्न स्तोत्र महान शिवभक्त गंधर्व पुष्पदंत द्वारा रचा गया है। गंधर्व पुष्पदंत देवराज इंद्र की सभा के मुख्य गायक थे। कहते हैं, गंधर्व पुष्पदंत को एक बार भगवान शिव के क्रोध का सामना करना पड़ा था। भगवान शिव के क्रोध के कारण जब गंधर्व की सभी शक्तियां खत्म हो गई, तो उन्होंने क्षमा याचना के लिए कुछ छंद बोले थे, जिससे प्रसन्न होकर भगवान भोलेनाथ ने उन्हें सारी शक्तियां वापस लौटा दी और उस छंद को शिवमहिम्न स्तोत्र नाम दिया। साथ ही उन्होंने वरदान दिया कि इस छंद का पाठ करने वाला साधक उनके हृदय में स्थान प्राप्त करेगा।

शिवमहिम्न स्तोत्र पाठ विधि:

शिव भक्त को प्रतिदिन सुबह नित्य कर्म से निवृत होने के बाद स्नान कर भगवान शिव की तस्वीर या शिवलिंग के सामने शिवमहिम्न स्तोत्र का पाठ करना चाहिए।

शिवमहिम्न स्तोत्र पाठ से पहले शिवलिंग का कच्चे दूध और जल से अभिषेक करें। इसके बाद धूप, दीप, पुष्प और नैवेद्य अर्पित करें। पूजा के बाद शिवमहिम्न स्तोत्र का पाठ करें।

शिवमहिम्न स्तोत्र से लाभ:

  • इस स्तोत्र के जाप से डर पर काबू पाने में मदद मिलती है।
  • इस स्तोत्र के जाप से भगवान शिव की दिव्य कृपा प्राप्त होती है।
  • इस स्तोत्र के जाप से मनुष्य के सारे पाप नष्ट हो जाते हैं।

शिवमहिम्न स्तोत्रम् - मूल पाठ

पुष्पदंत उवाच:

महिम्नः पारन्ते परमविदुषो यद्यसदृशी। स्तुतिर्ब्रह्मादीनामपि तदवसन्नास्त्वयि गिरः॥ अथावाच्यः सर्वः स्वमतिपरिमाणावधि गृणन्। ममाप्येष स्तोत्रे हर निरपवादः परिकरः॥ १॥

अर्थ:

श्री पुष्पदंत जी कहते हैं कि हे प्रभु ! बड़े बड़े विद्वान और योगीजन आपके महिमा को नहीं जान पाए तो मैं तो एक साधारण बालक हूं, मेरी क्या गिनती ? लेकिन क्या आपके महिमा को पूर्णतया जाने बिना आपकी स्तुति नहीं हो सकती? मैं ये नहीं मानता क्योंकि अगर ये सच है तो फिर ब्रह्मा की स्तुति भी व्यर्थ कहलाएगी । मैं तो ये मानता हूँ कि सबको अपनी मति अनुसार स्तुति करने का अधिकार है। इसलिए हे भोलेनाथ ! आप कृपया मेरे हृदय के भाव को देखें और मेरी स्तुति को स्वीकार करें॥ १ ॥

अतीतः पन्थानं तव च महिमा वाङ्मनसयो:। रतदव्यावृत्या यं चकितमभिधत्ते श्रुतिरपि।। स कस्य स्तोतव्यः कतिविधिगुणः कस्य विषयः । पदे त्वर्वाचीने पतति न मनः कस्य न वचः ॥ २ ॥

अर्थ: हे शिव !!! आपकी व्याख्या न तो मन और न ही वचन द्वारा संभव है। आपके संदर्भ में वेद भी अचंभित हैं तथा 'नेति नेति' का प्रयोग करते हैं अर्थात ये भी नहीं और वो भी नहीं। आपकी महिमा और आपके स्वरूप को पूर्णतया जान पाना असंभव है, लेकिन जब आप साकार रूप में प्रकट होते हो तो आपके भक्त आपके स्वरूप का वर्णन करते नहीं थकते। ये आपके प्रति उनके प्यार और पूज्य भाव का परिणाम है॥ २ ॥

मधुस्फीता वाचः परमममृतं निर्मितवत:। स्तवब्रह्मन्किवागपि सुरगुरोविस्मय पदम्।। मम त्वेतां वाणों गुणकथनपुण्येन भवतः। पुनामीत्यर्थेऽस्मिन् पुरमथनबुद्धिर्व्यवसिता ॥३॥

अर्थ:

हे वेद और भाषा के सृजन ! आपने अमृतमय वेदों की रचना की है। इसलिए जब देवों के गुरु, बृहस्पति आपकी स्तुति करते हैं तो आपको कोई आश्चर्य नहीं होता। मैं भी अपनी मति अर्थात ज्ञान के अनुसार आपका गुणानुवाद करने का प्रयास कर रहा हूं। मैं मानता हूं कि इससे आपको कोई आश्चर्य नहीं होगा, मगर मेरी वाणी इससे अधिक पवित्र और लाभान्वित अवश्य होगी ||३||

तवैश्वर्यं तत्तज्जगदुदयरक्षा प्रलयकृत्। त्रयीवस्तुव्यस्तं तिसृषु गुणभिन्नासुतनुषु ॥ अभव्यानामस्मिन्वरद रमणीयामरमणीम्। विहन्तु व्याक्रोशीं विदधत इहैके जडधियः ॥४॥

अर्थ:

हे देव ! आप इस सृष्टि के सृजनहार है, पालनहार है और विसर्जनकार अर्थात संहार करने वाले हैं। इस प्रकार आपके ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीन स्वरूप हैं। तथा आप में सत्व, रज और तम तीन गुण भी हैं । वेदों में इनके बारे में वर्णन किया गया है फिर भी अज्ञानी लोग आपके बारे में ऊटपटांग बातें करते रहते हैं। ऐसा करने से भले ही उन्हें संतुष्टि मिलती हो, किन्तु यथार्थ से वो मुंह नहीं मोड़ सकते ॥ ४ ॥

किमीहः किङ्कायः स खलु किमुपायस्त्रिभुवनम्। किमाधारो धाता सृजति किमुपादान इति च॥ अतक्यैश्वर्ये त्वय्यनवसरदुःस्थो हतधियः। कुतर्कोऽयं कांश्चिन्मुखरयति मोहाय जगतः॥ ५॥

अर्थ:

हे महादेव ! मूर्ख लोग अक्सर तर्क करते रहते है कि ये सृष्टि की रचना कैसे हुई, किसकी इच्छा से हुई, किन वस्तुओं से उसे बनाया गया इत्यादि। उनका उद्देश्य लोगों में भ्रांति पैदा करने के अलावा कुछ नहीं है। सच पूछो तो ये सभी प्रश्नों के उत्तर आपकी दिव्य शक्ति से जुड़े हैं और मेरी सीमित शक्ति से उसे व्यक्त करना असंभव है॥ ५ ॥

अजन्मानो लोकाः किमवयववन्तोऽपि जगतां। मधिष्ठातारं किं भवविधिरनादृत्य भवति॥ अनीशो वा कुर्याद्भुवनजनने कः परिकरो। यतोमन्दास्त्वां प्रत्यमरवर संशेरत इमे ॥६॥

अर्थ:

हे परमपिता! यह सात लोक आपके द्वारा ही बनाया गया है, इसके कर्ता आपके अतिरिक्त दूसरा कोई नहीं हो सकता, क्योंकि इस विचित्र संसार की विचित्र रचना की सामग्री दूसरे के पास होना असंभव है। इसलिए अज्ञानी लोग ही आपके विषय में संदेह करते हैं॥ ६॥

त्रयी सांख्यं योगः पशुपतिमतं वैष्णवमिति। प्रभिन्न प्रस्थाने परमिदमदः पथ्यमिति च॥ रुचीनां वैचित्र्यादृजुकुटिलनानापथजुषां। नृमाणेको गम्यस्त्वमसि पयसामर्णव इव ॥७॥

अर्थ:

हे शिव ! आपको पाने के लिए अनगिनत मार्ग है – सांख्य मार्ग, वैष्णव मार्ग, शैव मार्ग, वेद मार्ग आदि। लोग अपनी रुचि के अनुसार कोई एक मार्ग को पसंद करते है। मगर आखिरकार ये सभी मार्ग, जैसे अलग अलग नदियों का पानी बहकर समुद्र में जाकर मिलता है, वैसे ही, यह सभी मार्ग आप तक पहुंचाते हैं। सचमुच, किसी भी मार्ग का अनुसरण करने से आपकी प्राप्ति हो सकती है ॥७॥

महोक्षः खट्वांग म्परशुरजिनं भस्म फणिनः। कपालंचेतीयत्तव वरद तन्त्रोपकरणम्॥ सुरास्तां तामृद्धिं दधति तु भवद्भ्द्ध प्रणिहिताम्। न हि स्वात्मारामं विषय मृगतृष्णा भ्रमयति।। ८।।

अर्थ:

हे शिव ! आपके भृकुटी के इशारे मात्र से सभी देवगण ऐश्वर्य एवं संपदाओं का भोग करते हैं। पर आपके स्वयं के लिए सिर्फ कुल्हाड़ी, बैल, व्याघ्रचर्म, शरीर पर भस्म तथा हाथ में खप्पर (खोपड़ी)! इससे ये फलित होता है कि जो आत्मानंद में लीन रहता है वो संसार के भोग पदार्थों में नहीं फंसता॥ ८ ॥

ध्रुवं कश्चित्सर्वं सकलमपरस्त्वद्ध वमिदम्। परोधौव्याध्रौव्ये जगति गदति व्यस्तविषये॥ समस्तेऽप्येतस्मिन्पुरमथन तैविस्मित इव। स्तुवज्ञ्जिद्देमि त्वां न खलु ननु धृष्टा मुखरता।। ९।।

अर्थ:

हे त्रिपुरहंता ! इस संसार के बारे में विभिन्न विचारकों के भिन्न-भिन्न मत हैं. कोई इसे नित्य जानता है तो कोई इसे अनित्य समझता है। लोग जो भी कहें, आपके भक्त तो आपको हमेशा सत्य मानते है और आपकी भक्ति मे आनंद पाते है। मैं भी उनका समर्थन करता हूँ, चाहे किसी को मेरा ये कहना धृष्टता लगे, मुझे उसकी परवाह नहीं।

तवैश्वर्यं यत्नाद्यदुपरिविरंचिर्हरिरधः। परिच्छेत्तु यातावनलमनलस्कन्धवपुषः॥ ततोभक्ति श्रद्धाभरगुरुगृणद्भ्यां गिरिश यत्। स्तयं तस्थे ताभ्यां तव किमनुवृत्तिर्न फलति।। १०।।

अर्थ:

हे प्रभु ! जब ब्रह्मा और विष्णु के बीच विवाद हुआ की दोनों में से कौन महान है, तब आपने उनकी परीक्षा करने के लिए अग्नि स्तंभ का रूप लिया । ब्रह्मा और विष्णु – दोनों ने स्तंभ को अलग अलग छोर से नापने की कोशिश की मगर वो सफल न हो सके। आखिरकार अपनी हार मानकर उन्होंने आपकी स्तुति की, जिससे प्रसन्न होकर आपने अपना मूल रूप प्रकट किया। सचमुच, अगर कोई सच्चे दिल से आपकी स्तुति करे और आप प्रकट न हों क्या ऐसा कभी हो सकता है भला ।। १० ।।

अयत्नादापाद्यत्रिभुवनमवैरव्यतिकरम्। दशास्यो यद्बाहूनभृत रणकण्डूपरवशान्॥ शिरः पद्मश्रेणोरचितचरणाम्भोरु हबलेः। स्थिरायास्त्वद्भक्तेस्त्रिपुरहर वियस्फूर्जितमिदम्॥ ११॥

अर्थ:

हे त्रिपुरान्तक ! आपके परम भक्त रावण ने पद्म की जगह अपने नौ-नौ मस्तक आपकी पूजा में समर्पित कर दिये। जब वो अपना दसवां मस्तक काटकर अर्पण करने जा रहा था, तब आपने प्रकट होकर उसको वरदान दिया। इस वरदान की वजह से ही उसकी भुजाओं में अटूट बल प्रकट हुआ और वो तीनो लोक में शत्रुओं पर विजय पाने में समर्थ रहा। ये सब आपकी दृढ़ भक्ति का नतीजा है॥ ११ ॥

अमुष्य त्वत्सेवा समधिगतसारं भुजवनम्। बलाकैलासेऽपि त्वदधिवसतौविक्रमयतः॥ अलभ्या पातालेऽप्यलसचलितांगु ष्ठशिरसि। प्रतिष्ठा त्वय्यासीद् ध्रुवमुपचितो मुह्यति खलः।। १२।।

अर्थ:

हे शिव ! आपकी परम भक्ति से रावण अतुलित बल का स्वामी बन बैठा मगर इससे उसने क्या करना चाहा ? आपकी पूजा के लिए हर रोज कैलाश जाने का श्रम बचाने के लिए कैलाश को उठाकर लंका में गाड़ देना चाहा। जब कैलाश उठाने के लिए रावण ने अपनी भुजाओं को फैलाया तब पार्वती भयभीत हो उठीं। उन्हें भयमुक्त करने के लिए आपने सिर्फ अपने पैर का अंगूठा लगाया तो रावण जाकर पाताल में गिरा और वहां भी उसे स्थान नहीं मिला। सचमुच, जब कोई आदमी अनधिकृत बल या संपत्ति का स्वामी बन जाता है तो उसका उपयोग करने में विवेक खो देता है। १२ ।।

यदृद्धि सुत्राम्णो वरद! परमोच्चैरपि सती। मधश्चक्र बाणः परिजनविधैयस्त्रिभुवनः॥ नतच्चित्रं तस्मिन्वरिवसिरित्वच्चरणयोः। न कस्याप्युन्नत्यं भवति शिरसस्त्वय्यवनतिः ॥१३॥

अर्थ:

हे शम्भो ! आपकी कृपा मात्र से ही बाणासुर दानव इन्द्रादि देवों से भी अधिक ऐश्वर्यशाली बन गया तथा तीनों लोकों पर राज किया। हे ईश्वर ! जो मनुष्य आपके चरण में श्रद्धा भक्तिपूर्वक शीश रखता है उसकी उन्नति और समृद्धि निश्चित है।। १३ ।।

अकाण्ड: ब्रह्माण्ड क्षयचकितदेवासुरकृपा। विधेयस्याऽसीद्यस्त्रिनयन विषं संह तवतः ।। स कल्माषः कण्ठे तव न कुरुते न श्रियमहो। विकारोऽपिश्लाघ्यो भुवनभयभगंव्यसनिनः ॥१४॥

अर्थ:

हे प्रभु ! जब समुद्र मंथन हुआ तब अन्य मूल्यवान रत्नों के साथ महाभयानक विष निकला, जिससे समग्र सृष्टि का विनाश हो सकता था। आपने बड़ी कृपा करके उस विष का पान किया। विषपान करने से आपके कंठ में नीला चिन्ह हो गया और आप नीलकंठ कहलाये। परंतु हे प्रभु, क्या ये आपको कुरूप बनाता है? कदापि नहीं, ये तो आपकी शोभा को और बढ़ाता है। जो व्यक्ति औरों के दुःख दूर करता है उसमें अगर कोई विकार भी हो तो वो पूजा पात्र बन जाता है।। १४ ।।

असिद्धार्था नैव क्वचिदपि सदेवासुरनरे। निवर्तन्ते नित्यं जगति जयिनो यस्य विशिखाः।। स पश्यन्नीश त्वामितरसुरसाधारणमभूत्। स्मरः स्मर्तव्यात्मा न हि वशिषु पथ्यः परिभवः।। १५।।

अर्थ:

हे प्रभु ! कामदेव के वार से कभी कोई भी नहीं बच सका चाहे वो मनुष्य हों, देव या दानव हो। पर जब कामदेव ने आपकी शक्ति समझे बिना आप की ओर अपने पुष्प बाण को साधा तो आपने उसे तत्क्षण ही भस्म कर दिया। यह जगत प्रसिद्ध है कि श्रेष्ठ जनों के अपमान का परिणाम हितकर नहीं होता।। १५ ।।

मही पादाघाताद्व्रजति सहसा संशयपदम्। पदं विष्णोर्भ्राम्यद्भुजपरिघरुग्णग्रहगणम्॥ मुहुर्योदौस्थ्यं यात्यनिभृतजटाताडिततटा। जगद्रक्षायै त्वं नटसि ननु वामैव विभुता॥ १६ ॥

अर्थ:

हे नटराज !!! जब संसार के कल्याण हेतु आप तांडव करने लगते हैं तब समग्र सृष्टि भय के मारे कांप उठती है, आपके पद प्रहार से पृथ्वी अपना अंत समीप देखती है ग्रह नक्षत्र भयभीत हो उठते हैं। आपकी जटा के स्पर्श मात्र से स्वर्ग लोग व्याकुल हो उठता है और आपकी भुजाओं के बल से वैकुंठ में खलबली मच जाती है। हे महादेव ! आश्चर्य ही है कि आपका बल अतिशय कष्टप्रद है॥ १६ ॥

वियद्व्यापीतारागणगुणितफेनोद्गमरुचिः। प्रवाहो वारां यः पृषतलघुदृष्टः शिरसि ते॥ जगद्वीपाकारं जलधिवलयं तेन कृतमिति। त्यनेनैवोन्नेयं धृतमहिमदिव्यं तव वपुः।। १७ ।।

अर्थ:

हे शिव! गंगा नदी जब मंदाकिनी के नाम से स्वर्ग से उतरती है तब नभोमंडल में चमकते हुए सितारों की वजह से उसका प्रवाह अत्यंत आकर्षक दिखाई देता है, मगर आपके सिर पर सिमट जाने के बाद तो वह एक बिंदु समान दिखाई पड़ता है। बाद में जब गंगा जी आपकी जटा से निकलती है और भूमि पर बहने लगती है तब बड़े-बड़े द्वीपों का निर्माण करती है। ये आपके दिव्य और महिमावान स्वरूप का ही परिचायक है।। १७ ।।

रथः क्षोणी यन्ता शतधृतिनगेन्द्रो धनुरथा। रथांगेचन्द्राकौं रथचरणपाणिः शर इति॥ दिधक्षोस्ते कोऽयं त्रिपुरतृणमाडम्बर विधिः। विधेयैः क्रीडन्त्यो न खलु परतन्त्राः प्रभुधियः।। १८।।

अर्थ:

हे शिव! आपने (तारकासुर के पुत्रों द्वारा रचित) तीन नगरों का विध्वंस करने हेतु पृथ्वी को रथ, ब्रह्मा को सारथी, सूर्य चन्द्र को दो पहिये मेरु पर्वत का धनुष बनाया और विष्णु जी का बाण लिया। हे शम्भू ! इस वृहद प्रयोजन की क्या आवश्यकता थी? आपके लिए तो संसार मात्र का विलय करना अत्यंत ही छोटी बात है। आपको किसी सहायता की क्या आवश्यकता? आपने तो केवल (अपने नियंत्रण में रही) शक्तियों के साथ खेल किया था, लीला की थी।। १८ ।।

हरिस्ते साहस्त्र कमलबलिमाधाय पदयो। र्यदेकोने तस्मिन्निजमुदहर कमलम्। गतो भक्त्युद्रेकः परिणतिमसौ चक्रवपुषा।। त्रयाणां रक्षायं त्रिपुरहर जागति जगताम् ॥१९॥

अर्थ:

हे शिव! जब भगवान विष्णु ने आपकी सहस्र कमलों (एवं सहस्त्र नामों) द्वारा पूजा प्रारम्भ की तो उन्होंने एक कमल कम पाया। तब भक्ति भाव से विष्णु जी ने अपनी एक आँख को कमल के स्थान पर अर्पित कर दिया। उनकी ऐसी अदम्य भक्ति ने सुदर्शन चक्र का स्वरूप धारण कर लिया जिसे भगवान विष्णु संसार रक्षार्थ उपयोग करते हैं। हे प्रभु, आप तीनो लोक (स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल) की रक्षा के लिए सदैव जागृत रहते हो।। १९।।

क्रतौ सुप्ते जाग्रत्त्वमसि फलयोगे क्रतुमताम् । क्व कर्म प्रध्वस्तं फलतिपुरुषाराधनमृते ॥ अतस्त्वां सम्प्रेक्ष्य क्रतुषु फलदानप्रतिभुवम् । श्रुतौ श्रद्धां बद्ध्वा दृढपरिकरः कर्मसु जनः ॥ २० ॥

अर्थ:

हे शिव! यज्ञ की समाप्ति होने पर आप यज्ञकर्ता को उसका फल देते हो। आपकी उपासना और श्रद्धा बिना किया गया कोई कर्म फलदायी नहीं होता। यही वजह है कि वेदों में श्रद्धा रखके और आपको फल दाता मानकर हर कोई अपने कार्यों का शुभारंभ करते है॥ २० ॥

क्रियादक्षो दक्षः क्रतुपतिरधीशस्तनुभृतां। सृवीणामात्विज्यं शरणद सदस्याः सुरगणाः।। क्रतुन षस्त्वत्तः क्रतुफल विधानव्यसनिनो। ध्रुवं कर्तुः श्रद्धाविधुरमभिचाराय हि मखाः ॥ २१॥

अर्थ:

हे प्रभु ! यद्यपि आपने यज्ञ कर्म और फल का विधान बनाया है तद्यपि जो यज्ञ शुद्ध विचारों और कर्मो से प्रेरित न हो और आपकी अवहेलना करने वाला हो उसका परिणाम कदाचित विपरीत और अहितकर ही होता है इसलिए दक्ष प्रजापति के महायज्ञ यज्ञ को जिसमें स्वयं ब्रह्मा तथा अनेकानेक देवगण तथा ऋषि-मुनि सम्मिलित हुए, आपने नष्ट कर दिया क्योंकि उसमें आपका सम्मान नहीं किया गया। सचमुच, भक्ति के बिना किये गये यज्ञ किसी भी यज्ञकर्ता के लिए हानिकारक सिद्ध होते है ।। २१ ।।

प्रजानाथं नाथ प्रसभमभिकं स्त्वां दुहितरम्। गतं रोहिद्भूतां रिरमयिषुमृष्यस्य वपुषा।। धनुः पाणेर्यातं दिवमपि सपत्नाकृतममुम्। त्रसन्तन्तेऽद्यापि त्यजति न मृगव्याधरभसः ॥२२॥

अर्थ:

हे शिव! काल से प्रेरित मृग रूप धारण किये ब्रह्मा को भय से मृगी रूप धारण करने वाली अपनी कन्या में आसक्त देख, आपका उनके पीछे छोड़ा गया बाण आर्द्रा आज भी नक्षत्र रूप में मृगशिरा (ब्रह्मा) के पीछे वर्तमान है ।। २२ ।।

स्वलावण्याशंसा धृतधनुषमह वाय तृणवत्। पुरः प्लुष्टं दृष्ट्वापुरमथन पुष्पायुधमपि॥ यदिस्त्रैणं देवो यमनिरतदेहार्ध-घटनाद्। अवैति त्वामद्धावत वरद मुग्धा युवतयः॥२३॥

अर्थ:

हे शिव! हे त्रिपुरा नाशक ! जब कामदेव ने आपकी तपश्चर्या में बाधा डालनी चाही और आपके मन में पार्वती के प्रति मोह उत्पन्न करने की कोशिश की, तब आपने कामदेव को तृणवत् भस्म कर दिया। अगर तत्पश्चात् भी पार्वती ये समझती है कि आप उन पर मुग्ध है क्योंकि आपके शरीर का आधा हिस्सा उनका है, तो ये उनका भ्रम होगा। सच पूछो तो हर युवती अपनी सुंदरता पर मुग्ध होती है।। २३ ।।

श्मशानेष्वाक्रीडा स्मरहर पिशाचाः सहचराः। चिता-भस्मालेपः स्रगपि नृकरोटी-परिकरः।। अमंगल्यं शीलं तव भवतु ना मैवमखिलम्। तथापि स्मर्तॄणां वरद परमं मंगलमसि।। २४।।

अर्थ:

हे भोलेनाथ !!! आप श्मशान में रमण करते हैं, भूत - प्रेत आपके मित्र हैं, आप चिता भस्म का लेप करते हैं तथा मुंडमाला धारण करते हैं। ये सारे गुण ही अशुभ एवं भयावह जान पड़ते हैं। तब भी हे श्मशान निवासी ! उन भक्तों जो आपका स्मरण करते है, आप सदैव शुभ और मंगल करते है।।२४।।

मनः प्रत्यविचत्त सविधमवधायात्तमरुतः। प्रहष्यद्रोमाणः प्रमदसलिल्लोत्संगितदृशः।। यदालोक्याह लावं ह्रद इव निमज्ज्यामृतमये। यधत्यन्तस्तत्त्वं किमपि यमिनस्तत्किल भवान् ॥ २५॥

अर्थ:

हे शिव! जिस प्रकार अमृतमय सरोवर में अवगाहन से (स्नान करने से) प्राणिमात्र तापत्रय से मुक्त हो जाते हैं, उसी प्रकार इन्द्रियों से पृथक करके मन को स्थिर कर विधिपूर्वक प्राणायाम से पुलकित तथा आनन्दाश्र से युक्त योगीजन ज्ञान दृष्टि से जिसे देखकर परमानंद का अनुभव करते हैं, वह आप ही हैं ।। २५ ।।

त्वमर्कस्त्वं सोमस्त्वमसि पवनस्त्वंहुतवह। स्त्वमापरत्वं व्योमत्वमुधरणिरात्मा त्वमिति च ॥ परिच्छिन्नामेवं त्वयि परिणता ब्रिभ्रतिगिरम्। न विद्मस्तत्तत्वंवयमिह तु यत्त्वं न भवसि ॥ २६॥

अर्थ:

हे शिव! आप ही सूर्य, चन्द्र, धरती, आकाश, अग्नि, जल एवं वायु हैं। आप ही आत्मा भी हैं। हे देव ! मुझे ऐसा कुछ भी ज्ञात नहीं जो आप न हों ।। २६ ।।

त्रयीं तिस्रो वृत्तिस्त्रि भुवनमथोत्रीनपिसुरां। नकाराद्यं र्वर्णैस्त्रिभिरभिदधत्तीर्णविकृतिः।। तुरीयं ते धाम ध्वनिभिरवरुन्धानमणुभिः। समस्तं व्यस्तं त्वां शरणद गृणात्योमिति पदम् ॥ २७ ॥

अर्थ:

हे शिव! ॐ शब्द अ, ऊ, म से बना है। ये तीन शब्द तीन लोक – स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल; तीनों देव – ब्रह्मा, विष्णु और महेश तथा तीन अवस्था – स्वप्न, जागृति और सुषुप्ति के द्योतक है। लेकिन जब पूरी तरह से ॐ कार का ध्वनि निकलता है तो ये आपके तुरीय पद (तीनों से पर) को अभिव्यक्त करता है॥ २७ ॥

भवः शर्वो रुद्रः पशुपतिरथोग्रः सह महां स्तथा। भीमेशानाविति यदभिधानाष्टकमिदम् ॥ अमुष्मिन्प्रत्येकं प्रविचरति देवः श्रुतिरपि। प्रियायास्मैधाम्नेप्रणिहितनमस्योऽस्मि भवते ॥ २८ ॥

अर्थ:

हे शिव! हे शिव ! वेद एवं देवगण आपकी इन आठ नामों से वंदना करते हैं – भव, सर्व, रूद्र , पशुपति, उग्र, महादेव, भीम, एवं इशान। हे शम्भू ! मैं भी आपकी इन नामों की भावपूर्वक स्तुति करता हूं॥२८॥

नमोनेदिष्ठाय प्रियदव दविष्ठाय च नमो। नमः क्षोदिष्ठाय स्मरहर महिष्ठाय च नमः॥ नमो वर्षिष्ठाय त्रिनयन यविष्ठाय च नमो। नमः सर्वस्मै ते तदिदमिति शर्वाय च नमः ॥२९॥

अर्थ:

हे एकांतप्रिय प्रभु ! आप सब से दूर हैं फिर भी सब के पास है। हे कामदेव को भस्म करने वाले प्रभु ! आप अति सूक्ष्म है फिर भी विराट है। हे तीन नेत्रों वाले प्रभु ! आप वृद्ध है और युवा भी है। हे महादेव ! आप सब में है फिर भी सब से पर है। आपको मेरा प्रणाम है ।।२९।।

बहुलरजसे विश्वोत्पत्तौ भवाय नमो नमः । प्रबलतम से तत्संहारे हराय नमो नमः ॥ जनसुखकृते सत्त्वोद्रिक्तौमृडाय नमो नमः । प्रमहसि पदे निस्त्रैगुण्ये शिवाय नमो नमः ॥३०॥

अर्थ:

हे प्रभु ! मैं आपको रजोगुण से युक्त सृजनकर्ता जान कर आपके ब्रह्म स्वरूप को नमन करता हूं। तमोगुण को धारण करके आप जगत का संहार करते हो, आपके उस रुद्र स्वरूप को मैं नमन करता हूं। सत्वगुण धारण करके आप लोगों के सुख के लिए कार्य करते हो, आपके उस विष्णु स्वरूप को नमस्कार है। इन तीनों गुणों से पर आपका त्रिगुणातीत स्वरूप है, आपके उस शिव स्वरूप को मेरा नमस्कार है।। ३० ।।

कृशपरिणतिचेतः क्लेशवश्वं क्व चेदम् । क्व च तव गुणसीमोल्लङ् घिनीशश्ववृद्धिः।। इति चकितममन्दीकृत्य मां भक्तिराधाद्। वरद चरणयोस्ते वाक्य-पुष्पोपहारम्।। ३१।।

अर्थ:

हे वरदाता (शिव) ! मेरा मन शोक, मोह और दुःख से संतप्त तथा क्लेश से भरा पड़ा है। मैं दुविधा में हूं कि ऐसे भ्रमित मन से मैं आपके दिव्य और अपरंपार महिमा का गान कैसे कर पाउंगा ? फिर भी आपके प्रति मेरे मन में जो भाव और भक्ति है उसे अभिव्यक्त किये बिना मैं नहीं रह सकता। अतः ये स्तुति की माला आपके चरणों में अर्पित करता हूं॥ ३१ ॥

असितगिरिसमं स्यात् कज्जलं सिन्धुपात्रे । सुर-तरुवर-शाखा लेखनी पत्रमुर्वी।। लिखति यदि गृहीत्वा शारदा सर्वकालं। तदपि तव गुणानामीश पारं न याति।। ३२।।

अर्थ:

हे शिव! यदि समुद्र को दवात बनाया जाए, उसमें काले पर्वत की स्याही डाली जाय, कल्पवृक्ष के पेड़ की शाखा को लेखनी बनाकर और पृथ्वी को कागज बनाकर स्वयं ज्ञान स्वरूपा माँ सरस्वती दिनरात आपके गुणों का वर्णन करें तो भी आप के गुणों की पूर्णतया व्याख्या करना संभव नहीं है॥३२॥

असुरसुरमुनीन्द्रं रचितस्येन्दुमौले। ग्रंथित गुणमहिम्नो निर्गुणस्येश्वरस्य। सकलगुणवरिष्ठः पुष्पदन्ताभिधानो।। रुचिरमलघुवृत्तेः स्तोत्रमेतच्चकार ॥३३॥

अर्थ:

हे प्रभु ! आप सुर, असुर और मुनियों के पूजनीय है, आपने मस्तक पर चंद्र को धारण किया है, और आप सभी गुणों से परे है। आपकी इसी दिव्य महिमा से प्रभावित होकर मैं, पुष्पदंत गंधर्व, आपकी स्तुति करता हूं।। ३३ ।।

अहरहरनवद्य धूर्जटेः स्तोत्रमेतत्। पठति परमभक्त्या शुद्धचित्तः पुमान्य:।। स भवति शिवलोके रुद्रतुल्यस्तथाऽत्र। प्रचुरतरधनायुः पुत्रवान्कीर्तिमांश्च ॥३४॥

अर्थ:

पवित्र और भक्ति भावपूर्ण हृदय से जो मनुष्य इस स्तोत्र का नित्य पाठ करेगा, तो वो पृथ्वीलोक में अपनी इच्छा के अनुसार धन, पुत्र, आयुष्य और कीर्ति को प्राप्त करेगा। इतना ही नहीं, देहत्याग के पश्चात् वो शिवलोक में गति पाकर शिवतुल्य शांति का अनुभव करेगा। शिवमहिम्न स्तोत्र के पठन से उसकी सभी लौकिक व पारलौकिक कामनाएँ पूर्ण होंगी ॥३४॥

महेशान्नापरो देवो महिम्नो नापरा स्तुतिः। अघोरान्नापरो मन्त्रो नास्ति तत्त्वं गुरोः परम् ॥३५॥

अर्थ:

शिव से श्रेष्ठ कोई देव नहीं, शिवमहिम्न स्तोत्र से श्रेष्ठ कोई स्तोत्र नहीं है, भगवान शंकर के नाम से अधिक महिमावान कोई मंत्र नहीं है और ना ही गुरु से बढ़कर कोई पूजनीय तत्व ॥३५॥

दीक्षादानं तपस्तीर्थं ज्ञानं यागादिकाः क्रियाः। महिम्नस्तव पाठस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम् ॥ ३६॥

अर्थ:

शिवमहिम्न स्तोत्र का पाठ करने से जो फल मिलता है वो दीक्षा या दान देने से, तप करने से, तीर्थाटन करने से, शास्त्रों का ज्ञान पाने से तथा यज्ञ करने से कहीं अधिक है।। ३६ ।।

कुसुमदशननामा सर्वगन्धर्वराजः। शशिधरवरमौलेर्देवदेवस्य दासः।। स खलु निजमहिम्नो भ्रष्ट एवास्य रोषात्। स्तवनमिदमकार्षीवृदिव्यदिव्यं महिम्नः ।।३७।।

अर्थ:

सभी गंधर्वों के राजा पुष्पदंत भाल में चन्द्रमा को धारण करने वाले देवाधिदेव महादेव जी के दास थे। वे सुरगुरु महादेव जी के क्रोध से अपनी महिमा से भ्रष्ट हुए, तब उन्होंने शिवजी की प्रसन्नता के लिए इस परम दिव्य शिवमहिम्न स्तोत्र को बनाया ॥ ३७ ॥

सुरवरमुनिपूज्यं स्वर्गमोक्षैकहेतुम्। पठति यदि मनुष्यः प्राञ्जलिर्नान्यचेतः।। ग्रजति शिवसमीपं किन्नरैः स्तूयमानः। स्तवनमिदममोघं पुष्पदन्तप्रणीतम् ॥३८॥

अर्थ:

जो मनुष्य अपने दोनों हाथों को जोड़कर, भक्ति भावपूर्ण, इस स्तोत्र का पठन करेगा, तो वह स्वर्ग-मुक्ति देने वाले, देवता और मुनियों के पूज्य तथा किन्नरों के प्रिय ऐसे भगवान शंकर के पास अवश्य जायेगा। पुष्पदंत द्वारा रचित यह स्तोत्र अमोघ और निश्चित फल देने वाला है ॥३८॥

आसमाप्त मिदं स्तोत्रं पुण्यं गन्धर्व-भाषितम् । अनौपम्यं मनोहारि सर्व मीश्वर वर्णनम् ।।३९।।

अर्थ:

पुष्पदंत गंधर्व द्वारा रचित, भगवान शिव के गुणानुवाद से भरा, मनमोहक, अनुपम और पुण्य प्रदायक स्तोत्र यहाँ पर संपूर्ण होता है ।।३९।।

इत्येषा वाङ्मयी पूजा श्रीमच्छङ्कर-पादयोः । अर्पिता तेन देवेशः प्रीयतां मे सदाशिवः ।।४०।।

अर्थ:

हे प्रभु ! वाणी के माध्यम से की गई मेरी यह पूजा आपके चरण कमलों में सादर अर्पित है। कृपया इसका स्वीकार करें और आपकी प्रसन्नता मुझ पर बनाए रखें ।।४०।।

तव तत्त्वं न जानामि कीदृशोऽसि महेश्वर । यादृशोऽसि महादेव तादृशाय नमो नमः ।।४१।।

अर्थ:

हे शिव ! हे महेश्वर ! मैं आपके वास्तविक स्वरूप को नहीं जानता। लेकिन आप जैसे भी है, जो भी है, मैं आपको प्रणाम करता हूं ।।४१।।

एककालं द्विकालं वा त्रिकालं यः पठेन्नरः । सर्वपाप-विनिर्मुक्तः शिव लोके महीयते ।।४२।।

अर्थ:

जो इस स्तोत्र का दिन में एक, दो या तीन बार पाठ करता है वह सर्व प्रकार के पाप से मुक्त हो जाता है तथा शिव लोक को प्राप्त करता है ।।४२।।

श्री पुष्पदन्त-मुख-पङ्कज-निर्गतेन । स्तोत्रेण किल्विष-हरेण हर-प्रियेण ।। कण्ठस्थितेन पठितेन समाहितेन । सुप्रीणितो भवति भूतपतिर्महेशः ।।४३।।

अर्थ:

पुष्पदंत के मुख पंकज से उदित, पाप का नाश करने वाले, भगवान शंकर की अति प्रिय यह स्तुति का जो पठन करेगा, गान करेगा या उसे सिर्फ अपने स्थान में रखेगा, तो भोलेनाथ शिव उन पर अवश्य प्रसन्न होंगे ।।४३।।

शिवमहिम्न स्तोत्र भगवान शिव को बहुत ही प्रिय है। जो भी इस स्तोत्र का पूरे विधि-विधान से पाठ करता है, वह इस मृत्युलोक में धन, वैभव और यश को प्राप्त करता है और मृत्यु के बाद शिवलोक जाता है। शिवमहिम्न स्तोत्र का पाठ बहुत ही लाभदायक बताया गया है। कहते हैं, उन्नीसवीं शताब्दी के प्रसिद्ध संत श्री रामकृष्ण इस स्तोत्र का पाठ करते हुए समाधि में चले गए थे। शिवमहिम्न स्तोत्र में कुल 43 श्लोक हैं।

**।। इति श्री पुष्पदंत विरचितं शिवमहिम्नः स्तोत्रं समाप्तम् ।। **

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