मातंगी जयंती कब है 2026?
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मातंगी जयंती कब है 2026?

क्या आप जानना चाहते हैं कि 2026 में मातंगी जयंती कब मनाई जाएगी और इसका क्या महत्व है? इस लेख में जानिए मातंगी जयंती की तिथि, पूजा विधि, धार्मिक महत्व, परंपराएँ और इस दिन किए जाने वाले शुभ कार्यों की पूरी जानकारी।

मातंगी जयंती के बारे में

वैशाख महीने के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि (तीसरे दिन) को मातंगी जयंती मनाई जाती है। अंग्रेजी कैलेंडर के हिसाब से यह पर्व आमतौर पर अप्रैल या मई में आता है।

मातंगी जयंती कब है?

साल 2026 में मातंगी जयंती सोमवार, 20 अप्रैल को मनाई जाएगी। यह पर्व हर साल वैशाख महीने के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि (अक्षय तृतीया) के दिन आता है। यह दिन दस महाविद्याओं में से एक देवी मातंगी की पूजा के लिए समर्पित है, जिन्हें वाणी, ज्ञान और संगीत की देवी माना जाता है।

तिथि: 20 अप्रैल 2026 (सोमवार)

शुभ समय: तृतीया तिथि 19 अप्रैल 2026 को सुबह 10:49 बजे शुरू होगी और 20 अप्रैल 2026 को सुबह 7:27 बजे समाप्त होगी।

मातंगी जयंती क्या है?

मातंगी जयंती वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया, यानी अक्षय तृतीया के दिन मनाई जाती है। यह दिन दस महाविद्याओं में नौवीं महाविद्या, देवी मातंगी के प्रकट होने का प्रतीक माना जाता है। देवी मातंगी को ‘तांत्रिक सरस्वती’ कहा जाता है, जो ज्ञान, वाणी, संगीत और कला की अधिष्ठात्री हैं। इस दिन उनकी पूजा करने से वैवाहिक जीवन में सुख-शांति, कला में निपुणता और ज्ञान की प्राप्ति होती है।

मातंगी जयंती का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व

देवी मातंगी दस महाविद्याओं में एक विशेष स्थान रखती हैं। उनका रंग सांवला बताया गया है, लेकिन उनका रूप बहुत ही आकर्षक और मनभावन माना जाता है। उनका स्वरूप मां सरस्वती से मिलता-जुलता दिखाई देता है, खासकर इसलिए क्योंकि वे भी वीणा धारण करती हैं।

सरस्वती और मातंगी में अंतर: मां सरस्वती जहां ज्ञान, शिक्षा और कला के सात्विक रूप की प्रतीक हैं, वहीं देवी मातंगी का स्वरूप तांत्रिक माना जाता है। उनकी साधना से ऐसी शक्तियां प्राप्त होने की मान्यता है, जिनसे व्यक्ति मन और विचारों पर प्रभाव डाल सकता है। प्रतीक और उनका महत्व: देवी मातंगी के हाथों में जप माला, कमल, तोता, शंख और चक्र होते हैं। वीणा कला और सृजन का संकेत देती है तोता वाणी और अभिव्यक्ति का प्रतीक है। जप माला मंत्रों की शक्ति को दर्शाती है। ये सभी मिलकर ज्ञान, ध्वनि और शक्ति के गहरे संबंध को बताते हैं। ज्ञान का महत्व: ज्ञान को सबसे बड़ी शक्ति माना गया है। जितना अधिक व्यक्ति सीखता है, उतनी ही उसकी समझ और कौशल मजबूत होते जाते हैं। अन्य नाम और विशेषताएं: देवी मातंगी को ‘उच्छिष्ट चांडालिनी’ और ‘उच्छिष्ट मातंगिनी’ भी कहा जाता है। वे 64 कलाओं की अधिष्ठात्री मानी जाती हैं और मनुष्य को सुनने, बोलने, समझने, सीखने और तर्क करने की क्षमता प्रदान करती हैं।

मातंगी जयंती से जुड़ी परंपराएं और मान्यताएं

पूजा विधि और अनुष्ठान: भक्त सुबह स्नान करके देवी मातंगी की मूर्ति या तस्वीर स्थापित करते हैं। इसके बाद उन्हें लाल फूल, माला और नारियल चढ़ाया जाता है। कुछ जगहों पर ‘उच्छिष्ट’ यानी विशेष प्रसाद अर्पित करने की अलग परंपरा भी होती है। वाणी और कला की कृपा: देवी मातंगी को वाणी और संगीत की देवी माना जाता है। ऐसा विश्वास है कि उनकी पूजा करने से बोलने की क्षमता बेहतर होती है, ज्ञान में वृद्धि होती है और संगीत, नृत्य जैसी कलाओं में निपुणता आती है। ज्ञान और तांत्रिक शक्ति: मां मातंगी को ‘तांत्रिक सरस्वती’ भी कहा जाता है। उनकी उपासना से तांत्रिक ज्ञान की प्राप्ति होती है और नकारात्मक शक्तियों से बचाव होता है। विवाह और दांपत्य सुख: देवी मातंगी की पूजा सुखी वैवाहिक जीवन और अच्छा जीवनसाथी पाने के लिए भी की जाती है। विशेष रूपों की पूजा: देवी के सुमुखा और राजमातंगी रूपों की आराधना से व्यक्ति को आकर्षण और सकारात्मक प्रभाव की शक्ति प्राप्त होने की मान्यता है। हरे रंग का महत्व: कहा जाता है कि देवी मातंगी को हरा रंग प्रिय है, जो ज्ञान और बुध ग्रह से जुड़ा होता है। इसलिए इस दिन लोग हरे रंग के वस्त्र पहनना शुभ मानते हैं।

मातंगी जयंती की तैयारी कैसे की जाती है?

स्थापना और सजावट: पूजा के लिए घर के मंदिर में एक चौकी रखें और उस पर लाल कपड़ा बिछाएं। इसके ऊपर देवी मातंगी की तस्वीर या मूर्ति और यदि यंत्र हो तो उसे भी स्थापित करें।

पूजन सामग्री: पूजा के लिए लाल फूल (गुलाब या गुड़हल), मूँगा माला, गंगाजल, अगरबत्ती, घी का दीपक, सुपारी और फल-फूल तैयार रखें।

पूजा करने का तरीका

  • आसन और दिशा: लाल आसन पर बैठें और अपना मुख पश्चिम दिशा की ओर रखें।
  • संकल्प: देवी मातंगी का ध्यान करें और उनसे अपनी पूजा स्वीकार करने की प्रार्थना करें।
  • भोग: देवी को ‘उच्छिष्ट’ यानी विशेष प्रसाद अर्पित करने की परंपरा है, जो समानता का संदेश देती है। आप साधारण भोजन या प्रसाद भी चढ़ा सकते हैं।
  • मंत्र जाप: देवी के मंत्रों का जाप करें, जैसे: “ॐ ह्रीं ऐं श्रीं नमो भगवती उच्छिष्ट चांडाली श्री मातंगेश्वरी सर्वजन वशंकर स्वाहा”
  • इस मंत्र का कम से कम 1000 बार या अधिक जप करना शुभ माना जाता है।
  • आरती: अंत में देवी मातंगी की आरती करके पूजा को पूर्ण करें।

मातंगी जयंती के दिन किए जाने वाले शुभ कार्य

विशेष पूजा का समय: देवी मातंगी की पूजा शाम या रात में, खासकर रात 9 बजे के बाद करना शुभ माना जाता है। पूजा के लिए चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर माता की तस्वीर या यंत्र रखें और घी का दीपक जलाएं। मंत्र जाप: देवी को प्रसन्न करने के लिए “ॐ ह्रीं क्लीं हूं मातंग्यै फट् स्वाहा” मंत्र का कम से कम 108 बार या उससे अधिक जप करें। हवन का महत्व: हवन के लिए शहद में मिले महुए या पलाश के फूलों का उपयोग करना शुभ माना जाता है। इससे वाणी में मधुरता और आकर्षण बढ़ता है। भोग और प्रसाद: देवी को लाल फूल, नारियल और भोग में मिश्री या हलवा चढ़ाएं। कन्या पूजन: इस दिन छोटी कन्याओं को भोजन कराकर उन्हें कपड़े या उपहार देना शुभ माना जाता है। इससे देवी की कृपा प्राप्त होती है। यंत्र स्थापना: पूजा के बाद मातंगी यंत्र को लाल कपड़े में लपेटकर तिजोरी या मंदिर में सुरक्षित रखना शुभ होता है।

मातंगी जयंती का महत्व

ज्ञान और वाणी की देवी: माता मातंगी को ‘तंत्र की सरस्वती’ कहा जाता है। उनकी कृपा से संगीत, नृत्य, गायन और अन्य कलाओं में दक्षता मिलती है। वैवाहिक सुख: उनकी पूजा करने से वैवाहिक जीवन में खुशियां आती हैं और परिवार में प्यार व मेलजोल बना रहता है। सुख और समृद्धि: देवी मातंगी की आराधना से जीवन के डर दूर होते हैं और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है। आकर्षण और वाणी की शक्ति: माता मातंगी को आकर्षण और वाणी की देवी भी माना जाता है। उनकी कृपा से व्यक्ति की बातों में प्रभाव और मधुरता आती है। तांत्रिक महत्व: यह दिन तंत्र साधना के लिए खास माना जाता है। इस दिन साधना करने से विशेष शक्तियां प्राप्त होने की मान्यता है।

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Published by Sri Mandir·April 15, 2026

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