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गया में पिंड दान

जानिए, गया में पिंड दान क्यों महत्वपूर्ण और प्रसिद्ध है

गया में पिंड दान के बारे में

गया में पिंड दान पितरों की मुक्ति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। फल्गु नदी तट पर ब्राह्मणों द्वारा विधिपूर्वक पिंड दान करने से पितृ तृप्त होते हैं। यह कर्म पितरों की आत्मा को शांति और मोक्ष प्रदान करता है।

पिंडदान क्या है?

पिंडदान एक पवित्र अनुष्ठान है जिसे हिंदू धर्म में किसी परिवार के सदस्य की मृत्यु के बाद किया जाता है। इसका मतलब है, अपने पितरों को भोजन का दान देना। यह एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें मृतक के आत्मा की शांति के लिए विशेष रूप से तैयार किए गए पिंडों (छोटे गोले आकार के पिंड) को जल में प्रवाहित किया जाता है। ऐसा माना जाता है कि पिंडदान से पितरों की आत्मा को शांति मिलती है। पिंडदान में मुख्य रूप से पके हुए चावल को काले तिल के साथ मिलाकर छोटे-छोटे पिंड बनाए जाते हैं और इन्हें पूर्वजों के नाम से चढ़ाया जाता है।

इस बात का भी विशेष रूप से ध्यान रखना चाहिए कि पिंडदान की पूजा पंडितों के माध्यम से ही करानी चाहिए, क्योंकि पंडितों के निर्देशन में पूजा व धार्मिक अनुष्ठान कराने से विधिवत पूजा संभव होती है।

गया में पिंड दान का महत्व

गया में पिंडदान का विशेष महत्व है। शास्त्रों के अनुसार, यहां भगवान राम और सीता जी ने अपने पिता राजा दशरथ का पिंडदान किया था। गया को पितरों की मुक्ति के लिए सबसे बड़ा तीर्थ माना जाता है। गया में भगवान विष्णु स्वयं पितृ देवता के रूप में विराजमान हैं।

धार्मिक मान्यता है कि गया में पिंडदान करने से 108 कुलों और 7 पीढ़ियों का उद्धार हो जाता है और उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है। गरुड़ पुराण के आधार कांड में गया में पिंडदान का महत्व बताया गया है। यदि पितृ पक्ष के दौरान इस स्थान पर पिंडदान किया जाए तो पितरों को स्वर्ग की प्राप्ति होती है।

गया में पिंडदान के समय क्या किया जाता है?

  • पिंडदान आम तौर पर परिवार के सबसे बड़े पुरुष सदस्य द्वारा किया जाता है। लेकिन कुछ मामलों में महिलाओं को भी अनुमति है।
  • स्थान के अनुसार फल्गु, गंगा आदि नदियों में स्नान करने के बाद पिंडदान किया जाता है।
  • श्राद्ध कर्म के दौरान पारंपरिक सफेद पवित्र वस्त्र जैसे धोती, कुर्ता आदि पहनना जरूरी है।
  • ब्राह्मणों के मार्गदर्शन और मंत्रों के तहत चावल, गुड़, मिठाई आदि चढ़ाकर पिंड दान किया जाता है।
  • श्राद्ध करने वाला व्यक्ति पंडितों को भोजन कराता है। उन्हें वस्त्र दान करता है और उनसे आशीर्वाद प्राप्त करता है।
  • ऐसा माना जाता है कि पिंडदान के दौरान पंडितों को भोजन कराने से पूर्वज या आत्माएं तृप्त होती हैं।
  • श्राद्ध हमेशा दोपहर के समय करना चाहिए और यह सबसे उपयुक्त समय माना जाता है।
  • गया में पिंडदान एक विस्तृत विधि-विधान के साथ किया जाता है। इसमें कई प्रकार के मंत्रों का जाप, हवन और अन्य धार्मिक अनुष्ठान शामिल होते हैं।
  • पिंडों को फल्गु नदी में विसर्जित किया जाता है।

पिंडदान के लिए ‘गया’ क्यों प्रसिद्ध है?

  • धार्मिक मान्यता है कि गया में पितृ पक्ष के दौरान भगवान श्रीहरि पितृ देवता के रूप में विराजमान रहते हैं। इसलिए इसे पितृ तीर्थ भी कहा जाता है।
  • भगवान राम और सीता जी ने अपने पिता राजा दशरथ का पिंडदान किया था।
  • गया में पिंडदान करने से पूर्वजों को स्वर्ग में स्थान मिलता है।
  • माना जाता है कि गया में पिंडदान करने से मृतक की आत्मा को स्वर्ग की प्राप्ति होती है।
  • गया में श्राद्ध कर्म, तर्पण विधि और पिंडदान करने के बाद व्यक्ति पितृऋण से मुक्त हो जाता है।
  • गया में पिंडदान करने से पूर्वजों को जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति मिल जाती है।
  • गया में पिंडदान करने से पितरों की आत्मा मोह-माया की दुनिया में भटकती नहीं और उन्हें कई योनियों में जन्म लेना नहीं पड़ता।
  • गया में साल में एक बार 17 दिन के लिए मेला लगता है, जिसे पितृपक्ष मेला कहा जाता है।

क्या दो बार पिंडदान किया जा सकता है?

हां, एक बार पिंडदान करने के बाद दोबारा भी पिंडदान किया जा सकता है। कभी-कभी किसी कारणवश पिंडदान का अनुष्ठान पूर्ण रूप से नहीं हो पाता है। ऐसी स्थिति में दोबारा पिंडदान करने की परंपरा है। पितरों के श्राद्ध करने के लिए पितृ पक्ष, माघ मास विशेष माना जाता है। इन दिनों में तर्पण, पिंडदान, और ब्राह्मण भोजन कराया जा सकता है। ये दिन हर महीने आने वाली अमावस्या, सूर्य संक्रांति, वैधृति, और व्यतिपात योग हैं। इसके अलावा, अन्य पर्व और खास तिथियों पर भी पितृ कर्म किए जा सकते हैं। पितृपक्ष में श्राद्ध करने का अधिकार बड़े बेटे या सबसे छोटे बेटे को होता है। अगर ये दोनों ही श्राद्ध न करें, तो मंझला बेटा श्राद्ध कर सकता है।

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Published by Sri Mandir·September 19, 2025

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