पितृ पक्ष में जल तर्पण कैसे करें?
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पितृ पक्ष में जल तर्पण कैसे करें?

क्या आप जानते हैं पितृ पक्ष में जल तर्पण की सही विधि क्या है? जानें इसका महत्व, करने की प्रक्रिया और पितरों को प्रसन्न करने के लिए आवश्यक नियम।

जल तर्पण के बारे में

जल तर्पण एक वैदिक अनुष्ठान है, जिसमें शुद्ध जल अर्पित करके देवताओं, ऋषियों और पितरों का स्मरण तथा सम्मान किया जाता है। यह क्रिया कृतज्ञता, श्रद्धा और संतोष की अभिव्यक्ति मानी जाती है। श्राद्ध कर्म में तर्पण का अत्यधिक महत्व माना गया है। यह वह विधि है जिसके माध्यम से व्यक्ति अपने पितरों को जल अर्पित करता है और उनकी आत्मा की शांति और तृप्ति के लिए प्रार्थना करता है। जब कोई व्यक्ति श्रद्धा और भाव से तर्पण करता है तो पितर प्रसन्न होकर अपने वंशजों को सुख, शांति और आशीर्वाद प्रदान करते हैं।

जल तर्पण क्या है?

ब्रह्मवैवर्त पुराण में तर्पण के महत्व को अत्यंत सुंदर ढंग से समझाया गया है। इसमें कहा गया है कि जैसे वर्षा का जल अलग-अलग स्थानों पर गिरकर अलग-अलग रूप धारण करता है। वही जल जब सीप में गिरता है तो मोती बन जाता है, केले के तने में पहुँचता है तो कपूर का रूप ले लेता है, खेत में गिरता है तो अन्न उत्पन्न करता है और धूल या मिट्टी में गिरने से कीचड़ बन जाता है। अर्थात जल का परिणाम उस स्थान के अनुसार बदल जाता है जहाँ वह पहुँचता है।

  • जल तर्पण एक वैदिक विधि है जिसमें जल अर्पित कर देवताओं, ऋषियों और पितरों का स्मरण किया जाता है।
  • ‘तर्पण’ का अर्थ होता है 'तृप्त करना या संतुष्ट करना'।
  • यह अनुष्ठान कृतज्ञता, आभार और श्रद्धा प्रकट करने का प्रतीक है।

जल तर्पण का महत्व

  • जल तर्पण करने से हमारे पूर्वजों की आत्मा को शांति मिलती है।
  • इसे करने से पितर प्रसन्न होकर आशीर्वाद प्रदान करते हैं।
  • इससे परिवार में सुख, समृद्धि और सौभाग्य बना रहता है।
  • इसका विशेष महत्व श्राद्ध, पितृ पक्ष, अमावस्या और संक्रांति पर होता है।

जल तर्पण का सही समय और स्थान

जल तर्पण का सही समय

1. प्रातःकाल का महत्व

जल तर्पण करने का सर्वश्रेष्ठ समय सुबह सूर्योदय के बाद का होता है। माना जाता है कि इस समय वातावरण सबसे शुद्ध और ऊर्जा से भरपूर होता है। प्रातःकाल जल अर्पित करने से पितरों, देवताओं और ऋषियों तक श्रद्धा और तृप्ति का संदेश शीघ्र पहुँचता है।

2. विशेष तिथियाँ और अवसर

यद्यपि जल तर्पण किसी भी दिन किया जा सकता है, लेकिन अमावस्या, संक्रांति, पितृ पक्ष और श्राद्ध के दिनों में इसका महत्व कई गुना बढ़ जाता है। इन दिनों तर्पण करने से पितर विशेष रूप से प्रसन्न होते हैं और आशीर्वाद प्रदान करते हैं।

3. दिशा का महत्व

तर्पण करते समय दिशा का ध्यान रखना बहुत आवश्यक है। देवताओं के लिए तर्पण: पूर्व दिशा की ओर मुख करके। ऋषियों के लिए तर्पण: उत्तर दिशा की ओर मुख करके। पितरों के लिए तर्पण: दक्षिण दिशा की ओर मुख करके।

जल तर्पण का सही स्थान

1. नदियाँ और तीर्थ स्थल

जल तर्पण का श्रेष्ठ स्थान पवित्र नदियाँ जैसे गंगा, यमुना, नर्मदा, गोदावरी आदि मानी गई हैं। इसके अतिरिक्त तीर्थ स्थल, सरोवर या कुएँ पर किया गया तर्पण भी अत्यंत शुभ फलदायी होता है।

2. घर पर जल तर्पण

यदि नदियों या तीर्थों तक पहुँचना संभव न हो, तो घर में भी जल तर्पण किया जा सकता है। इसके लिए आँगन, बगीचे या खुले आकाश के नीचे स्वच्छ स्थान चुनना चाहिए। घर में तर्पण करते समय दक्षिण दिशा की ओर मुख करके शुद्ध जल अर्पित करना श्रेष्ठ माना गया है।

3. जल अर्पण की विधि

जल तर्पण करते समय ताँबे या पीतल के पात्र में जल लें। उसमें तिल, पुष्प या कुशा डालकर दोनों हाथों से धीरे-धीरे भूमि पर जल अर्पित करें। ध्यान रहे कि यह जल केवल तर्पण के लिए है, इसे पुनः प्रयोग में नहीं लेना चाहिए।

जल तर्पण के लिए आवश्यक सामग्री

1. शुद्ध जल

तर्पण के लिए सबसे पहले स्वच्छ और शुद्ध जल की आवश्यकता होती है। जल ही मुख्य तत्व है, जिसके माध्यम से पितरों और देवताओं तक श्रद्धा पहुँचाई जाती है।

2. ताँबे या पीतल का पात्र

जल अर्पित करने के लिए ताँबे या पीतल के लोटे अथवा कलश का उपयोग करना शुभ माना गया है। ये धातुएँ पवित्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार करती हैं।

3. तिल के दाने

काले तिल जल तर्पण में विशेष महत्व रखते हैं। तिल को जल में मिलाकर अर्पित करने से पितरों को तृप्ति मिलती है और वे संतुष्ट होते हैं।

4. कुशा (दरभा घास)

कुशा को वैदिक अनुष्ठानों में बहुत पवित्र माना जाता है। जल तर्पण के समय हाथ में कुशा धारण करके या उसे पात्र में डालकर तर्पण करना श्रेष्ठ माना गया है।

5. फूल और अक्षत (चावल)

तर्पण के साथ फूल और अक्षत अर्पित करने से श्रद्धा की पूर्णता व्यक्त होती है। अक्षत अक्षयता का प्रतीक हैं, जबकि फूल पवित्रता और भक्ति का भाव प्रकट करते हैं।

6. पवित्र स्थान या आसन

तर्पण करने वाले व्यक्ति को कुशा, ऊन या आसन पर बैठकर ही तर्पण करना चाहिए। इससे साधक की एकाग्रता बनी रहती है और विधि शुद्ध मानी जाती है।

जल तर्पण विधि

1. स्नान और शुद्धि

  • जल तर्पण करने से पहले स्नान करना आवश्यक है। स्नान के बाद साफ़ और धुले हुए वस्त्र पहनें। मन को शांत करें और पवित्र भाव के साथ विधि की शुरुआत करें।

2. स्थान और दिशा

  • जल तर्पण करने के लिए नदी, सरोवर या किसी पवित्र जल स्रोत का चयन सबसे उत्तम होता है।
  • यदि ऐसा संभव न हो तो घर के आँगन या खुले स्थान पर भी यह किया जा सकता है।
  • देवताओं को जल अर्पित करते समय पूर्व दिशा, ऋषियों के लिए उत्तर दिशा और पितरों के लिए दक्षिण दिशा की ओर मुख करके तर्पण करना चाहिए।

3. आवश्यक सामग्री

  • शुद्ध जल से भरा ताँबे या पीतल का पात्र
  • काले तिल
  • कुशा (दरभा घास)
  • पुष्प और अक्षत (चावल)
  • आसन (कुशा, ऊन या स्वच्छ कपड़े का)
  • सारी सामग्री को पास में स्वच्छता और श्रद्धा के साथ रखें।

4. संकल्प

  • विधि शुरू करने से पहले संकल्प लें। संकल्प का अर्थ है – मन ही मन यह निश्चय करना कि यह तर्पण देवताओं, ऋषियों और पितरों की तृप्ति और आशीर्वाद प्राप्त करने के उद्देश्य से किया जा रहा है।

5. तर्पण की प्रक्रिया

  • आसन पर बैठकर पात्र में जल भरें।
  • जल में तिल, पुष्प और कुशा डालें।
  • दोनों हाथों से जल लेकर धीरे-धीरे भूमि पर अर्पित करें।
  • इस समय पितरों और देवताओं का ध्यान करते हुए "ॐ पितृभ्यः स्वधा" या अन्य वैदिक मंत्र बोलें।
  • इस क्रिया को तीन बार या श्रद्धा अनुसार अधिक बार दोहराएँ।

6. आभार और प्रार्थना

  • अंत में हाथ जोड़कर देवताओं, ऋषियों और पितरों से आशीर्वाद की कामना करें कि वे परिवार को सुख, शांति और समृद्धि प्रदान करें।

तर्पण का उद्देश्य सिर्फ पितरों को ही नहीं, बल्कि देवताओं और ऋषियों को भी संतुष्ट करना है। इससे उनका आशीर्वाद मिलता है और साधक की आध्यात्मिक शक्ति प्रबल होती है।

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Published by Sri Mandir·August 28, 2025

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