
जानिए कल्पवास 2026 की तिथि, नियम, दैनिक जीवनचर्या, धार्मिक महत्व, पुण्य फल और प्रयागराज माघ मेले से जुड़ी आस्था।
माघ मेले में कल्पवास का विशेष धार्मिक महत्व होता है, जिसमें श्रद्धालु संयम, साधना और तप के मार्ग पर चलते हैं। माना जाता है कि माघ मास में किया गया कल्पवास आत्मिक शुद्धि, पुण्य प्राप्ति और मन को शांति देने का श्रेष्ठ साधन है।
कल्पवास माघ मेले का सबसे पवित्र और महत्वपूर्ण अनुष्ठान है। इसमें श्रद्धालु माघ मास (जनवरी–फरवरी) के पूरे एक महीने तक तीर्थराज प्रयाग के त्रिवेणी संगम तट पर निवास करते हैं और संयमित, तपस्वी जीवन जीते हैं। इसे आत्मशुद्धि, पाप-मुक्ति और मोक्ष की साधना का मार्ग माना जाता है।
जन्म-जन्मांतर के पापों से मुक्ति, पूर्वजों की तृप्ति और मोक्ष की प्राप्ति- इन महान संकल्पनाओं को साकार करने के लिए तीर्थराज प्रयाग के त्रिवेणी संगम तट पर हर वर्ष माघ मास में माघ मेला आयोजित होता है। वर्ष 2026 में माघ मेला और कल्पवास का शुभारंभ 3 जनवरी (पौष पूर्णिमा) से होगा और यह 15 फरवरी महाशिवरात्रि तक चलेगा। इस अवधि में लाखों श्रद्धालु, साधु-संत और कल्पवासी संगम तट पर एकत्र होकर अखंड जप-तप, भजन-पूजन और साधना में लीन रहेंगे।
पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब देवताओं और असुरों के बीच समुद्र मंथन हुआ, तब अमृत की चार बूंदें धरती के चार स्थानों- हरिद्वार, उज्जैन, नासिक और प्रयागराज में गिरीं। इन्हीं स्थलों पर कुंभ मेले का आयोजन होता है। प्रयागराज में प्रतिवर्ष आयोजित होने वाला माघ मेला, कुंभ परंपरा का ही एक दिव्य स्वरूप है, जहां संगम में स्नान को आत्मशुद्धि और मोक्ष का साधन माना गया है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, माघ मास में संगम में स्नान करने से समस्त पापों का नाश होता है और व्यक्ति को जन्म-मरण के बंधन से मुक्ति मिलती है। विशेष स्नान पर्वों- पौष पूर्णिमा, मकर संक्रांति, मौनी अमावस्या, बसंत पंचमी और माघी पूर्णिमा पर संगम तट पर श्रद्धालुओं की विशाल भीड़ उमड़ती है। इन तिथियों को शाही स्नान का विशेष महत्व प्राप्त है।
माघ मेले का सबसे महत्वपूर्ण अंग कल्पवास है। माघ मास में पूरे एक महीने तक संगम तट पर निवास कर संयमित जीवन जीते हुए साधना करने को कल्पवास कहा जाता है। कुछ श्रद्धालु पौष पूर्णिमा से, तो कुछ मकर संक्रांति से कल्पवास आरंभ करते हैं। कल्पवासी साधारण तंबुओं या झोपड़ियों में रहते हैं और सांसारिक सुख-सुविधाओं का त्याग कर तपस्वी जीवन अपनाते हैं।
कल्पवास के दौरान साधकों को कठोर नियमों का पालन करना होता है। दिन में तीन बार गंगा स्नान, एक समय सात्विक भोजन, भूमि पर शयन, ब्रह्मचर्य पालन, धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन, संतों के प्रवचन और भजन-कीर्तन- कल्पवासी का दैनिक जीवन इन्हीं अनुशासनों में व्यतीत होता है। तंबू के बाहर तुलसी का पौधा रोपना और जौ बोना भी कल्पवास की परंपरा का हिस्सा है, जो साधक के संकल्प और अर्जित पुण्य का प्रतीक माना जाता है।
इस वर्ष पहली बार माघ मेला क्षेत्र को सात सेक्टरों में विभाजित किया गया है। हर सेक्टर में संतों और कल्पवासियों के रहने की अलग व्यवस्था की गई है। श्रद्धालुओं के लिए प्रवचन पंडाल सजाए जा रहे हैं, जहां धार्मिक कथाएं, प्रवचन, भजन-कीर्तन होंगे। रामलीला और रासलीला जैसे सांस्कृतिक आयोजन मेला क्षेत्र को भक्तिमय वातावरण से भर देंगे।
प्रयाग धर्म संघ के अध्यक्ष राजेंद्र पालीवाल के अनुसार, प्रयागराज में कल्पवास की परंपरा अनादिकाल से चली आ रही है। समय के साथ माघ मेले की व्यवस्थाओं में बदलाव आया है, लेकिन कल्पवासियों के तप, दान, हवन और संकल्प आज भी उतने ही कठोर और पवित्र हैं। प्रशासन और शासन भी इस धार्मिक अनुष्ठान को सफल बनाने में पूरी आस्था के साथ सहयोग करता है।
प्रातःकाल गंगा स्नान के बाद कल्पवासियों का समूह संत-महात्माओं के शिविरों में प्रवचन सुनने पहुंचता है। सायंकाल पुनः स्नान के बाद संगम तट पर दीपदान किया जाता है। यह क्रम पूरे माघ मास तक चलता है और कल्पवासी आत्मिक शांति का अनुभव करते हैं।
बीएचयू के ज्योतिष विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. गिरिजा शंकर शास्त्री के अनुसार, पद्मपुराण में तीर्थराज प्रयाग की महिमा का विस्तार से वर्णन मिलता है।
गोस्वामी तुलसीदास ने भी लिखा है..
‘माघ मकर गत रबि जब होई, तीरथपतिहिं आव सब कोई।’ शास्त्रों में प्रयाग को सभी तीर्थों का राजा कहा गया है।
मकर संक्रांति पर सूर्य का उत्तरायण होना और अभिजित नक्षत्र में प्रवेश- इन खगोलीय कारणों से भूमंडल और भानुमंडल का ऐक्य तीर्थराज प्रयाग में होता है। इसी कारण शास्त्रों में कल्पवास का विधान केवल प्रयागराज में ही बताया गया है।
द्वारका शारदा पीठ के प्रतिनिधि एवं श्रीमनकामेश्वर महादेव मंदिर के महंत श्रीधरानंद ब्रह्मचारी के अनुसार, माघ मास में संगम तट पर किए गए जप-तप से राजसूय यज्ञ के समान पुण्य प्राप्त होता है। संगम स्नान का वैज्ञानिक महत्व भी पृथ्वी के चुंबकीय प्रभाव और पंचतत्वों की शुद्धि से जुड़ा माना जाता है।
पद्मपुराण, स्कंद पुराण और अग्नि पुराण में कल्पवास की महिमा और 21 नियमों का उल्लेख है। सत्य पालन, अहिंसा, ब्रह्मचर्य, दान, सत्संग और मेला क्षेत्र न छोड़ना। इन नियमों का कठोरता से पालन करना अनिवार्य है।
कल्पवास की पूर्णता के लिए श्रद्धालुओं को लगातार 12 वर्षों तक माघ मास में संगम तट पर साधना करनी होती है। 12वें वर्ष के बाद सजियादान किया जाता है, जिसमें गृहस्थी का सामान दान कर कल्पवास की पूर्णता मानी जाती है।
माघ मेला केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि आस्था, तप, संयम और आत्मशुद्धि की जीवंत परंपरा है, जो सदियों से तीर्थराज प्रयाग को भारत की आध्यात्मिक चेतना का केंद्र बनाए हुए है।
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