श्रावण पूर्णिमा व्रत कब है?
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श्रावण पूर्णिमा व्रत कब है?

क्या आप जानना चाहते हैं कि श्रावण पूर्णिमा व्रत कब है और इसका क्या महत्व होता है? इस लेख में जानिए श्रावण पूर्णिमा के व्रत की तिथि, धार्मिक महत्व, पूजा विधि और इस दिन किए जाने वाले विशेष उपायों की पूरी जानकारी।

श्रावण पूर्णिमा व्रत के बारे में

हिंदू पंचांग के अनुसार श्रावण महीने की पूर्णिमा को श्रावण या श्रावणी पूर्णिमा कहा जाता है। धार्मिक मान्यताओं में इस दिन स्नान, तप और दान करना बहुत शुभ माना जाता है। इसी दिन रक्षाबंधन का त्योहार भी मनाया जाता है। मध्य और उत्तर भारत में कजरी पूर्णिमा भी इसी दिन मनाई जाती है। इस अवसर पर यज्ञोपवीत पूजा और उपनयन संस्कार करने की परंपरा भी है। माना जाता है कि इस दिन किए गए उपायों से चंद्र दोष से राहत मिलती है।

श्रावण पूर्णिमा व्रत कब है?

श्रावण पूर्णिमा व्रत का समय इस प्रकार है, 27 अगस्त 2026 को सुबह 09:10:51 बजे से पूर्णिमा तिथि शुरू होगी और 28 अगस्त 2026 को सुबह 09:50 बजे यह समाप्त हो जाएगी।

श्रावण पूर्णिमा व्रत क्या है?

श्रावण पूर्णिमा अलग-अलग जगहों पर अलग ढंग से मनाई जाती है, इसलिए इस दिन कई धार्मिक कार्य किए जाते हैं। इस अवसर पर रक्षाबंधन का पर्व भी होता है, इसलिए देवी-देवताओं की पूजा करके रक्षा सूत्र बांधना शुभ माना जाता है। साथ ही पितरों की शांति के लिए तर्पण करना भी महत्वपूर्ण होता है। इस दिन गाय को चारा और चींटियों व मछलियों को आटा या दाने खिलाने की परंपरा है। पूर्णिमा के कारण चंद्रमा अपने पूर्ण रूप में होता है, इसलिए उसकी पूजा करने से चंद्र दोष से राहत मिलती है। इसके अलावा भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की आराधना करने से सुख, धन और समृद्धि का आशीर्वाद मिलता है। चूंकि श्रावण महीना भगवान शिव को समर्पित है, इसलिए इस दिन शिवजी का रुद्राभिषेक करना विशेष रूप से शुभ माना जाता है।

श्रावण पूर्णिमा व्रत का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व

रक्षाबंधन का महत्व: यह दिन भाई-बहन के स्नेह, भरोसे और सुरक्षा के रिश्ते को दर्शाता है। इस मौके पर बहनें भाई की कलाई पर राखी बांधकर उसकी खुशहाली और लंबी उम्र की कामना करती हैं।

भगवान शिव की पूजा: श्रावण महीना शिवजी को प्रिय माना जाता है। पूर्णिमा के दिन उनकी पूजा, रुद्राभिषेक और जल अर्पण करने से भगवान शिव प्रसन्न होते हैं और भक्तों की इच्छाएं पूरी करते हैं।

कांवड़ यात्रा का अंत: इस दिन कांवड़ यात्रा पूरी होती है। शिव भक्त पवित्र नदियों से लाया हुआ जल शिवलिंग पर चढ़ाकर अपनी यात्रा समाप्त करते हैं।

विष्णु-लक्ष्मी आराधना: इस अवसर पर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा करने से घर में सुख-शांति और धन-समृद्धि बनी रहती है।

स्नान और दान का महत्व: पूर्णिमा के दिन पवित्र नदियों में स्नान करना और दान करना बहुत पुण्यकारी माना जाता है, जिससे नकारात्मकता दूर होती है।

यज्ञोपवीत और ऋषि तर्पण: यह दिन जनेऊ बदलने और ऋषियों के सम्मान में तर्पण करने के लिए भी शुभ माना जाता है।

श्रावण पूर्णिमा व्रत कैसे मनाया जाता है?

स्नान और संकल्प: सुबह जल्दी उठकर किसी पवित्र नदी में स्नान करें। अगर संभव न हो, तो घर पर पानी में गंगाजल मिलाकर स्नान करें। इसके बाद व्रत रखने का संकल्प लें, जिसमें 32 पूर्णिमा व्रत का संकल्प विशेष माना जाता है।

पूजा विधि: घर के मंदिर या शिवालय में भगवान शिव, माता पार्वती और विष्णु-लक्ष्मी की पूजा करें। शिवलिंग पर जल, दूध, दही, शहद, घी, चंदन, सफेद फूल और बेलपत्र चढ़ाएं।

सत्यनारायण कथा: भगवान विष्णु को प्रसन्न करने के लिए सत्यनारायण कथा का पाठ करें या श्रद्धा से सुनें।

विशेष कार्य: श्रावण पूर्णिमा के दिन रक्षाबंधन मनाया जाता है। इस अवसर पर राखी बांधी जाती है और रक्षासूत्र को पहले देवताओं को अर्पित करना शुभ माना जाता है।

दान और तर्पण: इस दिन जरूरतमंद लोगों को भोजन कराएं और वस्त्र, जनेऊ या अन्न का दान करें। साथ ही पितरों के लिए तर्पण करना भी अच्छा माना जाता है।

उपवास और पारण: पूरे दिन व्रत रखें, जिसमें निराहार या फलाहार किया जा सकता है। शाम को चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद व्रत खोलें।

श्रावण पूर्णिमा व्रत में किए जाने वाले पवित्र कार्य

स्नान और दान: सुबह पवित्र नदियों जैसे गंगा या यमुना में स्नान करें, या घर पर ही गंगाजल मिलाकर नहाएं। इस दिन अनाज, कपड़े या अन्य वस्तुओं का दान करना बहुत शुभ माना जाता है।

भगवान शिव की पूजा: शिवलिंग पर पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद और गंगाजल), बेलपत्र, धतूरा और सफेद फूल चढ़ाएं। साथ ही ‘ॐ नमः शिवाय’ या महामृत्युंजय मंत्र का जाप करें।

रक्षाबंधन का पर्व: इस दिन भाई-बहन के स्नेह का प्रतीक रक्षाबंधन भी मनाया जाता है, जिसमें बहनें भाई को राखी बांधती हैं।

उपनयन संस्कार (जनेऊ): इस दिन जनेऊ बदलने की परंपरा होती है, जिसे ‘श्रावणी’ भी कहा जाता है।

सत्यनारायण कथा: घर में सुख और समृद्धि के लिए भगवान सत्यनारायण की पूजा करें और उनकी कथा सुनें या पढ़ें।

पवित्रोपना (शिव पूजा): इस अवसर पर रूई की बत्तियों को पंचगव्य में भिगोकर भगवान शिव को अर्पित किया जाता है, जो विशेष पूजा का हिस्सा है।

श्रावण पूर्णिमा व्रत के दिन किए जाने वाले शुभ कार्य

स्नान और व्रत का संकल्प: इस दिन प्रातः जल्दी उठकर स्नान करें और श्रद्धा से व्रत रखने का संकल्प लें।

भगवान शिव की आराधना: शिवलिंग पर जल, दूध और बेलपत्र अर्पित करें तथा ‘ॐ नमः शिवाय’ मंत्र का जप करें।

विष्णु-लक्ष्मी पूजा: भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा करने से घर में सुख-शांति और समृद्धि बनी रहती है।

रक्षाबंधन का उत्सव: इस अवसर पर बहनें भाई की कलाई पर राखी बांधकर उसके मंगल और दीर्घायु की कामना करती हैं।

दान-पुण्य और तर्पण: इस दिन जरूरतमंदों को अन्न, कपड़े आदि का दान करें और पितरों के लिए तर्पण करना भी शुभ माना जाता है।

सत्यनारायण कथा का श्रवण: भगवान सत्यनारायण की कथा सुनना या पढ़ना शुभ फल देने वाला माना जाता है।

चंद्रमा को अर्घ्य देना: शाम के समय चंद्रमा को अर्घ्य अर्पित करना लाभकारी माना जाता है।

व्रत का समापन (पारण): दिनभर व्रत रखने के बाद शाम को विधि अनुसार व्रत खोलें।

श्रावण पूर्णिमा व्रत का ज्योतिषीय महत्व

चंद्र दोष से राहत: इस दिन चंद्रमा अपने पूरे रूप में होता है। जिन लोगों की कुंडली में चंद्र से जुड़ी परेशानियां जैसे मानसिक तनाव या अस्थिरता होती है, उन्हें व्रत रखकर चंद्रमा को अर्घ्य देना चाहिए। इससे मन को शांति मिलती है और दोष का प्रभाव कम होता है।

शिव-विष्णु की कृपा: श्रावण महीना भगवान शिव को समर्पित होता है और पूर्णिमा भगवान विष्णु से जुड़ी मानी जाती है। इसलिए इस दिन शिव, माता पार्वती और विष्णु जी की पूजा करने से जीवन में संतुलन और सुख मिलता है।

रक्षाबंधन और पवित्र धागा: इस दिन रक्षाबंधन मनाया जाता है, जो भाई-बहन के प्रेम और जिम्मेदारी का प्रतीक है। इसी दिन जनेऊ बदलने की परंपरा भी होती है, जिसे उपाकर्म कहा जाता है और यह अपने कर्तव्यों की याद दिलाता है।

दान-पुण्य का महत्व: इस दिन अन्न, धन या अन्य वस्तुओं का दान करना बहुत शुभ माना जाता है। साथ ही पूजा-पाठ करने से पितृ दोष भी कम होता है।

कजरी पूर्णिमा का पर्व: कई जगहों पर इस दिन कजरी पूर्णिमा भी मनाई जाती है, जो अच्छी फसल और समृद्धि की कामना से जुड़ी होती है।

श्रावण पूर्णिमा व्रत का आध्यात्मिक महत्व

आंतरिक शुद्धि और जप: इस दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर पवित्र नदी में स्नान करना या घर पर गंगाजल मिलाकर नहाना शुभ माना जाता है। इससे तन और मन दोनों शुद्ध होते हैं। ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ और ‘ॐ नमः शिवाय’ मंत्रों का जप करने से मन को शांति मिलती है।

शिव और विष्णु की पूजा: यह दिन भगवान शिव, माता पार्वती और भगवान विष्णु की पूजा के लिए बहुत अच्छा माना जाता है। उनकी आराधना करने से आध्यात्मिक लाभ और पुण्य प्राप्त होता है।

रक्षाबंधन का आध्यात्मिक महत्व: रक्षा सूत्र बांधना सिर्फ भाई-बहन के प्रेम का प्रतीक नहीं है, बल्कि यह भगवान की रक्षा का संकेत भी देता है। यह व्यक्ति को नकारात्मक प्रभावों से बचाने में सहायक माना जाता है।

श्रावणी उपाकर्म का महत्व: यह दिन खासकर ब्राह्मणों के लिए महत्वपूर्ण होता है। इसमें ऋषियों के प्रति सम्मान प्रकट किया जाता है और जनेऊ बदलकर अपने कर्मों की शुद्धि का संकल्प लिया जाता है।

दान और सेवा: इस दिन अन्न, वस्त्र और घी का दान करना शुभ माना जाता है। इससे पुराने कर्मों का प्रभाव कम होता है और मन को शांति व संतोष मिलता है।

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Published by Sri Mandir·June 10, 2026

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