
जानिए जल्लीकट्टू का इतिहास, महत्व, प्रक्रिया और यह तमिलनाडु में क्यों और कैसे मनाया जाता है।
भारत में अलग-अलग धर्मों की तरह त्योहार भी विविध हैं। इन्हीं में से एक प्रमुख पर्व है पोंगल, जो तमिलनाडु में मनाया जाता है। इस पर्व के साथ एक विशेष पारंपरिक महोत्सव जल्लिकट्टू भी आयोजित किया जाता है। यह कोई धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि एक पारंपरिक खेल है, जिसमें बैल या सांड को काबू में करने की कोशिश की जाती है। आइए जानते हैं जल्लिकट्टू से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियां।
जल्लीकट्टू महोत्सव को समझने के लिए सबसे पहले इसके शब्दार्थ को जानना जरूरी है। जानकारी के अनुसार, जल्ली का अर्थ होता है सिक्का, जबकि कट्टू का अर्थ होता है बांधना। यानी सांड के सींग पर सिक्कों या उपहारों को बांधना। जल्लीकट्टू को तमिल भाषा में एरुथाझुवुथल भी कहा जाता है, जिसका अर्थ है सांड को गले लगाना। इसके अलावा, इसे मंजू विरट्टू भी कहा जाता है, जिसका मतलब होता है सांड का पीछा करना।
दरअसल जल्लीकट्टू बैलों या सांडों से जुड़ा एक पारंपरिक खेल है। इसमें विशेष रूप से पाले गए सांडों के सींगों पर कपड़ा या इनाम बांधा जाता है। खेल में भाग लेने वाले प्रतिभागी सांड को काबू में करके उसके सींग पर बंधे कपड़े को निकालने की कोशिश करते हैं। जो प्रतिभागी लंबे समय तक सांड के कूबड़ को पकड़े रखने में सफल होता है और इनाम निकाल लेता है, उसे विजेता घोषित किया जाता है। यह खेल शारीरिक बल, संतुलन और साहस की परीक्षा होता है।
बात करें इस खेल के इतिहास की तो जानकारी के अनुसार, यह खेल प्राचीन तमिल समुदाय अय्यर लोगों में प्रचलित था, जो मुल्लै क्षेत्र में निवास करते थे। सिंधु घाटी सभ्यता से प्राप्त एक मुहर में भी इस खेल का चित्र मिलता है, जिसे राष्ट्रीय संग्रहालय, नई दिल्ली में संरक्षित किया गया है। मदुरै के पास लगभग 2500 साल पुराने गुफा चित्रों में भी एक व्यक्ति को सांड को नियंत्रित करते हुए दिखाया गया है, जो इसकी प्राचीनता को प्रमाणित करता है।
आखिर बैलों या सांडों को पकड़ने वाला जल्लीकट्टू क्यो मनाया जाता हो तो इसको मनाने का एक बड़ा कारण कृषि से जुड़ा हुआ भी बताया जाता है। ऐसा कहा जाता है कि पोंगल फसल कटाई का पर्व है और खेती में बैलों की भूमिका बेहद अहम रही है। इस खेल के माध्यम से बैलों के संरक्षण और उनके महत्व को दर्शाया जाता था। इससे किसानों में अपने मवेशियों के प्रति सम्मान और देखभाल की भावना विकसित होती है।
जल्लीकट्टू का आयोजन मुख्य रूप से पोंगल पर्व के दौरान मट्टू पोंगल के दिन किया जाता है। यह महोत्सव तमिलनाडु में सबसे अधिक लोकप्रिय है, खासकर मदुरै, पलानी, तिरुचिरापल्ली, सिवगंगई जैसे क्षेत्रों में। इसके अलावा यह महाराष्ट्र और कर्नाटक के कुछ हिस्सों में भी जाना-पहचाना जाता है।
तमिलनाडु की संस्कृति में जल्लीकट्टू का विशेष स्थान है। इसे वीरता और पुरुषार्थ का प्रतीक माना जाता है। जानकारी के अनुसार, कई तमिल सिनेमा में नायकों को अपनी बहादुरी साबित करने के लिए सांडों से लड़ते हुए दिखाया गया है।
जल्लीकट्टू मुख्य रूप से तीन प्रकार से खेला जाता है। पहला वती विरट्टू, जिसमें सांड को बाड़े से छोड़ा जाता है और निश्चित समय में पकड़ने वाले को पुरस्कार मिलता है। दूसरा वेली विरट्टू, जिसमें सांड को खुले मैदान में छोड़ा जाता है और उसे वश में करने वाले प्रतिभागी विजेता होते हैं। तीसरा वातं मंजूविरट्टू, जिसमें सांड को लंबी रस्सी से बांधकर टीम के रूप में नियंत्रित किया जाता है।
जल्लीकट्टू खेलने के लिए कई नियम निर्धारित हैं। प्रतिभागी को केवल सांड के कूबड़ को पकड़कर उसे नियंत्रित करना होता है। पूंछ या सींग को नुकसान पहुंचाना गलत माना जाता है। इसके अलावा सांड को निर्धारित समय में काबू में करना जरूरी होता है, अन्यथा प्रतिभागी को हारा हुआ माना जाता है।
जल्लीकट्टू में विजेताओं को आकर्षक पुरस्कार दिए जाते हैं। इनमें कार, मोटरसाइकिल, साइकिल, सोने-चांदी के सिक्के और घरेलू उपयोग के सामान शामिल होते हैं। कई आयोजनों में दो कार, दस मोटरसाइकिल, सैकड़ों साइकिल और अन्य मूल्यवान उपहार दिए जाते हैं, जिससे प्रतिभागियों में उत्साह बना रहता है।
वहीं, कुछ वर्षों पहले जल्लीकट्टू को लेकर विवाद भी सामने आया। आरोप लगे कि खेल से पहले सांडों के साथ क्रूरता की जाती है, जैसे सांडो को शराब पिलाना आदि। इस मुद्दे को लेकर पशु अधिकार संगठन द्वारा सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई थी, जिसके बाद कुछ समय के लिए इस पर रोक लगी। बाद में नियमों और सुरक्षा मानकों के साथ जल्लीकट्टू को फिर से अनुमति दे दी गई।
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