
यहां जानिए पोंगल पर्व पर सूर्य देव, गाय और प्रकृति की पूजा क्यों की जाती है।
पोंगल पर्व में पूजा का विशेष महत्व होता है, जिसमें सूर्य देव और प्रकृति की आराधना की जाती है। इस दिन नई फसल से बने अन्न को अर्पित कर सुख-समृद्धि की कामना की जाती है। इस लेख में जानिए पोंगल में की जाने वाली पूजा विधि और उसका धार्मिक महत्व।
मकर संक्रांति के अवसर पर दक्षिण भारत के कई राज्यों में पोंगल पर्व श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाता है। यह त्योहार 14 जनवरी के आसपास आता है और विशेष रूप से तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में बड़े धूमधाम से मनाया जाता है।
जब सूर्य उत्तरायण होते हैं, तब उत्तर भारत में मकर संक्रांति या खिचड़ी का पर्व मनाया जाता है, वहीं दक्षिण भारत में इसी शुभ अवसर पर पोंगल मनाया जाता है। फसल कटाई के बाद किसान अपनी खुशी और संतोष को प्रकट करने के लिए यह पर्व मनाते हैं। इस दिन सूर्य देव, वर्षा के देवता इंद्र देव, पृथ्वी माता तथा खेती में सहायक पशुधन (गाय-बैल) की विशेष पूजा की जाती है।
पोंगल के पहले दिन वर्षा के देवता इंद्र देव की विशेष पूजा की जाती है।
इस दिन को भोगी पोंगल कहा जाता है, जो पोंगल पर्व की शुरुआत का प्रतीक है।
इंद्र देव को वर्षा, जल और समृद्धि का देवता माना जाता है, इसलिए अच्छी वर्षा और भरपूर फसल के लिए उनका आभार व्यक्त किया जाता है। लोग सुख-शांति, खुशहाली और समृद्ध जीवन की कामना करते हैं।
इस दिन पुराने और बेकार सामानों को एकत्र कर भोगी की अग्नि जलाई जाती है, जो पुराने नकारात्मक विचारों को त्यागने और नए जीवन की शुरुआत का संकेत है।
अग्नि के चारों ओर लोग गीत गाते हैं, नृत्य करते हैं और उल्लासपूर्वक उत्सव मनाते हैं।
भोगी पोंगल हमें यह सिखाता है कि पुराने को छोड़कर नए, सकारात्मक और शुभ कार्यों की ओर बढ़ना चाहिए।
पोंगल का दूसरा दिन थाई पोंगल या सूर्य पोंगल कहलाता है, जिसमें सूर्य देव की पूजा की जाती है।
इस दिन मुख्य रूप से सूर्य देव की पूजा की जाती है, क्योंकि वे जीवन, ऊर्जा और कृषि के आधार माने जाते हैं।
सूर्य के उत्तरायण होने पर उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त की जाती है और सुख-समृद्धि की कामना की जाती है।
थाई पोंगल के अवसर पर माता लक्ष्मी की भी पूजा की जाती है, जो धन, समृद्धि और खुशहाली की देवी हैं।
इस दिन दूध, चावल और गुड़ से बनी विशेष पोंगल खीर तैयार की जाती है।
जब खीर उबलकर बाहर आती है, तो उसे शुभता और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है।
इस पवित्र व्यंजन को सूर्य देव को अर्पित कर परिवार के सभी सदस्य प्रसाद ग्रहण करते हैं।
थाई पोंगल हमें कर्म, आभार और सकारात्मक ऊर्जा का महत्व सिखाता है।
पोंगल पर्व का तीसरा दिन मट्टू पोंगल के रूप में मनाया जाता है।
इस दिन पशुधन, विशेष रूप से गाय और बैल की पूजा की जाती है, क्योंकि वे कृषि कार्यों और फसल उत्पादन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
किसान अपने खेतों में सहायता करने वाले इन पशुओं के प्रति आभार और सम्मान प्रकट करते हैं।
गाय-बैल को स्नान कराकर साफ किया जाता है और उनके सींगों को रंगों से सजाया जाता है।
उन्हें फूलों की मालाएँ पहनाई जाती हैं और विशेष भोजन खिलाया जाता है।
इस दिन मट्टू, यानि बैल की विशेष रूप से पूजा की जाती है।
मट्टू पोंगल यह संदेश देता है कि प्रकृति और पशुधन के बिना कृषि अधूरी है, इसलिए उनका सम्मान करना हमारा कर्तव्य है।
पोंगल पर्व का चौथा और अंतिम दिन कन्नुम पोंगल या कानू पोंगल कहलाता है।
इस दिन को कई स्थानों पर कन्या पोंगल के रूप में भी मनाया जाता है।
कन्नुम पोंगल के दिन कन्याओं की पूजा और सम्मान किया जाता है, जिसे शुभ और मंगलकारी माना जाता है।
घरों को फूलों और हरे पत्तों से सजाया जाता है और आंगन और घर के मुख्य द्वार पर सुंदर रंगोली बनाई जाती है जिससे वातावरण पवित्र और आनंदमय बनता है।
, इसके बाद कन्या पूजन किया जाता है और उन्हें उपहार व प्रसाद दिया जाता है।
लोग एक-दूसरे को पोंगल की शुभकामनाएँ देते हैं और सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।
यह दिन परिवार, प्रेम, सम्मान और सामाजिक सौहार्द का संदेश देता है।
पोंगल हमें यह संदेश देता है कि मानव जीवन प्रकृति, सूर्य, वर्षा और पशुओं पर निर्भर है। इसलिए इस पर्व के माध्यम से लोग इन सभी शक्तियों के प्रति आभार व्यक्त करते हैं और आने वाले समय में सुख, समृद्धि और अच्छी फसल की कामना करते हैं।
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