जन्माष्टमी (इस्कॉन) कब है?
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जन्माष्टमी (इस्कॉन) कब है?

क्या आप जानना चाहते हैं कि जन्माष्टमी (ISKCON) कब मनाई जाती है और इसका धार्मिक महत्व क्या है? इस लेख में जानिए भगवान श्रीकृष्ण जन्माष्टमी (ISKCON) की तिथि, पूजा-विधि, शुभ मुहूर्त, व्रत के नियम, पौराणिक महत्व और इस दिन किए जाने वाले विशेष उत्सवों की संपूर्ण जानकारी।

जन्माष्टमी (ISKCON) के बारे में

इस्कॉन (ISKCON) में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का त्योहार बेहद धूमधाम और भक्तिभाव से मनाया जाता है। इस दिन मंदिरों को भव्य रूप से सजाया जाता है और मध्यरात्रि में भगवान श्रीकृष्ण का दिव्य महाअभिषेक और आरती की जाती है। श्रद्धालु 'हरे कृष्ण' महामंत्र के कीर्तन और भजन में लीन रहते हैं। भगवान को 56 भोग अर्पित कर भक्तों में महाप्रसाद वितरित किया जाता है, जो आध्यात्मिक ऊर्जा और सांस्कृतिक एकता का अद्भुत प्रतीक है।

जन्माष्टमी (ISKCON) कब है?

भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव के रूप में मनाई जाने वाली जन्माष्टमी हिंदू धर्म का एक प्रमुख और पवित्र त्योहार है। International Society for Krishna Consciousness यानी ISKCON मंदिरों में यह पर्व विशेष भक्ति और उत्साह के साथ मनाया जाता है। वर्ष 2026 में ISKCON के अनुसार जन्माष्टमी 2 सितंबर, बुधवार को मनाई जाएगी। जन्माष्टमी भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को आती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इसी दिन आधी रात को मथुरा की जेल में भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था। ISKCON में इस दिन को केवल एक त्योहार नहीं बल्कि भगवान श्रीकृष्ण के दिव्य अवतरण दिवस के रूप में देखा जाता है। ISKCON मंदिरों में जन्माष्टमी की तैयारियां कई दिन पहले से शुरू हो जाती हैं। मंदिरों को रंग-बिरंगी लाइटों, फूलों और झांकियों से सजाया जाता है।

भक्त दिनभर व्रत रखते हैं और रात 12 बजे भगवान कृष्ण के जन्म के समय विशेष आरती और कीर्तन करते हैं। “हरे कृष्ण” महामंत्र का जाप पूरे वातावरण को भक्तिमय बना देता है। इस दिन भगवान कृष्ण को नए वस्त्र और आभूषण पहनाए जाते हैं। दूध, दही, मक्खन, फल और मिठाइयों का विशेष भोग लगाया जाता है। भक्त श्रीमद्भगवद्गीता और श्रीकृष्ण की लीलाओं का श्रवण भी करते हैं। ISKCON में जन्माष्टमी केवल धार्मिक आयोजन नहीं है, बल्कि यह प्रेम, भक्ति और आध्यात्मिक जागरूकता का उत्सव माना जाता है। इस दिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु मंदिर पहुंचते हैं और भगवान श्रीकृष्ण का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। इस प्रकार जन्माष्टमी का पर्व भक्तों के लिए श्रद्धा, आनंद और भगवान कृष्ण से जुड़ने का विशेष अवसर माना जाता है।

भगवान श्रीकृष्ण का 5253वां जन्मोत्सव

  • कृष्ण जन्माष्टमी शुक्रवार, सितम्बर 4, 2026 को
  • निशिता पूजा का समय - 11:34 पी एम से 12:20 ए एम, सितम्बर 05
  • अवधि - 00 घण्टे 46 मिनट्स
  • दही हाण्डी शनिवार, सितम्बर 5, 2026 को
  • धर्म शास्त्र के अनुसार पारण समय
  • पारण समय - 05:40 ए एम, सितम्बर 05 के बाद

पारण के दिन अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र सूर्योदय से पहले समाप्त हो गये।

  • वर्तमान में समाज में प्रचलित पारण समय
  • पारण समय - 12:20 ए एम, सितम्बर 05 के बाद

भारत में कई स्थानों पर, पारण निशिता यानी हिन्दु मध्यरात्रि के बाद किया जाता है।

  • मध्यरात्रि का क्षण - 11:57 पी एम
  • चन्द्रोदय समय - 11:14 पी एम Krishna Dashami
  • अष्टमी तिथि प्रारम्भ - सितम्बर 04, 2026 को 02:25 ए एम बजे
  • अष्टमी तिथि समाप्त - सितम्बर 05, 2026 को 12:13 ए एम बजे
  • रोहिणी नक्षत्र प्रारम्भ - सितम्बर 04, 2026 को 12:29 ए एम बजे
  • रोहिणी नक्षत्र समाप्त - सितम्बर 04, 2026 को 11:04 पी एम बजे

इस दिन शुभ मुहूर्त

  • ब्रह्म मुहूर्त - 04:08 ए एम से 04:54 ए एम
  • प्रातः सन्ध्या - 04:31 ए एम से 05:40 ए एम
  • अभिजित मुहूर्त - 11:32 ए एम से 12:22 पी एम
  • विजय मुहूर्त - 02:03 पी एम से 02:53 पी एम
  • गोधूलि मुहूर्त - 06:14 पी एम से 06:37 पी एम
  • सायाह्न सन्ध्या - 06:14 पी एम से 07:23 पी एम
  • अमृत काल - 08:03 पी एम से 09:33 पी एम
  • निशिता मुहूर्त - 11:34 पी एम से 12:20 ए एम, सितम्बर 05

जन्माष्टमी (ISKCON) क्या है?

जन्माष्टमी भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाने वाला एक पवित्र हिंदू त्योहार है। International Society for Krishna Consciousness यानी ISKCON में यह पर्व अत्यंत भक्ति, उत्साह और आध्यात्मिक वातावरण के साथ मनाया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद माह की कृष्ण पक्ष अष्टमी तिथि को मथुरा में हुआ था। उन्होंने अधर्म का नाश करने और धर्म की स्थापना के लिए पृथ्वी पर अवतार लिया। ISKCON में भगवान कृष्ण को सर्वोच्च परमेश्वर माना जाता है, इसलिए जन्माष्टमी को विशेष महत्व दिया जाता है। इस दिन भक्त उपवास रखते हैं और पूरे दिन भजन-कीर्तन, मंत्र जाप और श्रीकृष्ण की लीलाओं का स्मरण करते हैं। ISKCON मंदिरों में ‘हरे कृष्ण, हरे राम’ महामंत्र का निरंतर संकीर्तन किया जाता है।

मंदिरों को फूलों, दीपों और सुंदर झांकियों से सजाया जाता है। रात 12 बजे भगवान कृष्ण के जन्म का विशेष उत्सव मनाया जाता है। आरती होती है, शंख बजाए जाते हैं और भक्त आनंद के साथ जयकारे लगाते हैं। भगवान को नए वस्त्र, मुकुट और आभूषण पहनाए जाते हैं। दूध, मक्खन, मिठाई और फलों का भोग लगाया जाता है। जन्माष्टमी केवल एक धार्मिक पर्व नहीं है, बल्कि यह प्रेम, सेवा और भक्ति का संदेश भी देता है। ISKCON के माध्यम से लोग भगवान कृष्ण की शिक्षाओं को अपने जीवन में अपनाने की प्रेरणा लेते हैं। यह त्योहार लोगों को सच्चाई, करुणा और आध्यात्मिक जीवन की ओर बढ़ने का मार्ग दिखाता है। इसी कारण जन्माष्टमी दुनिया भर में लाखों भक्तों द्वारा श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाई जाती है।

जन्माष्टमी (ISKCON) का महत्व

जन्माष्टमी हिंदू धर्म का अत्यंत महत्वपूर्ण पर्व है और International Society for Krishna Consciousness यानी ISKCON में इसका विशेष महत्व माना जाता है। यह दिन भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। भक्तों के लिए यह केवल त्योहार नहीं बल्कि भगवान के प्रति प्रेम और भक्ति प्रकट करने का अवसर होता है। भगवान श्रीकृष्ण ने धर्म की रक्षा और अधर्म के नाश के लिए अवतार लिया था। उन्होंने गीता के माध्यम से मानव जीवन को सही मार्ग दिखाया। ISKCON में जन्माष्टमी का महत्व इसलिए भी अधिक है क्योंकि यहां भगवान कृष्ण की भक्ति को जीवन का मुख्य उद्देश्य माना जाता है। इस पर्व का आध्यात्मिक महत्व बहुत बड़ा है। भक्त उपवास रखकर मन और आत्मा की शुद्धि का प्रयास करते हैं। भजन-कीर्तन, मंत्र जाप और श्रीकृष्ण की कथा सुनने से सकारात्मक ऊर्जा और शांति का अनुभव होता है। जन्माष्टमी समाज में प्रेम, सेवा और भाईचारे का संदेश भी देती है।

ISKCON मंदिरों में इस दिन हजारों भक्त एक साथ पूजा और कीर्तन करते हैं। इससे लोगों में एकता और आध्यात्मिक जुड़ाव बढ़ता है। यह पर्व युवाओं और बच्चों को भारतीय संस्कृति और धार्मिक मूल्यों से जोड़ने का भी कार्य करता है। मंदिरों में सांस्कृतिक कार्यक्रम, झांकियां और धार्मिक प्रवचन आयोजित किए जाते हैं, जिससे नई पीढ़ी भगवान कृष्ण के जीवन और शिक्षाओं को समझ पाती है। जन्माष्टमी हमें यह सिखाती है कि जीवन में सत्य, धर्म और करुणा का पालन करना चाहिए। भगवान कृष्ण की शिक्षाएं आज भी लोगों को सही दिशा देने का काम करती हैं। इस प्रकार ISKCON में जन्माष्टमी का महत्व धार्मिक, सामाजिक और आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यंत विशेष माना जाता है। यह पर्व भक्तों के जीवन में श्रद्धा, आनंद और आत्मिक शांति लाता है।

जन्माष्टमी (ISKCON) का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व

जन्माष्टमी का पर्व भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है और International Society for Krishna Consciousness यानी ISKCON में इसका धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व बहुत अधिक माना जाता है। यह दिन भक्तों को भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति और उनकी शिक्षाओं से जुड़ने का अवसर देता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण ने पृथ्वी पर अधर्म को समाप्त करने और धर्म की स्थापना के लिए अवतार लिया था। उन्होंने गीता के माध्यम से कर्म, भक्ति और सत्य का संदेश दिया। ISKCON में भगवान कृष्ण को परमेश्वर का पूर्ण अवतार माना जाता है, इसलिए जन्माष्टमी यहां सबसे बड़े उत्सवों में से एक होती है। आध्यात्मिक रूप से यह पर्व मन और आत्मा की शुद्धि का प्रतीक माना जाता है। भक्त दिनभर उपवास रखते हैं और ‘हरे कृष्ण’ महामंत्र का जाप करते हैं। इससे मन शांत होता है और भगवान के प्रति श्रद्धा बढ़ती है।

जन्माष्टमी के अवसर पर मंदिरों में भजन-कीर्तन, प्रवचन और गीता पाठ आयोजित किए जाते हैं। भक्त भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं और जीवन से प्रेरणा लेते हैं। यह पर्व लोगों को भौतिक जीवन से ऊपर उठकर आध्यात्मिक जीवन अपनाने की प्रेरणा देता है। ISKCON में सेवा और भक्ति को सबसे बड़ा धर्म माना जाता है। जन्माष्टमी के दिन भक्त मंदिरों में सेवा करते हैं, प्रसाद वितरण करते हैं और जरूरतमंदों की सहायता भी करते हैं। यह पर्व प्रेम, करुणा और मानवता का संदेश देता है। भगवान कृष्ण की शिक्षाएं लोगों को सच्चाई, धैर्य और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती हैं। इस प्रकार जन्माष्टमी केवल धार्मिक उत्सव नहीं बल्कि आत्मिक शांति, भक्ति और सकारात्मक जीवन का प्रतीक है, जो भक्तों को भगवान श्रीकृष्ण के और करीब लाता है।

जन्माष्टमी (ISKCON) से जुड़ी परंपराएं और जागरूकता

जन्माष्टमी का पर्व International Society for Krishna Consciousness यानी ISKCON में कई धार्मिक परंपराओं और आध्यात्मिक गतिविधियों के साथ मनाया जाता है। यह पर्व भगवान श्रीकृष्ण के जन्म की खुशी में भक्तों को एक साथ जोड़ता है और समाज में सकारात्मक जागरूकता फैलाने का कार्य करता है। इस पर्व की सबसे प्रमुख परंपरा उपवास रखना है। भक्त पूरे दिन अन्न का त्याग करते हैं और केवल फलाहार लेते हैं। रात 12 बजे भगवान श्रीकृष्ण के जन्म के बाद व्रत खोला जाता है। ISKCON मंदिरों में ‘हरे कृष्ण’ महामंत्र का संकीर्तन लगातार किया जाता है। भजन-कीर्तन, नृत्य और श्रीकृष्ण की लीलाओं की झांकियां भक्तों को आध्यात्मिक आनंद प्रदान करती हैं। मंदिरों को फूलों और रंगीन लाइटों से सजाया जाता है। भगवान श्रीकृष्ण को नए वस्त्र और आभूषण पहनाए जाते हैं। दूध, दही, मक्खन, फल और मिठाइयों का विशेष भोग लगाया जाता है। कई भक्त गीता पाठ और धार्मिक प्रवचन सुनकर भगवान की शिक्षाओं को समझने का प्रयास करते हैं।

जन्माष्टमी के माध्यम से ISKCON समाज में आध्यात्मिक जागरूकता फैलाता है। लोगों को नशामुक्ति, सात्विक भोजन और सकारात्मक जीवन अपनाने के लिए प्रेरित किया जाता है। मंदिरों में प्रसाद वितरण और सेवा कार्य भी किए जाते हैं। यह पर्व युवाओं और बच्चों को भारतीय संस्कृति से जोड़ने का महत्वपूर्ण माध्यम है। सांस्कृतिक कार्यक्रमों और धार्मिक कथाओं के जरिए उन्हें भगवान कृष्ण के आदर्शों की जानकारी दी जाती है। जन्माष्टमी हमें प्रेम, करुणा और सेवा का महत्व सिखाती है। यह त्योहार लोगों को भक्ति के मार्ग पर चलने और समाज में सद्भाव बनाए रखने की प्रेरणा देता है। इस प्रकार ISKCON में जन्माष्टमी से जुड़ी परंपराएं केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं हैं, बल्कि समाज को जागरूक और सकारात्मक बनाने का भी माध्यम हैं।

जन्माष्टमी (ISKCON) की तैयारी कैसे की जाती है?

जन्माष्टमी का पर्व International Society for Krishna Consciousness यानी ISKCON में बड़े उत्साह और भक्ति के साथ मनाया जाता है। इसकी तैयारियां कई दिन पहले से शुरू हो जाती हैं। मंदिरों और घरों में भक्त भगवान श्रीकृष्ण के स्वागत के लिए विशेष व्यवस्था करते हैं। सबसे पहले मंदिरों और पूजा स्थलों की साफ-सफाई की जाती है। इसके बाद फूलों, रंगीन लाइटों और सुंदर सजावट से मंदिरों को आकर्षक बनाया जाता है। कई जगहों पर भगवान कृष्ण की बाल लीलाओं की झांकियां भी तैयार की जाती हैं। भक्त जन्माष्टमी के लिए विशेष पूजा सामग्री एकत्र करते हैं। इसमें फूल, दीपक, अगरबत्ती, मक्खन, दूध, दही, फल और मिठाइयां शामिल होती हैं। भगवान श्रीकृष्ण के लिए नए वस्त्र और आभूषण भी तैयार किए जाते हैं। ISKCON मंदिरों में भजन-कीर्तन और सांस्कृतिक कार्यक्रमों की तैयारी की जाती है। कई भक्त नृत्य और धार्मिक प्रस्तुतियों का अभ्यास करते हैं। गीता पाठ और प्रवचनों की व्यवस्था भी की जाती है।

जन्माष्टमी के दिन उपवास रखने की तैयारी भी पहले से की जाती है। भक्त सात्विक भोजन ग्रहण करते हैं और मन को शांत रखने का प्रयास करते हैं। कई लोग इस अवसर पर सेवा कार्यों में भाग लेने का संकल्प लेते हैं। मंदिरों में आने वाले श्रद्धालुओं के लिए प्रसाद वितरण और अन्य व्यवस्थाएं भी की जाती हैं। स्वयंसेवक भक्तों की सहायता और आयोजन को सफल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।घरों में भी छोटे मंदिर सजाए जाते हैं और भगवान कृष्ण की मूर्ति को सुंदर कपड़े पहनाए जाते हैं। बच्चे कृष्ण और राधा के रूप में तैयार होकर सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भाग लेते हैं। इस प्रकार जन्माष्टमी की तैयारी केवल सजावट तक सीमित नहीं होती, बल्कि यह श्रद्धा, सेवा, अनुशासन और भक्ति का सुंदर रूप होती है, जो पूरे वातावरण को भक्तिमय बना देती है।

जन्माष्टमी (ISKCON) कैसे मनाई जाती है?

जन्माष्टमी का पर्व International Society for Krishna Consciousness यानी ISKCON में अत्यंत श्रद्धा, भक्ति और उत्साह के साथ मनाया जाता है। यह भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव का विशेष अवसर होता है, जिसमें हजारों भक्त शामिल होते हैं। इस दिन भक्त सुबह से ही उपवास रखते हैं और भगवान कृष्ण का स्मरण करते हैं। मंदिरों में पूरे दिन भजन-कीर्तन और ‘हरे कृष्ण’ महामंत्र का जाप चलता रहता है। वातावरण पूरी तरह भक्तिमय हो जाता है। ISKCON मंदिरों को फूलों, रंगीन लाइटों और झांकियों से सुंदर तरीके से सजाया जाता है। भगवान कृष्ण और राधा की मूर्तियों को नए वस्त्र और आभूषण पहनाए जाते हैं। दूध, दही, मक्खन, फल और मिठाइयों का विशेष भोग लगाया जाता है। जन्माष्टमी की सबसे खास पूजा रात 12 बजे होती है, क्योंकि धार्मिक मान्यता के अनुसार इसी समय भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था। आधी रात को शंख और घंटियों की ध्वनि के साथ आरती की जाती है।

भक्त खुशी से जयकारे लगाते हैं और भगवान के जन्म का उत्सव मनाते हैं। मंदिरों में श्रीमद्भगवद्गीता का पाठ, धार्मिक प्रवचन और कृष्ण लीलाओं की प्रस्तुतियां भी आयोजित की जाती हैं। बच्चे भगवान कृष्ण और राधा के रूप में सजकर कार्यक्रमों में भाग लेते हैं। कई स्थानों पर प्रसाद वितरण और सेवा कार्य भी किए जाते हैं। भक्त जरूरतमंद लोगों को भोजन और सहायता प्रदान करते हैं। ISKCON में सेवा और भक्ति को विशेष महत्व दिया जाता है। यह पर्व लोगों को प्रेम, करुणा और आध्यात्मिक जीवन की ओर प्रेरित करता है। भक्त भगवान श्रीकृष्ण की शिक्षाओं को अपने जीवन में अपनाने का संकल्प लेते हैं। इस प्रकार ISKCON में जन्माष्टमी केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि भक्ति, आनंद और आध्यात्मिक जागरूकता का महान उत्सव माना जाता है।

जन्माष्टमी (ISKCON) के दिन किए जाने वाले कार्य

जन्माष्टमी के दिन International Society for Krishna Consciousness यानी ISKCON में कई धार्मिक और आध्यात्मिक कार्य किए जाते हैं। यह दिन भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति और सेवा के लिए समर्पित माना जाता है। सुबह जल्दी उठकर स्नान करना और साफ कपड़े पहनना इस दिन की शुरुआत मानी जाती है। भक्त घर और मंदिर में भगवान श्रीकृष्ण की पूजा करते हैं। कई लोग पूरे दिन उपवास रखते हैं और केवल फलाहार ग्रहण करते हैं। ISKCON मंदिरों में भजन-कीर्तन और “हरे कृष्ण” महामंत्र का जाप लगातार किया जाता है। भक्त नृत्य और संकीर्तन में भाग लेकर भगवान की भक्ति में लीन हो जाते हैं। भगवान कृष्ण को नए वस्त्र और आभूषण पहनाए जाते हैं। दूध, दही, मक्खन, फल और मिठाइयों का विशेष भोग लगाया जाता है। मंदिरों में सुंदर झांकियां सजाई जाती हैं, जो भगवान कृष्ण की बाल लीलाओं को दर्शाती हैं। श्रीमद्भगवद्गीता का पाठ और धार्मिक प्रवचन सुनना भी इस दिन का महत्वपूर्ण हिस्सा होता है।

भक्त भगवान कृष्ण की शिक्षाओं को समझने और अपने जीवन में अपनाने का प्रयास करते हैं। रात 12 बजे भगवान कृष्ण के जन्म के समय विशेष आरती होती है। शंख, घंटियां और जयकारों के साथ जन्मोत्सव मनाया जाता है। इसके बाद भक्त अपना व्रत खोलते हैं और प्रसाद ग्रहण करते हैं। ISKCON में सेवा कार्यों को भी विशेष महत्व दिया जाता है। कई भक्त प्रसाद वितरण, मंदिर सेवा और जरूरतमंदों की सहायता करते हैं। इससे समाज में प्रेम और करुणा का भाव बढ़ता है। बच्चे कृष्ण और राधा के रूप में सजकर सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भाग लेते हैं। इससे नई पीढ़ी भारतीय संस्कृति और धार्मिक मूल्यों से जुड़ती है। इस प्रकार जन्माष्टमी के दिन किए जाने वाले कार्य भक्ति, सेवा, प्रेम और आध्यात्मिक जीवन का सुंदर संदेश देते हैं।

जन्माष्टमी (ISKCON) का संदेश

जन्माष्टमी का पर्व International Society for Krishna Consciousness यानी ISKCON में केवल भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव के रूप में नहीं, बल्कि जीवन को सही दिशा देने वाले संदेश के रूप में मनाया जाता है। यह पर्व प्रेम, भक्ति, सेवा और धर्म का महत्व समझाता है। भगवान श्रीकृष्ण ने अपने जीवन और गीता के उपदेशों के माध्यम से मानवता को सत्य और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी। जन्माष्टमी हमें सिखाती है कि कठिन परिस्थितियों में भी धैर्य और विश्वास बनाए रखना चाहिए। यह पर्व प्रेम और करुणा का संदेश देता है। भगवान कृष्ण ने सभी लोगों के साथ समान व्यवहार करने और मानवता की सेवा करने की शिक्षा दी। ISKCON में भक्त सेवा और दया को सबसे बड़ा धर्म मानते हैं। जन्माष्टमी हमें आध्यात्मिक जीवन अपनाने की प्रेरणा भी देती है। “हरे कृष्ण” महामंत्र का जाप मन को शांति और सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करता है।

यह पर्व लोगों को तनाव और नकारात्मक सोच से दूर रहने का मार्ग दिखाता है। यह त्योहार समाज में एकता और भाईचारे का संदेश भी फैलाता है। मंदिरों में हजारों लोग मिलकर पूजा और कीर्तन करते हैं, जिससे प्रेम और सद्भाव बढ़ता है। जन्माष्टमी सात्विक जीवनशैली अपनाने की प्रेरणा देती है। ISKCON के माध्यम से लोगों को नशामुक्ति, शुद्ध भोजन और अनुशासित जीवन का महत्व समझाया जाता है। यह पर्व युवाओं और बच्चों को भारतीय संस्कृति और धार्मिक मूल्यों से जोड़ने का कार्य भी करता है। भगवान कृष्ण के आदर्श जीवन से नई पीढ़ी को सही दिशा मिलती है। इस प्रकार जन्माष्टमी का संदेश केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सत्य, प्रेम, सेवा, करुणा और आध्यात्मिक जीवन का मार्ग दिखाने वाला प्रेरणादायक पर्व है।

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Published by Sri Mandir·August 19, 2026

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