पितृ पक्ष की सप्तमी 2025 कब है? यहां जानें इसकी सही तिथि, पूजा विधि और महत्व। इस दिन श्राद्ध करने से पितरों की कृपा प्राप्त होती है और जीवन में सुख-समृद्धि आती है।
पितृ पक्ष की सप्तमी श्राद्ध भाद्रपद शुक्ल सप्तमी तिथि को किया जाता है। इस दिन उन पितरों के लिए तर्पण, पिंडदान और श्राद्ध कर्म किया जाता है जिनका निधन सप्तमी तिथि को हुआ हो। यह श्राद्ध पितरों की आत्मा की शांति और परिवार में सुख-समृद्धि के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है।
गीता में कहा गया है कि, आत्मा का मिलन जब तक परमात्मा से नहीं होता है, तब तक वह विभिन्न योनियों में भटकती रहती है। मृत आत्माओं की इस अवस्था को अघम कहा जाता है। मान्यता है कि पितृपक्ष के दौरान जब पूर्वजों की मृत्यु तिथि पर उनके निमित्त श्राद्ध पिंडदान तर्पण आदि किया जाता है, तभी उनकी आत्मा को संतुष्टि मिलती है। इसी तरह सप्तमी तिथि पर उन पितरों का श्राद्ध करने का विधान है, जिनका स्वर्गवास सप्तमी तिथि पर हुआ हो।
शास्त्रों में वर्णन मिलता है कि मनुष्य के कल्याण के लिए श्राद्ध कर्म सबसे बड़ा मार्ग है। सप्तमी श्राद्ध सप्तमी तिथि के दिन स्वर्गवासी हुए पितरों की आत्मा की शांति के लिए विशेष महत्वपूर्ण है। मार्कंडेय पुराण और गरुण पुराण में कहा गया है कि श्राद्ध से तृप्त होकर पितृ अपने वंशजों को स्वास्थ्य, संतान, दीर्घायु, और सुख-संपन्नता का वरदान देते हैं।
ब्रह्म पुराण में कहा गया है कि मृत्यु के बाद हमारे पितरों की आत्मा किसी भी पशु-पक्षी की योनि में भटक सकती है। ऐसे में पितृपक्ष के दौरान उनके निमित्त किए गए पिंडदान और जल से ही उनका पोषण होता है। जिस परिवार में हर पितृपक्ष पितरों के निमित्त श्राद्ध कर्म किए जाते हैं, उस कुल का कोई भी व्यक्ति दुखी नहीं रहता। मान्यता है कि श्राद्ध कर्म करने से न सिर्फ पितरों का आशीर्वाद प्राप्त होता है, बल्कि पितृ दोष से भी छुटकारा मिलता है।
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