पंगुनी उथिरम क्या है?
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पंगुनी उथिरम क्या है?

क्या आप जानना चाहते हैं कि पंगुनी उथिरम क्या है और यह त्योहार क्यों मनाया जाता है? इस लेख में जानिए पंगुनी उथिरम का महत्व, इससे जुड़ी पौराणिक कथाएँ, पूजा विधि और इस पावन दिन का धार्मिक महत्व विस्तार से।

पंगुनी उथिरम के बारे में

पंगुनी उथिरम दक्षिण भारत का एक महत्वपूर्ण हिंदू पर्व है, जो तमिल माह पंगुनी में मनाया जाता है। यह दिन भगवान मुरुगन और देवी देवसेना के दिव्य विवाह से जुड़ा है। इस अवसर पर भक्त व्रत रखते हैं, मंदिरों में पूजा करते हैं और शोभायात्राएँ निकालते हैं। यह पर्व भक्ति, समर्पण और दांपत्य सुख का प्रतीक माना जाता है।

पंगुनी उथिरम 2026

पंगुनी उथिरम दक्षिण भारत का एक अत्यंत पवित्र पर्व है, जिसे विशेष रूप से तमिलनाडु में बड़ी श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। यह पर्व भगवान शिव, माता पार्वती, भगवान मुरुगन (कार्तिकेय) और देवी-देवताओं के दिव्य विवाह की मान्यता पर आधारित है। तमिल पंचांग के अनुसार यह पर्व पंगुनी (फाल्गुन) महीने में उथिरम नक्षत्र पर पड़ता है। इस दिन भक्त भगवान से वैवाहिक सुख, पारिवारिक समृद्धि और जीवन में शांति की कामना करते हैं।

पंगुनी उथिरम क्या है?

पंगुनी उथिरम एक महत्वपूर्ण हिंदू धार्मिक उत्सव है, जो तमिल कैलेंडर के ‘पंगुनी’ महीने में उथिरम (उत्तराफाल्गुनी) नक्षत्र के दिन मनाया जाता है। यह पर्व खासतौर पर तमिल हिंदुओं के लिए बहुत पवित्र माना जाता है और इसकी परंपरा हजारों साल पुरानी है। प्राचीन तमिल संगम साहित्य में भी इसका उल्लेख मिलता है, जिससे पता चलता है कि यह उत्सव करीब दो हजार वर्षों से मनाया जा रहा है।

इस दिन को ‘दिव्य विवाहों का दिन’ माना जाता है। मान्यता है कि इसी दिन भगवान शिव और माता पार्वती, भगवान मुरुगन और देवी देवसेना, भगवान राम और माता सीता, तथा भगवान रंगनाथ और देवी आंडाल का विवाह हुआ था। इसलिए यह त्योहार प्रेम, समर्पण और वैवाहिक संबंधों की पवित्रता का प्रतीक है।

तमिलनाडु के कई मंदिरों में यह उत्सव लगभग 10 दिनों तक चलता है। अंतिम दिन ‘थिरुकल्याणम’ (दिव्य विवाह समारोह) का आयोजन किया जाता है। इस दौरान मंदिरों को सुंदर तरीके से सजाया जाता है, भजन-कीर्तन होते हैं, रथ यात्राएं निकलती हैं और भक्त बड़ी संख्या में शामिल होते हैं।

यह दिन दांपत्य जीवन के लिए विशेष रूप से शुभ माना जाता है। विवाहित दंपत्ति अपने रिश्ते में प्रेम और सामंजस्य बनाए रखने की प्रार्थना करते हैं, जबकि अविवाहित लोग अच्छे जीवनसाथी की कामना करते हैं।

पंगुनी उथिरम 2026 कब है?

  • साल 2026 में पंगुनी उथिरम् 01 अप्रैल, बुधवार को मनाया जाएगा।
  • उथिरम् नक्षत्र 31 मार्च 2026 को दोपहर 03 बजकर 20 मिनट पर प्रारंभ होगा।
  • उथिरम् नक्षत्र 01 अप्रैल 2026 को शाम 04 बजकर 17 मिनट पर समाप्त होगा।

पंगुनी उथिरम का धार्मिक महत्व

स्कंद पुराण के अनुसार पंगुनी उथिरम आठ महाव्रतों में से एक अत्यंत कल्याणकारी व्रत माना गया है। इस दिन किया गया उपवास और पूजा विशेष फलदायी मानी जाती है।

यह पर्व मुख्य रूप से देवी-देवताओं के दिव्य विवाह की स्मृति में मनाया जाता है। भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह इस दिन होने की मान्यता है, जो शक्ति और शिव के मिलन का प्रतीक है। इसके अलावा भगवान मुरुगन और देवी देवसेना का विवाह भी इसी दिन हुआ था, जो देवताओं और असुरों के बीच संतुलन और धर्म की विजय का प्रतीक है।

धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन भगवान श्रीराम और माता सीता का विवाह भी हुआ था, जिससे यह पर्व और भी अधिक पवित्र हो जाता है। साथ ही, समुद्र मंथन के दौरान इसी दिन देवी महालक्ष्मी का प्राकट्य हुआ था, इसलिए इसे महालक्ष्मी जयंती के रूप में भी मनाया जाता है।

इस दिन भगवान अय्यप्पन के जन्म की भी मान्यता है, जो भगवान शिव और भगवान विष्णु के मोहिनी रूप के मिलन से उत्पन्न हुए थे। इन सभी मान्यताओं के कारण पंगुनी उथिरम का धार्मिक महत्व कई गुना बढ़ जाता है। यह दिन भक्तों के लिए भगवान के प्रति अपनी भक्ति और समर्पण व्यक्त करने का विशेष अवसर होता है। इस दिन की गई पूजा, व्रत और दान से व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक ऊर्जा आती है और उसके कष्ट दूर होते हैं।

धार्मिक मान्यता है कि पंगुनी उथिरम के दिन की गई पूजा और प्रार्थना का फल कई गुना अधिक मिलता है। जो लोग इस दिन सच्चे मन से भगवान की आराधना करते हैं, उनके जीवन में सकारात्मक बदलाव आते हैं और उनकी समस्याओं का निवारण होता है।

पंगुनी उथिरम कैसे मनाया जाता है?

पंगुनी उथिरम का उत्सव तमिलनाडु और दक्षिण भारत के अन्य हिस्सों में अत्यंत धूमधाम से मनाया जाता है। यह उत्सव कई स्थानों पर 10 दिनों तक चलता है, जिसमें हर दिन अलग-अलग धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।

मंदिरों को विशेष रूप से सजाया जाता है और भगवान की मूर्तियों को सुंदर वस्त्र और आभूषणों से अलंकृत किया जाता है। अंतिम दिन ‘थिरुकल्याणम’ यानी दिव्य विवाह समारोह आयोजित किया जाता है, जिसमें भगवान और देवी का विवाह विधि-विधान से कराया जाता है।

इस दिन सुबह से ही भक्त मंदिरों में पहुंचकर भगवान शिव, माता पार्वती और भगवान मुरुगन की पूजा करते हैं। मंदिरों में विशेष अभिषेक, आरती और भजन-कीर्तन होते हैं। भक्त भगवान के दर्शन करके अपने जीवन में सुख और शांति की कामना करते हैं।

इस दिन विशेष व्यंजन जैसे अप्पम, वड़ा, पायसम और ‘पाळ मंगई’ (दूध और कच्चे आम का प्रसाद) तैयार किए जाते हैं और भगवान को अर्पित किए जाते हैं।

पंगुनी उथिरम के अवसर पर कई स्थानों पर शोभायात्रा भी निकाली जाती है। भगवान की मूर्तियों को सुंदर रथों में सजाकर नगर में घुमाया जाता है। भक्त ढोल-नगाड़ों और भक्ति गीतों के साथ इस यात्रा में भाग लेते हैं।

भगवान मुरुगन के भक्त इस दिन कावड़ी लेकर मंदिरों तक पैदल यात्रा करते हैं। यह उनकी भक्ति और समर्पण का प्रतीक माना जाता है। कई लोग अपने व्रत और मनोकामना पूर्ण होने पर कावड़ी यात्रा करते हैं।

पंगुनी उथिरम पर पूजा विधि

पंगुनी उथिरम के दिन पूजा करने की विशेष विधि बताई गई है। इस दिन भक्त प्रातःकाल जल्दी उठकर स्नान करते हैं और स्वच्छ वस्त्र धारण करते हैं। इसके बाद घर के पूजा स्थल या मंदिर में भगवान शिव, माता पार्वती और भगवान मुरुगन की पूजा की जाती है।

सबसे पहले भगवान की मूर्ति या तस्वीर को साफ करके फूलों से सजाया जाता है। इसके बाद दीपक जलाकर भगवान का ध्यान किया जाता है। भक्त भगवान को फूल, फल, नारियल और प्रसाद अर्पित करते हैं।

पूजा के दौरान भगवान शिव और माता पार्वती के विवाह का स्मरण किया जाता है। भक्त “ॐ नमः शिवाय” और “ॐ सरवनभवाय नमः” जैसे मंत्रों का जप करते हैं। यह माना जाता है कि इन मंत्रों के जप से मन शांत होता है और भगवान की कृपा प्राप्त होती है।

इस दिन व्रत रखने का भी विशेष महत्व है। कई भक्त पूरे दिन उपवास रखते हैं और शाम को पूजा के बाद ही भोजन करते हैं। पूजा के अंत में आरती की जाती है और भगवान से परिवार की सुख-समृद्धि की प्रार्थना की जाती है।

इस प्रकार श्रद्धा और भक्ति के साथ की गई पूजा से भगवान प्रसन्न होते हैं और भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।

पंगुनी उथिरम के दिन किए जाने वाले विशेष अनुष्ठान

पंगुनी उथिरम के दिन भगवान मुरुगन के भक्त पूरे श्रद्धा भाव से कई खास अनुष्ठान करते हैं। इस दिन की सबसे प्रमुख परंपरा मंदिर तक पदयात्रा करना है। कई भक्त 3–4 दिनों तक पैदल चलकर लगभग 100 किलोमीटर दूर स्थित मंदिरों तक पहुंचते हैं। इस यात्रा के माध्यम से भक्त अपने मन को शुद्ध करते हैं और भगवान के प्रति समर्पण दिखाते हैं।

इस दिन “कावड़ी” अर्पण करना भी बहुत महत्वपूर्ण होता है। भक्त अपने कंधों पर सजी हुई कावड़ी लेकर चलते हैं, जिसमें दूध, पवित्र जल और फूल होते हैं। मंदिर पहुंचकर इनसे भगवान मुरुगन का अभिषेक किया जाता है। यह परंपरा भक्त की आस्था और भगवान के प्रति विश्वास को दर्शाती है।

कई मंदिरों, खासकर तमिलनाडु में, यह उत्सव लगभग 10 दिनों तक मनाया जाता है। इस दौरान भजन-कीर्तन, पूजा-अर्चना और धार्मिक कार्यक्रम लगातार चलते रहते हैं, जिससे पूरा वातावरण भक्तिमय हो जाता है।

इस दिन ‘थिरुकल्याणम’ (दिव्य विवाह) का आयोजन भी होता है, जिसमें भगवान और देवी के विवाह का उत्सव मनाया जाता है। इसे देखना बहुत शुभ माना जाता है और बड़ी संख्या में भक्त इसमें शामिल होते हैं।

इसके अलावा, कई लोग इस दिन व्रत भी रखते हैं। कुछ पूरे दिन उपवास करते हैं, जबकि कुछ फलाहार लेते हैं। मान्यता है कि इन अनुष्ठानों को करने से भगवान मुरुगन की कृपा मिलती है और जीवन में सुख-शांति आती है।

पंगुनी उथिरम के प्रमुख मंदिर

  • पंगुनी उथिरम का उत्सव विशेष रूप से दक्षिण भारत के कई प्रसिद्ध मंदिरों में बड़े पैमाने पर मनाया जाता है। इन मंदिरों में इस दिन लाखों भक्त दर्शन के लिए पहुंचते हैं।
  • तमिलनाडु का पलानी मुरुगन मंदिर पंगुनी उथिरम के लिए सबसे प्रसिद्ध स्थानों में से एक है। यहां इस दिन भव्य उत्सव और धार्मिक अनुष्ठान आयोजित किए जाते हैं। भक्त दूर-दूर से यहां भगवान मुरुगन के दर्शन करने आते हैं।
  • इसके अलावा तिरुचेंदूर मुरुगन मंदिर भी इस पर्व के लिए प्रसिद्ध है। यहां समुद्र के किनारे स्थित मंदिर में विशेष पूजा और शोभायात्रा आयोजित की जाती है।
  • मदुरै का मीनाक्षी अम्मन मंदिर भी इस पर्व के दौरान भक्तों से भरा रहता है। यहां भगवान शिव और देवी मीनाक्षी के दिव्य विवाह की स्मृति में विशेष समारोह आयोजित किए जाते हैं।

इन मंदिरों के अलावा दक्षिण भारत के कई अन्य मंदिरों में भी पंगुनी उथिरम का पर्व बड़े उत्साह और भक्ति के साथ मनाया जाता है।

पंगुनी उथिरम का आध्यात्मिक महत्व

पंगुनी उथिरम का पर्व आत्मिक शुद्धि और आध्यात्मिक जागृति का प्रतीक है। इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती के दिव्य मिलन को याद किया जाता है, जो शक्ति और चेतना के एकत्व का प्रतीक है। आध्यात्मिक दृष्टि से यह पर्व हमें यह सिखाता है कि जीवन में संतुलन और सामंजस्य कितना महत्वपूर्ण है। भगवान शिव और माता पार्वती का मिलन यह दर्शाता है कि जब शक्ति और चेतना एक साथ आती हैं, तब जीवन पूर्ण और संतुलित बनता है।

पंगुनी उथिरम से मिलने वाले लाभ

पंगुनी उथिरम पर व्रत पूजा के अनुष्ठान से भक्तों को कई आध्यात्मिक और मानसिक लाभ प्राप्त होते हैं। इस दिन भगवान की पूजा और व्रत करने से मन में शांति और सकारात्मक ऊर्जा आती है।

धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन भगवान शिव, माता पार्वती और भगवान मुरुगन की पूजा करने से वैवाहिक जीवन में सुख और सामंजस्य बढ़ता है। जो लोग अपने रिश्तों में समस्याओं का सामना कर रहे होते हैं, उन्हें इस दिन विशेष पूजा करने से लाभ मिलता है।

इस दिन व्रत और पूजा करने से व्यक्ति के जीवन में आने वाली बाधाएं दूर होती हैं और सकारात्मक परिवर्तन आने लगते हैं। कई लोग इस दिन अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए भगवान से प्रार्थना करते हैं और उन्हें विश्वास होता है कि उनकी इच्छाएं पूरी होंगी।

इसके अलावा इस दिन दान और सेवा करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। जरूरतमंद लोगों की मदद करने से व्यक्ति के जीवन में सुख और समृद्धि बढ़ती है।

तो ये थी ‘पंगुनी उथिरम्’ से जुड़ी संपूर्ण जानकारी। हमारी कामना है कि आपका यह व्रत सफल हो और ईश्वर की कृपा आप पर सदैव बनी रहे। ऐसे ही व्रत और त्योहारों से जुड़ी धार्मिक जानकारी प्राप्त करने के लिए जुड़े रहिए "श्री मंदिर" के साथ।

पंगुनी उथिरम से जुड़ी पौराणिक कथा

पंगुनी उथिरम से जुड़ी कई पौराणिक कथाएं इस पर्व को और भी विशेष बनाती हैं। सबसे प्रमुख कथा भगवान मुरुगन और देवी देवसेना (देवयानी) के विवाह से संबंधित है।

कथा के अनुसार देवसेना और वल्ली दो बहनें थीं, जो भगवान मुरुगन से विवाह करना चाहती थीं। बचपन में उनका नाम अमृतवल्ली और सुंदरवल्ली था, लेकिन बाद में वे अलग-अलग परिस्थितियों में अलग हो गईं। देवसेना को इंद्रदेव ने गोद लिया, जबकि वल्ली को एक आदिवासी राजा ने पाला।

जब भगवान मुरुगन ने असुरों का वध किया, तब इंद्रदेव प्रसन्न होकर अपनी पुत्री देवसेना का विवाह उनसे कर दिया। बाद में भगवान गणेश की सहायता से भगवान मुरुगन ने वल्ली से भी विवाह किया। इस प्रकार यह दिन भगवान मुरुगन के विवाह का प्रतीक बन गया।

एक अन्य प्रसिद्ध कथा ‘पूम्पावई’ से जुड़ी है, जिसमें एक व्यापारी की पुत्री सांप के काटने से मृत्यु को प्राप्त हो जाती है। बाद में संत सम्बंदर भगवान शिव की स्तुति करके उसे पुनर्जीवित करते हैं। इस कथा में भी पंगुनी उथिरम के उत्सव का उल्लेख मिलता है, जिससे इस पर्व की प्राचीनता सिद्ध होती है।

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Published by Sri Mandir·April 1, 2026

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