
जानें इसे पढ़ने के अद्भुत लाभ और सही जाप का तरीका। जीवन में आध्यात्मिक शक्ति और सकारात्मक ऊर्जा लाने का सरल उपाय।
प्राण प्रतिष्ठा मंत्र का सनातन धर्म में विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है। यह मंत्र मूर्ति या विग्रह में दिव्य चेतना का आह्वान करने का माध्यम होता है, जिससे पूजा विधिवत और पूर्ण मानी जाती है। श्रद्धा और विधि के साथ इसके उच्चारण से आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार होता है। इस लेख में जानिए प्राण प्रतिष्ठा मंत्र का अर्थ, महत्व और धार्मिक उपयोग।
प्राण प्रतिष्ठा हिंदू धर्म में किया जाने वाला एक अत्यंत महत्वपूर्ण और पवित्र अनुष्ठान है। यह वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा किसी मूर्ति या प्रतिमा में दैवीय शक्ति और चेतना का आह्वान किया जाता है, जिससे वह निर्जीव वस्तु पूजनीय और जीवंत हो जाती है। इस अनुष्ठान का मुख्य भाग प्राण प्रतिष्ठा मंत्र है, जिसके द्वारा मूर्ति में ‘प्राण’ यानी जीवन शक्ति का संचार किया जाता है।
यह मंत्र मूर्ति को ईश्वर का निवास स्थान बनाता है, जिसके बाद ही भक्त उस विग्रह की पूजा, भोग और आरती करते हैं। यह मंत्र उस दैवीय ऊर्जा को भौतिक रूप से स्थापित करता है ताकि भक्त उसके माध्यम से ईश्वर से जुड़ सकें। प्राण प्रतिष्ठा के दौरान कई मंत्रों का जाप किया जाता है, लेकिन जो मुख्य वैदिक मंत्र मूर्ति में प्राण संचारित करता है, वह इस प्रकार है.....
ॐ अं आं इं ईं उं ऊं ऋं ऋृं लृं लॄं एं ऐं ओं औं अं अः क ख ग घ ङ च छ ज झ ञ ट ठ ड ढ ण त थ द ध न प फ ब भ म य र ल व श ष स ह क्षं सः सोऽहम्
अस्यै मूर्तये प्राणाः प्रतिष्ठन्तु।
अस्यै मूर्तये प्राणाः चरन्तु।
अस्यै मूर्तये दीर्घमायुः चरन्तु।
सोऽहम् अस्यै मूर्तये प्राणाः प्रतिष्ठन्तु॥
संक्षिप्त रूप में
ॐ अं आं इं ईं... क्षं सः सोऽहम्। अस्यै मूर्तये प्राणाः प्रतिष्ठन्तु।
यह मंत्र संस्कृत वर्णमाला के अक्षरों (बीज मंत्र) और वैदिक प्रार्थनाओं का एक शक्तिशाली संयोजन है, जिसका सीधा संबंध जीवन और चेतना से है।
अर्थ: यह संस्कृत वर्णमाला के बीज अक्षरों का जाप है, जो ध्वनि, ऊर्जा और चेतना के विभिन्न स्तरों का प्रतिनिधित्व करते हैं। 'सोऽहम्' का अर्थ है 'वह (ईश्वर) मैं हूँ'।
व्याख्या: यह जाप मूर्ति में संपूर्ण ब्रह्मांड की ध्वनि और चेतना ऊर्जा को स्थापित करता है।
अर्थ: इस मूर्ति में प्राण (जीवन शक्ति) स्थापित होवें।
व्याख्या: यह आह्वान है कि मूर्ति अब निर्जीव नहीं, बल्कि जीवंत हो जाए।
अर्थ: इस मूर्ति में प्राणों का संचार हो, वे गतिशील हों।
व्याख्या: यह प्रार्थना है कि दैवीय ऊर्जा मूर्ति के हर अंग में प्रवाहित हो।
अर्थ: इस मूर्ति में दीर्घायु (लंबा जीवन) संचारित होवे।
व्याख्या: यह कामना है कि मूर्ति में स्थापित दैवीय ऊर्जा लंबे समय तक बनी रहे।
अर्थ: वह (ईश्वर) मैं हूँ, इस मूर्ति में प्राण स्थापित होवें।
व्याख्या: यह घोषणा करता है कि भक्त स्वयं को ईश्वर से जोड़कर मूर्ति में प्राण स्थापित कर रहा है।
संपूर्ण भावार्थ
इस मंत्र के माध्यम से, भक्त संपूर्ण वर्णमाला की ध्वनियों और ब्रह्मांडीय चेतना ('सोऽहम्') का उपयोग करके यह आह्वान करता है कि 'इस मूर्ति में जीवन शक्ति स्थापित हो, इसमें प्राणों का संचार हो और यह दीर्घकाल तक दैवीय ऊर्जा से युक्त रहे।'
हालांकि यह मंत्र मुख्य रूप से पुरोहितों द्वारा अनुष्ठान के लिए उपयोग किया जाता है, इस मंत्र के महत्व को समझने और इसका जाप करने से कई लाभ होते हैं:
संक्षेप में, प्राण प्रतिष्ठा मंत्र भौतिक वस्तु में आध्यात्मिक चेतना का संचार करने का सबसे शक्तिशाली माध्यम है। यह हमें सिखाता है कि ईश्वर कण-कण में विद्यमान है और हमारी श्रद्धा ही उन्हें प्रकट करती है।
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