
क्या आप जानना चाहते हैं कि डोल पूर्णिमा 2026 में कब है और इसका धार्मिक महत्व क्या है? इस लेख में जानिए सही तिथि, पूजा-विधि, शुभ मुहूर्त, व्रत के नियम और इस दिन श्री Krishna की भक्ति से मिलने वाले पुण्य फल – सब कुछ सरल और स्पष्ट भाषा में।
डोल पूर्णिमा फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाने वाला एक पवित्र हिन्दू पर्व है। यह विशेष रूप से भगवान श्रीकृष्ण और राधा जी की पूजा से जुड़ा है। इस दिन मंदिरों में ठाकुर जी को झूले (डोल) में विराजित कर भजन-कीर्तन किया जाता है। कई स्थानों पर यह होली उत्सव के रूप में भी मनाई जाती है। डोल पूर्णिमा प्रेम, भक्ति और उल्लास का संदेश देती है।
डोल पूर्णिमा हिंदू धर्म का एक महत्वपूर्ण पर्व है, जो फाल्गुन मास की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है। इसे वसंत पूर्णिमा भी कहा जाता है। यह दिन वसंत ऋतु के मध्य में आता है और प्रकृति में नई ऊर्जा और उत्साह का संचार करता है। डोल पूर्णिमा का विशेष संबंध भगवान श्रीकृष्ण और राधा रानी की भक्ति से है। पश्चिम बंगाल, ओडिशा, मथुरा और वृंदावन में यह पर्व विशेष रूप से धूमधाम से मनाया जाता है। डोल पूर्णिमा को दोल यात्रा या दोल उत्सव भी कहा जाता है। “डोल” शब्द का अर्थ है झूला। इस दिन राधा-कृष्ण की प्रतिमा को सुंदर झूले पर बैठाकर पूजा की जाती है। भक्तजन प्रेम और श्रद्धा के साथ इस उत्सव में भाग लेते हैं
वर्ष 2026 में डोल पूर्णिमा 03 मार्च 2026, मंगलवार को मनाई जाएगी। पूर्णिमा तिथि का प्रारम्भ 02 मार्च 2026 को शाम 05 बजकर 55 मिनट से होगा। पूर्णिमा तिथि का समापन 03 मार्च 2026 को शाम 05 बजकर 07 मिनट तक रहेगा। पूर्णिमा तिथि में स्नान, दान और पूजा का विशेष महत्व माना जाता है।
इन शुभ समयों में पूजा और जप करना विशेष फलदायी माना जाता है।
डोल पूर्णिमा फाल्गुन पूर्णिमा का ही एक रूप है, लेकिन पूर्वी भारत में इसे विशेष रूप से राधा-कृष्ण के उत्सव के रूप में मनाया जाता है। इस दिन भगवान श्रीकृष्ण को रंग और अबीर अर्पित किया जाता है। मंदिरों में भजन-कीर्तन होते हैं और भक्तजन प्रेम के रंग में रंग जाते हैं। यह पर्व केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। यह दिन वसंत ऋतु के स्वागत का प्रतीक है। चारों ओर फूलों की खुशबू और रंगों की छटा इस उत्सव को और भी सुंदर बना देती है।
डोल पूर्णिमा का दिन बहुत शुभ माना गया है। इस दिन स्नान, दान और पूजा करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की आराधना करने से घर में सुख, शांति और समृद्धि आती है। यह तिथि होली पर्व से भी जुड़ी है। फाल्गुन पूर्णिमा की रात्रि को होलिका दहन होता है और अगले दिन रंगों की होली खेली जाती है। इस प्रकार डोल पूर्णिमा बुराई पर अच्छाई की जीत और प्रेम के संदेश का प्रतीक है।
सर्वप्रथम इस दिन सुबह जल्दी उठकर पवित्र स्नान करें। इसके बाद पूजा स्थान को साफ करके वहां श्री विष्णु एवं माता लक्ष्मी की मूर्ति या तस्वीर स्थापित करें। अब पूजा स्थान को अच्छे से सज़ाएँ और भगवान जी की दैनिक पूजा करें जैसे फूल, पीला चन्दन, सिंदूर, अक्षत आदि चढ़ाएं। पूजा के दौरान “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ एवं “ॐ ह्रीं क्लीं महालक्ष्मेय नमः” मंत्र का जाप करें। इसके बाद पूजा की सभी आवश्यक सामग्रियां जैसे मिठाई, फल, मेवे इत्यादि का भोग लगाएं। भगवान जी को दक्षिणा भी अर्पित करें। इसके पश्चात् भगवान विष्णु की आरती उतारें। अंत में हाथ में अक्षत और पुष्प लेकर भगवान जी से पूजा में हुई किसी भी गलती के लिए क्षमा मांगे और अक्षत व पुष्प को भगवान के चरणों में छोड़ दें। इस दिन चंद्रोदय के उपरांत चन्द्रमा को अर्घ्य देकर अपने व्रत का समापन करें। पूर्णिमा पर चंद्रमा के दर्शन के बाद ही इस दिन का व्रत पूर्ण माना जाता है।
इस प्रकार डोल पूर्णिमा केवल एक धार्मिक तिथि नहीं, बल्कि प्रेम, भक्ति और आनंद का उत्सव है। यह पर्व हमें आपसी मेलजोल, सद्भाव और सकारात्मकता का संदेश देता है तथा होली के रंगों भरे उत्सव की शुरुआत का प्रतीक है।
डोल पूर्णिमा और होली का संबंध बहुत गहरा है। डोल पूर्णिमा फाल्गुन मास की पूर्णिमा तिथि को मनाई जाती है और इसी दिन रात में होलिका दहन किया जाता है। इसलिए डोल पूर्णिमा को ही होली की आधार तिथि माना जाता है। पूर्वी भारत, विशेषकर पश्चिम बंगाल और ओडिशा में फाल्गुन पूर्णिमा को डोल पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है, जबकि उत्तर भारत में इसी तिथि पर होलिका दहन होता है। दोनों पर्व एक ही दिन पड़ते हैं, लेकिन मनाने का तरीका अलग-अलग हो सकता है।
डोल पूर्णिमा के दिन राधा-कृष्ण की पूजा की जाती है और अबीर-गुलाल अर्पित किया जाता है। अगले दिन रंगों की होली खेली जाती है। इस प्रकार डोल पूर्णिमा भक्ति और पूजा का पर्व है, जबकि होली रंगों और उत्सव का प्रतीक है। धार्मिक दृष्टि से यह दिन बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश देता है। सामाजिक रूप से यह पर्व आपसी प्रेम, भाईचारे और मेलजोल को बढ़ाता है। इसलिए डोल पूर्णिमा और होली दोनों मिलकर आनंद, भक्ति और एकता का प्रतीक बनते हैं।
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