परशुराम द्वादशी कब है 2026?
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परशुराम द्वादशी कब है 2026?

क्या आप जानना चाहते हैं कि 2026 में परशुराम द्वादशी कब मनाई जाएगी और इसका क्या महत्व है? इस लेख में जानिए परशुराम द्वादशी की तिथि, पूजा विधि, धार्मिक महत्व, परंपराएँ और इस दिन किए जाने वाले विशेष उपायों की पूरी जानकारी।

परशुराम द्वादशी के बारे में

परशुराम द्वादशी भगवान विष्णु के छठे अवतार भगवान परशुराम को समर्पित है। यह दिन हमें धर्म, सत्य और न्याय के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है। भगवान परशुराम का जीवन यह सिखाता है कि शक्ति का उपयोग हमेशा सही उद्देश्य के लिए और संयम के साथ करना चाहिए। इस दिन भक्त पूरी श्रद्धा के साथ व्रत रखते हैं, पूजा करते हैं और भगवान से जीवन में सही मार्गदर्शन की प्रार्थना करते हैं। इसी भाव के साथ आइए जानते हैं परशुराम द्वादशी से जुड़ी सभी महत्वपूर्ण बातें विस्तार से।

परशुराम द्वादशी कब है?

  • वर्ष 2026 में परशुराम द्वादशी 28 अप्रैल, मंगलवार को वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि पर मनाई जाएगी।
  • द्वादशी तिथि 27 अप्रैल 2026 को शाम 06 बजकर 15 मिनट पर प्रारंभ होगी।
  • द्वादशी तिथि का समापन 28 अप्रैल 2026 को शाम 06 बजकर 51 मिनट पर होगा।
  • 29 अप्रैल को द्वादशी पारण समय सुबह 05 बजकर 24 मिनट से सुबह 08:00 बजे तक रहेगा।
  • बता दें कि पारण के दिन द्वादशी सूर्योदय से पहले समाप्त हो जाएगी।

परशुराम द्वादशी क्या है?

परशुराम द्वादशी भगवान विष्णु के छठे अवतार भगवान परशुराम को समर्पित एक विशेष धार्मिक पर्व है, जो धर्म की स्थापना और अधर्म के विनाश के सिद्धांत को दर्शाता है। भगवान परशुराम को एक ऐसे योद्धा ऋषि के रूप में जाना जाता है, जिन्होंने अन्याय और अत्याचार के विरुद्ध खड़े होकर समाज में संतुलन स्थापित किया। ऐसे में इस दिन भगवान परशुराम की पूजा की जाती है, और भक्तगण पूरे श्रद्धा भाव से व्रत रखते हैं।

इस दिन को मनाने का उद्देश्य केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है, बल्कि यह दिन हमें सिखाता है कि जीवन में जब भी अन्याय बढ़े, तब धर्म और सत्य का साथ देना हमारा कर्तव्य है। इस व्रत के माध्यम से भक्त अपने अंदर की नकारात्मकता को त्यागने और सकारात्मक ऊर्जा को अपनाने का संकल्प लेते हैं।

हिंदू धर्मग्रंथों के अनुसार भगवान परशुराम पृथ्वी पर रहने वाले आठ चिरंजीवियों में से एक माने जाते हैं, जो आज भी जीवित हैं। उन्होंने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए कठोर तपस्या की थी, जिसके परिणामस्वरूप भगवान शिव ने उन्हें दिव्य अस्त्र “परशु” (कुल्हाड़ी) प्रदान किया और उन्हें युद्धकला का ज्ञान दिया। इसी कारण उनका नाम परशुराम पड़ा। उनके जीवन का उल्लेख त्रेता युग (भगवान राम का समय) और द्वापर युग (भगवान कृष्ण का समय) दोनों में मिलता है, जो उनके चिरंजीवी होने का प्रमाण माना जाता है।

इतना ही नहीं, भगवान परशुराम ने भीष्म पितामह, गुरु द्रोणाचार्य और अंगराज कर्ण जैसे महान योद्धाओं को भी शिक्षा दी थी, जिससे उनका स्थान केवल एक योद्धा ही नहीं, बल्कि एक महान गुरु के रूप में भी स्थापित होता है।

परशुराम द्वादशी का महत्व

परशुराम द्वादशी का महत्व केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह व्यक्ति के मानसिक, आध्यात्मिक और नैतिक विकास से भी गहराई से जुड़ा हुआ है। यह दिन हमें यह सिखाता है कि शक्ति और ज्ञान का उपयोग केवल अपने स्वार्थ के लिए नहीं, बल्कि समाज के कल्याण के लिए होना चाहिए। भगवान परशुराम का जीवन यह दर्शाता है कि कठोरता और करुणा दोनों का संतुलन आवश्यक है।

यह व्रत विशेष रूप से उन लोगों के लिए अत्यंत लाभकारी माना जाता है जो संतान सुख की कामना करते हैं। मान्यता है कि जो दंपत्ति विधि-विधान से इस व्रत को करते हैं, उन्हें वीर, बुद्धिमान और गुणवान संतान की प्राप्ति होती है। साथ ही, इस व्रत के प्रभाव से व्यक्ति को जीवन में वैभव, सुख-संपत्ति और अंततः मोक्ष की प्राप्ति होती है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार राजा दशरथ और वासुदेव जी ने भी इस व्रत का पालन किया था, जिसके फलस्वरूप उन्हें भगवान श्रीराम और श्रीकृष्ण जैसे दिव्य संतान की प्राप्ति हुई। इसी कारण यह व्रत अत्यंत पुण्यदायी और फलदायक माना जाता है।

परशुराम द्वादशी का यह पर्व विशेष रूप से मोहिनी एकादशी के अगले दिन आता है, जिससे इसका आध्यात्मिक महत्व और भी बढ़ जाता है।

परशुराम द्वादशी का धार्मिक और सामाजिक महत्व

परशुराम द्वादशी के धार्मिक और सामाजिक महत्व की बात करें तो यह पर्व समाज में नैतिक मूल्यों की स्थापना का भी संदेश देता है। धार्मिक दृष्टि से यह दिन भगवान विष्णु के अवतार की पूजा और भक्ति का अवसर प्रदान करता है, जिससे व्यक्ति अपने जीवन में आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त कर सकता है।

वहीं सामाजिक दृष्टि से यह पर्व हमें यह सिखाता है कि हमें अन्याय और अत्याचार के खिलाफ खड़ा होना चाहिए और समाज में न्याय और समानता को बढ़ावा देना चाहिए। यह दिन हमें यह भी प्रेरणा देता है कि हम अपने कर्तव्यों का पालन ईमानदारी से करें और जरूरतमंद लोगों की सहायता करें, जिससे समाज में संतुलन और सौहार्द बना रहे।

पुराणों में यह भी वर्णित है कि भगवान परशुराम ने सहस्रबाहु को पराजित कर संपूर्ण पृथ्वी अपने गुरु को दान में दे दी थी, जिससे यह संदेश मिलता है कि सच्चा धर्म त्याग और समर्पण में निहित होता है, न कि अधिकार और अहंकार में।

परशुराम द्वादशी से जुड़ी परंपराएं और जागरूकता

परशुराम द्वादशी से जुड़ी परंपराएं हमें अनुशासन, भक्ति और सामाजिक जिम्मेदारी का बोध कराती हैं। इस दिन लोग प्रातःकाल स्नान करके व्रत का संकल्प लेते हैं और पूरे दिन सात्विक जीवनशैली का पालन करते हैं। भगवान परशुराम और विष्णु जी की पूजा, कथा श्रवण और दान-पुण्य करना इस दिन की प्रमुख परंपराएं हैं।

मान्यता है कि इस दिन भगवान परशुराम की कथा सुनना और पढ़ना अत्यंत पुण्यदायी होता है। यह भी कहा जाता है कि ऋषि याज्ञवल्क्य ने एक निःसंतान राजा को यह व्रत करने की सलाह दी थी, जिसके फलस्वरूप उसे पराक्रमी पुत्र की प्राप्ति हुई, जो आगे चलकर नल नाम से प्रसिद्ध हुआ।

आधुनिक समय में यह पर्व हमें यह भी सिखाता है कि हमें अपने जीवन में संयम, नैतिकता और आत्मनियंत्रण को अपनाना चाहिए और समाज में सकारात्मक बदलाव लाने के लिए प्रयास करना चाहिए।

परशुराम द्वादशी की तैयारी कैसे की जाती है?

परशुराम द्वादशी की तैयारी एक दिन पहले से ही शुरू हो जाती है, ताकि इस पवित्र दिन को पूरी श्रद्धा और शुद्धता के साथ मनाया जा सके। भक्त अपने घर की साफ-सफाई करते हैं और पूजा स्थल को विशेष रूप से सजाते हैं, जिससे वातावरण सकारात्मक और पवित्र बना रहे।

पूजा के लिए आवश्यक सामग्री जैसे भगवान परशुराम का चित्र, दीपक, धूप, फूल, फल और प्रसाद पहले से ही एकत्र कर लिए जाते हैं। इसके अलावा, व्रत रखने वाले लोग एक दिन पहले से ही सात्विक भोजन का सेवन करते हैं और अपने मन को शांत और एकाग्र बनाने का प्रयास करते हैं।

परशुराम द्वादशी कैसे मनाई जाती है?

  • परशुराम द्वादशी को भक्तगण पूरी श्रद्धा और नियमों के साथ मनाते हैं, जिसमें पूजा, व्रत और दान का विशेष महत्व होता है।
  • इस दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान किया जाता है और भगवान विष्णु तथा परशुराम का ध्यान किया जाता है।
  • इसके बाद विधिपूर्वक पूजा की जाती है, जिसमें दीपक जलाना, फूल और प्रसाद अर्पित करना और कथा का पाठ करना शामिल होता है।
  • व्रत रखने वाले लोग पूरे दिन उपवास करते हैं या फलाहार ग्रहण करते हैं और अपने आचरण में सात्विकता बनाए रखते हैं।
  • शाम को आरती की जाती है और भगवान से सुख-समृद्धि की कामना की जाती है।

परशुराम द्वादशी के दिन किए जाने वाले कार्य

इस दिन कुछ विशेष कार्य करना अत्यंत शुभ और फलदायी माना जाता है:

व्रत और उपवास रखना: यह केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि आत्मसंयम और मानसिक शुद्धि का माध्यम है, जो व्यक्ति को आंतरिक रूप से मजबूत बनाता है। भगवान परशुराम का स्मरण और जाप: इससे मन में शांति आती है और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। दान-पुण्य करना: अन्न, जल और वस्त्र का दान करने से पुण्य की प्राप्ति होती है और समाज में सहयोग की भावना बढ़ती है। सेवा कार्य करना: जरूरतमंद लोगों की सहायता करना इस दिन विशेष रूप से फलदायी माना जाता है। आत्मचिंतन करना: अपने जीवन की गलतियों को समझकर उन्हें सुधारने का प्रयास करना इस दिन का सबसे बड़ा आध्यात्मिक लाभ है।

परशुराम द्वादशी का संदेश

परशुराम द्वादशी हमें जीवन के कई महत्वपूर्ण और गहरे संदेश देती है, जो हमारे व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन दोनों के लिए अत्यंत उपयोगी हैं। यह पर्व हमें सिखाता है कि हमें हमेशा सत्य और धर्म का साथ देना चाहिए, चाहे परिस्थितियाँ कितनी भी कठिन क्यों न हों।

यह दिन हमें यह भी समझाता है कि शक्ति का उपयोग केवल अच्छे कार्यों के लिए होना चाहिए, न कि किसी को नुकसान पहुँचाने के लिए। भगवान परशुराम का जीवन हमें यह सिखाता है कि त्याग, अनुशासन और न्याय ही सच्चे धर्म के आधार हैं।

साथ ही, यह पर्व हमें समाज में संतुलन बनाए रखने, जरूरतमंदों की सहायता करने और अपने कर्तव्यों का पालन करने की प्रेरणा देता है। अंततः यह दिन हमें यह संदेश देता है कि सच्चा धर्म वही है जो मानवता, करुणा और न्याय के साथ जुड़ा हो, और यही इस पर्व की सबसे बड़ी सीख है।

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Published by Sri Mandir·April 17, 2026

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