
क्या आप जानना चाहते हैं कि चैत्र नवपद ओली पूर्ण क्या है और इसे क्यों मनाया जाता है? इस लेख में जानिए जैन धर्म के इस महत्वपूर्ण पर्व का अर्थ, महत्व, पूजा विधि, नियम और इससे जुड़ी धार्मिक मान्यताएँ विस्तार से।
अपने आराध्य के प्रति कृतज्ञता व आस्था प्रकट करने के लिए प्रत्येक धर्म अपने विशेष त्यौहार मनाते हैं। इसी प्रकार जैन धर्म द्वारा मनाया जाने वाला नवपद ओली भी अत्यंत महत्वपूर्ण पर्व है। आइए जानते हैं इस के बारे में और अधिक जानकारी।
नवपद ओली जैन धर्म में एक विशेष तपस्या है, जिसे साल में दो बार चैत्र और आश्विन महीने में किया जाता है। यह नौ दिनों तक चलने वाला एक आध्यात्मिक उपवास होता है, जिसमें साधक केवल एक बार सात्त्विक आहार ग्रहण करता है। इस दौरान नवग्रहों (अरिहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय, साधु, सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान, सम्यक चारित्र और तप) की आराधना की जाती है।
जानकारी के अनुसार, साल 2026 में चैत्र नवपद ओली 25 मार्च, बुधवार से शुरू होकर 2 अप्रैल, गुरुवार को पूर्ण होगी। यह नौ दिनों तक चलने वाला विशेष जैन पर्व है, जो हर वर्ष दो बार मनाया जाता है। नवपद ओली पहली बार चैत्र मास (मार्च–अप्रैल) में और दूसरी बार आश्विन मास (सितंबर–अक्टूबर) में आती है। दोनों बार यह पर्व शुक्ल पक्ष की सप्तमी से पूर्णिमा तक मनाया जाता है। अदिक जानकारी के लिए विशेषज्ञों या पंडितों से जरूर जानें।
नवपद ओली जैन धर्म का अत्यंत महत्वपूर्ण और पवित्र पर्व है, जो आत्मा की शुद्धि और आध्यात्मिक उन्नति का विशेष अवसर प्रदान करता है। इसके माध्यम से इन्द्रियों पर संयम रखते हुए सादा जीवन अपनाया जाता है, जो आत्मसंयम और त्याग की भावना को मजबूत करता है। यह पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आत्मनिरीक्षण, अनुशासन और आंतरिक शांति का मार्ग है। नवपद ओली व्यक्ति को मोह-माया से दूर कर सच्चे आध्यात्मिक मार्ग की ओर प्रेरित करता है और मोक्ष की प्राप्ति के लिए आधार तैयार करता है।
यदि अरिहंत का शाब्दिक अर्थ देखा जाए तो अरि का अर्थ है शत्रु एवं हंत का अर्थ है नाश करने वाला। इस प्रकार इस पद का अर्थ है कि जिसने घृणा, क्रोध, अहंकार, एवं मोह जैसे आंतरिक शत्रुओं पर विजय प्राप्त कर ली हो। ये पद सिद्धचक्र के मध्य में स्थित है। नवपद ओली के पहले दिन शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि पर जैन समुदाय के लोग अरिहंत पद की पूजा करते हैं। अरिहंत का रंग सफेद होता है, इस कारण इस दिन उपवास के दौरान सफेद उबला हुआ चावल खाया जाता है।
सिद्ध पद का अर्थ है मुक्त आत्मा । ये नवपद का दूसरा चक्र है एवं सिद्धचक्र यंत्र के शीर्ष पर स्थित होता है। जैन समुदाय के लोग नवपद ओली के दूसरे दिन यानि शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि पर सिद्ध पद की उपासना करते हैं। इस दिन उपवास रखने वाले अनुयायी उबले हुए गेंहू का सेवन करते हैं। सिद्ध का रंग लाल है, इस कारण इस दिन के लिए लाल रंग का अन्न अर्थात् गेंहू को चुना गया है।
नवपद का तीसरा पद है 'आचार्य पद', जिसका अर्थ है 'आध्यात्मिक गुरु'। ये पद सिद्धचक्र यंत्र में अरिहंत के दाहिनी ओर स्थित होता है। नवपद ओली के तीसरे दिन यानि शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि पर जैन समुदाय के लोग आचार्य पद की पूजा करते हैं। आचार्य का रंग सुनहरा पीला होता है, इसलिए इस दिन उपवास रखने वाले अनुयायी उबले हुए चने का सेवन करते हैं।
नवपद में चौथा स्थान है 'उपाध्याय पद' का। यह सिद्धचक्र यंत्र में अरिहंत के नीचे स्थित है। नवपद ओली के चौथे दिन यानि शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि पर जैन समुदाय के लोग उपाध्याय पद की पूजा करते हैं। उपाध्याय का रंग हरा होता है, इसलिए उपवास रखने वाले अनुयायी इस दिन भोजन में उबली हुई मूंग का सेवन करते हैं।
साधु नवपद में पांचवें स्थान पर है। इसका अर्थ होता है 'भिक्षु'। यह सिद्धचक्र में अरिहंत के बाईं ओर स्थित होता है। इस दिन जैन समुदाय के लोग साधु पद की पूजा करते हैं। नवपद का उपवास रखने वाले अनुयायी इस दिन उबला हुआ उड़द ग्रहण करते हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि साधुपद का प्रतीक काला रंग है, और उड़द भी काले रंग का होता है।
सम्यक दर्शन का अर्थ होता है 'सही विश्वास'। ये अरिहंत के उपदेश में विश्वास को दर्शाता है। सम्यक दर्शन धर्म तत्व का पहला और नवपद का छठा पद है। सफेद रंग को सम्यक दर्शन का प्रतीक माना गया है, इसलिए शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि पर उपवास रखने वाले लोग उबले हुए चावल का सेवन करते हैं।
सम्यक ज्ञान नवपद में सातवें स्थान पर होता है। इसका अर्थ होता है 'सही ज्ञान'। इसका प्रतीकात्मक रंग सफेद होता है, इसलिए जैन समुदाय के लोग शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि पर भी उबला हुआ चावल ही ग्रहण करते हैं।
सम्यक चरित्र का अर्थ होता है 'सही आचरण'। ये नवपद में आठवें स्थान पर है। इसका भी प्रतीकात्मक रंग सफेद होता है, इसलिए जैन समुदाय के लोग इस दिन भी उबले हुए चावल का ही सेवन करते हैं।
सम्यक तप का अर्थ है सांसारिक इच्छाओं से दूर रहते हुए सही परिप्रेक्ष्य में तपस्या करना। ये नवपद में नौवें स्थान पर है। सम्यक तप का प्रतीक भी सफेद रंग होता है, इसलिए उपवास रखने वाले जैन अनुयायी इस दिन भी उबले हुए चावल का ही सेवन करते हैं। यह नवपद ओली के अंतिम दिन, यानि पूर्णिमा तिथि पर मनाया जाता है।
चैत्र नवपद ओली का इतिहास प्रसिद्ध कथा श्रीपाल और मायना सुंदरी से जुड़ा हुआ है। पौराणिक कथा और जानकारी के अनुसार, नवपद ओली से जुड़ी एक किवदंती के अनुसार लगभग 11 लाख वर्ष पूर्व की बात है, जब जैन धर्म के 20वें तीर्थंकर मुनिसुवरत स्वामी के समय एक राजा श्रीपाल हुआ करते थे। वो कुष्ठ रोग से पीड़ित थे। राजा की पत्नी मयनसुंदरी उन्हें मुनीचंद्र नामक संत के पास ले गई, जिन्होंने राजा को 9 दिनों का विशेष उपवास और सिद्धचक्र महापूजा करने की सलाह दी। आपको बता दें कि सिद्धचक्र एक यंत्र है, जिसमें नौ सर्वोच्च पद हैं। इन्हें दो समूह में बांटा गया है। पंच परमेष्ठी- इसके अंतर्गत अरिहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय व साधु पद आते हैं। धर्म तत्व- इसके अंतर्गत सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान, सम्यक चरित्र एवं सम्यक तप आते हैं। जानकारी के अनुसार जो अनुयायी धर्म तत्व यानि अंतिम चार पदों का अनुसरण करते हैं, उन्हें जीवन मरण के चक्र से मुक्ति मिलती है। वहीं, परंपरा के रूप में, नवपद ओली के दौरान जैन श्रद्धालु नौ दिनों तक विशेष व्रत, जैसे आयंबिल करते हैं और नवपद की आराधना करते हैं। यह पर्व आत्मसंयम, त्याग और आध्यात्मिक उन्नति का संदेश देता है।
चैत्र नवपद ओली को अयंबिल ओली भी कहा जाता है। नवपद ओली के समय जैन धर्म के अनुयायी ब्रह्मांड की नौ सर्वोच्च सत्ताओं की आराधना करते हैं, जिन्हें नवपद कहा जाता है। इनमें अरिहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय, साधु-साध्वी, सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान, सम्यक चरित्र और सम्यक तप शामिल हैं। इनकी पूजा के माध्यम से व्यक्ति आध्यात्मिक उन्नति की ओर अग्रसर होता है। इस पर्व की मुख्य विशेषता अयंबिल तप है, जिसमें श्रद्धालु दिन में केवल एक बार सादा भोजन करते हैं। इस भोजन में स्वाद बढ़ाने वाली चीजों का त्याग किया जाता है। इन नौ दिनों में भक्त प्रार्थना, स्वाध्याय, ध्यान और संयम का पालन करते हैं।
इस पर्व के दौरान अनुयायी नवपद की विधिपूर्वक पूजा करते हैं। नवपद ओली के नौ दिनों में जैन समुदाय के लोग आयंबिल उपवास रखते हैं, जिसमें केवल एक बार उबला हुआ भोजन ग्रहण किया जाता है। इस भोजन में नमक, चीनी, तेल, घी, दूध, दही, हरी कच्ची सब्जियां, भूमि के अंदर उगने वाली सब्जियां, फल या किसी प्रकार के मसाले का प्रयोग नहीं होता है।
नवपद ओली का आध्यात्मिक महत्व आत्मा की शुद्धि और आध्यात्मिक उन्नति से संबंधित है। यह व्रत साधक को सांसारिक विकारों और नकारात्मक प्रभावों से मुक्त कर शुद्ध ज्ञान और सम्यक आचरण की ओर ले जाता है। इस दौरान श्रीयंत्र या सिद्धचक्र का ध्यान साधक के जीवन में सकारात्मक ऊर्जा और उच्च आध्यात्मिक शक्ति लाता है। मान्यता है कि नवपद ओली की सच्ची और श्रद्धापूर्ण आराधना से आत्मा जन्म-मरण के बंधनों से मुक्त होकर शाश्वत सुख, यानी मोक्ष, को प्राप्त करती है। यह पर्व जीवन में सम्यक ज्ञान, सही चरित्र और संयम की नींव मजबूत करने का अवसर प्रदान करता है।
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