आदि पेरुक्कू क्या है?
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आदि पेरुक्कू कब है?

क्या आप जानना चाहते हैं कि आदि पेरुक्कू क्यों मनाया जाता है और इसका क्या महत्व है? इस लेख में जानिए इस पावन दक्षिण भारतीय त्योहार का धार्मिक महत्व, पूजा विधि, परंपराएं, नदियों की पूजा और इस दिन किए जाने वाले विशेष अनुष्ठानों की संपूर्ण जानकारी।

आदि पेरुक्कू के बारे में

दक्षिण भारत, विशेष रूप से तमिलनाडु में मनाया जाने वाला आदि पेरुक्कू (Aadi Perukku) एक महत्वपूर्ण धार्मिक और सांस्कृतिक पर्व है। यह त्योहार मुख्य रूप से जल, प्रकृति और कृषि समृद्धि के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए मनाया जाता है। इस दिन नदियों, झीलों और जल स्रोतों की पूजा की जाती है और प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त किया जाता है। यह पर्व हमें यह सिखाता है कि मानव जीवन पूरी तरह प्रकृति और जल पर निर्भर है, इसलिए उसका सम्मान और संरक्षण करना आवश्यक है।

आदि पेरुक्कू कब है और इसका शुभ समय क्या है?

वर्ष 2026 में आदि पेरुक्कू 3 अगस्त 2026, सोमवार को मनाया जाएगा। यह त्योहार तमिल कैलेंडर के आदि (Aadi) महीने के 18वें दिन मनाया जाता है, इसलिए इसे ‘आदि 18’ या ‘पदिनेट्टम पेरुक्कू’ भी कहा जाता है।

महत्वपूर्ण समय (सामान्य पंचांग अनुसार)

  • सूर्योदय – सुबह लगभग 5:26 बजे
  • सूर्यास्त – शाम लगभग 6:42 बजे

इस दिन पूजा और धार्मिक कार्य आमतौर पर सुबह से दोपहर तक करना शुभ माना जाता है।

शुभ मुहूर्त

मुहूर्त

समय

ब्रह्म मुहूर्त

04:00 ए एम से 04:43 ए एम

प्रातः सन्ध्या

04:22 ए एम से 05:26 ए एम

अभिजित मुहूर्त

11:37 ए एम से 12:31 पी एम

विजय मुहूर्त

02:17 पी एम से 03:10 पी एम

गोधूलि मुहूर्त

06:42 पी एम से 07:04 पी एम

सायाह्न सन्ध्या

06:42 पी एम से 07:47 पी एम

अमृत काल

05:07 पी एम से 06:45 पी एम

निशिता मुहूर्त

11:43 पी एम से 12:26 ए एम, अगस्त 04

आदि पेरुक्कू क्या है? इसका महत्व समझें

आदि पेरुक्कू एक पारंपरिक हिंदू त्योहार है जो मुख्य रूप से नदियों, वर्षा और जल की शक्ति को समर्पित है। ‘पेरुक्कू’ शब्द का अर्थ है जल का बढ़ना या उफान आना। मानसून के समय नदियों का जलस्तर बढ़ने लगता है, इसलिए यह त्योहार प्रकृति के इस परिवर्तन का उत्सव भी है। यह पर्व किसानों के लिए विशेष महत्व रखता है क्योंकि बारिश और नदियों का पानी कृषि के लिए बेहद आवश्यक होता है।

आदि पेरुक्कू का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व

आदि पेरुक्कू केवल एक त्योहार नहीं बल्कि प्रकृति और जीवन के बीच गहरे संबंध का प्रतीक है।

जल तत्व का सम्मान

हिंदू धर्म में जल को जीवन का आधार माना गया है। इस दिन नदियों और जल स्रोतों की पूजा की जाती है।

कृषि और समृद्धि का प्रतीक

यह त्योहार खेती के नए चक्र की शुरुआत का संकेत देता है और अच्छी फसल की कामना के साथ मनाया जाता है।

प्रकृति के प्रति कृतज्ञता

इस दिन लोग वर्षा, नदियों और धरती माता का आभार व्यक्त करते हैं।

सामाजिक एकता

परिवार और समुदाय के लोग एक साथ मिलकर पूजा और उत्सव मनाते हैं।

आदि पेरुक्कू से जुड़ी परंपराएं और मान्यताएं

इस पर्व से कई पारंपरिक मान्यताएं जुड़ी हुई हैं।

नदी पूजा

लोग नदियों के किनारे जाकर पूजा करते हैं और जल को पवित्र मानकर आभार व्यक्त करते हैं।

देवी की आराधना

इस दिन देवी पार्वती या अम्बा के विभिन्न रूपों की पूजा की जाती है।

पारिवारिक मिलन

परिवार और रिश्तेदार एक साथ इकट्ठा होकर पूजा और भोजन करते हैं।

नई फसल की कामना

किसान इस दिन अच्छी बारिश और भरपूर फसल की प्रार्थना करते हैं।

आदि पेरुक्कू कैसे मनाई जाती है?

आदि पेरुक्कू को बहुत उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है।

नदी या जल स्रोत के पास पूजा

  • लोग नदियों, झीलों या तालाबों के किनारे जाकर पूजा करते हैं।

पवित्र स्नान

  • भक्त नदी में स्नान करके पूजा करते हैं और नई शुरुआत की कामना करते हैं।

विशेष भोजन बनाना

  • इस दिन कई प्रकार के चावल के व्यंजन बनाए जाते हैं, जैसे-
  • नींबू चावल
  • नारियल चावल
  • इमली चावल
  • दही चावल
  • मीठा पोंगल
  • इन व्यंजनों को देवी और नदी को अर्पित किया जाता है।

प्रसाद वितरण

  • पूजा के बाद प्रसाद परिवार और मित्रों में बांटा जाता है।

आदि पेरुक्कू की तैयारी कैसे की जाती है?

इस त्योहार के लिए लोग पहले से तैयारी करते हैं।

घर की सफाई

त्योहार से पहले घर और पूजा स्थान को साफ किया जाता है।

पूजा सामग्री एकत्र करना

पूजा के लिए फूल, नारियल, फल, चावल और दीपक की व्यवस्था की जाती है।

भोजन की तैयारी

परिवार के लिए विशेष पारंपरिक व्यंजन बनाए जाते हैं।

नदी तट की यात्रा की योजना

कई लोग इस दिन नदी के किनारे जाकर पूजा करने की योजना बनाते हैं।

आदि पेरुक्कू में किए जाने वाले पवित्र कार्य

इस दिन कई धार्मिक और पुण्य कार्य किए जाते हैं।

नदी पूजा

नदी को फूल, चावल और दीप अर्पित किए जाते हैं।

स्नान और ध्यान

पवित्र जल में स्नान करके ध्यान और प्रार्थना की जाती है।

देवी की आराधना

अम्बा या पार्वती देवी की पूजा की जाती है।

प्रसाद अर्पण

विभिन्न प्रकार के चावल के व्यंजन देवी को अर्पित किए जाते हैं।

आदि पेरुक्कू के दिन किए जाने वाले शुभ कार्य

इस दिन कुछ कार्य विशेष रूप से शुभ माने जाते हैं।

  • जल स्रोतों की पूजा
  • पेड़ लगाना
  • दान और सेवा
  • परिवार के साथ पूजा करना
  • प्रकृति संरक्षण का संकल्प लेना
  • कई जगह लोग जल संरक्षण और नदी सफाई अभियान भी चलाते हैं।

आदि पेरुक्कू का ज्योतिषीय महत्व

ज्योतिष शास्त्र में भी इस पर्व का महत्व बताया गया है।

सूर्य और वर्षा का प्रभाव

यह समय सूर्य और वर्षा के संतुलन का प्रतीक माना जाता है।

कृषि चक्र की शुरुआत

यह समय खेती और बीज बोने के लिए अनुकूल माना जाता है।

जल तत्व की ऊर्जा

जल तत्व को जीवन में समृद्धि और शांति का प्रतीक माना जाता है।

हिंदू धर्म में आदि पेरुक्कू का महत्व

हिंदू परंपरा में प्रकृति और पंचतत्वों की पूजा का विशेष महत्व है। आदि पेरुक्कू उसी परंपरा का एक सुंदर उदाहरण है जिसमें जल तत्व की पूजा की जाती है।

यह पर्व हमें यह सिखाता है कि-

  • प्रकृति का सम्मान करना चाहिए
  • जल स्रोतों की रक्षा करनी चाहिए
  • प्रकृति के साथ संतुलन बनाए रखना चाहिए

आदि पेरुक्कू का आध्यात्मिक महत्व

आध्यात्मिक दृष्टि से भी यह त्योहार बहुत महत्वपूर्ण है।

प्रकृति से जुड़ाव

यह पर्व हमें प्रकृति और जीवन के बीच संबंध को समझने का अवसर देता है।

कृतज्ञता की भावना

यह हमें सिखाता है कि हमें प्रकृति के प्रति आभारी होना चाहिए।

सकारात्मक ऊर्जा

प्रार्थना, पूजा और ध्यान से मन में सकारात्मकता आती है।

सामूहिक सद्भाव

यह त्योहार समाज में एकता और सहयोग की भावना को बढ़ाता है।

आदि पेरुक्कू का संदेश

आदि पेरुक्कू का मुख्य संदेश है प्रकृति का सम्मान और संरक्षण। यह पर्व हमें याद दिलाता है कि जल जीवन का आधार है और उसके बिना मानव जीवन संभव नहीं है। इसलिए हमें जल स्रोतों की रक्षा करनी चाहिए और पर्यावरण को सुरक्षित रखना चाहिए। इसके साथ ही यह त्योहार हमें सद्भाव, कृतज्ञता और प्रकृति के साथ संतुलित जीवन जीने की प्रेरणा देता है।

आदि पेरुक्कू दक्षिण भारत का एक सुंदर और अर्थपूर्ण त्योहार है जो जल, प्रकृति और कृषि समृद्धि को समर्पित है। यह पर्व हमें प्रकृति के प्रति सम्मान, जल संरक्षण और सामूहिक जीवन की भावना का संदेश देता है।

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Published by Sri Mandir·May 28, 2026

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